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विमल
कुमार
सिंह |
हिन्दी
साहित्य का वर्तमान दौर बहुत चुनौती भरा है। साफ तौर
पर यह दिखाई देता है कि परिस्थितियां साहित्यिक
पत्रकारिता के अनुकूल नहीं है। बाजारवाद की आंधी इस
तरह चल रही है कि सभी स्थापित प्रकाशन समूह साहित्य
को लगभग अछूत मान चुके हैं। साहित्य उनके प्रकाशनों
में सजावटी तौर पर तो है,
लेकिन वह उनकी मुख्य विषय
वस्तु नहीं है। उनकी मुख्य विषय वस्तु है पथभ्रष्ट
राजनीति की उठापटक, सेक्स
और हिंसा से विकृत हुए समाज का चेहरा,
फिल्मों की गपशप और वे तमाम
उलूल-जुलूल बातें जिनका समाज को बनाने में नहीं
बल्कि, उसे बिगाड़ने में
योगदान रहता है। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि आज के
प्रकाशन समूह 'आर्थिक लाभ'
की रोशनी में आगे बढ़ते हैं। वे
कुछ भी ऐसा नहीं करते जिसमें उनको हानि की हल्की सी
भी संभावना दिखती है। वैसे बात अब हानि-लाभ की भी
नहीं रही। अब बात है लाभ की मात्रा पर। यदि कोई
पत्र-पत्रिका पर्याप्त लाभ नहीं कमा रही है और
प्रकाशक के पास लाभ कमाने का कोई बेहतर विकल्प है तो
वह उसे बंद करने में संकोच नहीं करता। कुछ दशक पहले
धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं का
डंका बजता था। वे घाटे में चलने वाली पत्रिकाएं नहीं
थीं। लेकिन उन्हें बंद कर दिया गया। इन पत्रिकाओं
के
प्रकाशक संभवत: अपने संसाधनों को ऐसे काम में लगाना
चाहते थे,
जहां उन्हें लगता था कि वे
ज्यादा लाभ कमा सकते थे।
जब
स्थापित प्रकाशन समूहों की ये हालत है कि उन्हें
पैसे के सिवाय कुछ नहीं सूझता तो प्रश्न उठता है
कि साहित्य का झंडा कौन थामेगा। प्रश्न का उत्तर
देना मुश्किल था,
लेकिन हमारे हिंदी समाज ने इसका
उत्तर दिया है। आज बेशक धर्मयुग और साप्ताहिक
हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं नहीं हैं। किंतु उनकी कमी
को पूरा करने के लिए साहित्यिक पत्रिकाओं की एक झड़ी
सी लग गई है। पूरे देश में हिन्दी साहित्य को
समर्पित सैकड़ों पत्रिकाएं निकल रही हैं। इन
पत्रिकाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है। ये
पत्रिकाएं निकल रही हैं देश के जाने-अनजाने
साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाओं को लोगों के सामने
लाने के लिए। पांच साल पहले अक्षरम् संगोष्ठी का
प्रकाशन भी इसी तरह का एक प्रयास था। प्रारंभ से ही
इसके साथ वे लोग जुड़े जिनमें देश और समाज के
सकारात्मक बदलाव के लिए काम करने की इच्छा थी। जिन
परिस्थितियों में अक्षरम् संगोष्ठी की शुरुआत हुई,
वह किसी विशेषज्ञ की नजर में एक
दुस्साहसी प्रयास ही कहा जाएगा। बिना किसी कोष की
स्थापना किए, बिना किसी
बड़े पैसे वाले का वरद हस्त प्राप्त किए पत्रिका यदि
शुरू हुई तो इसके पीछे पत्रिका में काम करने वालों
का जुनून ही था। प्रारंभ में पत्रिका का कोई
कार्यालय नहीं था। इसलिए इसके संपादक नरेश शांडिल्य
के घर को ही संपादकीय कार्यालय बनाया गया। आने वाले
दिनों में परिस्थितियों में कई उतार-चढ़ाव आए,
लेकिन पत्रिका का प्रकाशन लगातार
चलता रहा। संसाधनों की कमी का पत्रिका की गुणवत्ता
पर कोई असर नहीं पड़ा। हम कह सकते हैं कि संसाधनों की
कमी के बावजूद पत्रिका की गुणवत्ता दिनोंदिन बढ़ती
गई। पत्रिका हर दृष्टि से निखरती गई। और सुखद स्थिति
यह है कि सुधार की यह प्रक्रिया आज भी लगातार जारी
है।
अक्षरम् संगोष्ठी ने पिछले पांच सालों में श्रेष्ठ
साहित्य को लोगों के लिए उपलब्ध कराया है। लेकिन,
इसके साथ ही पत्रिका ने हिन्दी
जगत की और भी कई प्रकार से सेवा की है। अपनी शुरुआत
से ही पत्रिका ने प्रवासी साहित्य और मुख्य भूमि के
साहित्य के बीच एक पुल बनाने की कोशिश की है। भारत
के लोगों को यह बताया कि ब्रिटेन,
अमेरिका और अन्य देशों में
हिन्दी में क्या लिखा जा रहा है। वहीं देश के बाहर
बसे हिन्दी भाषियों को भी यह जानने का मौका मिला कि
भारत में हिन्दी साहित्य में क्या-क्या नया हो रहा
है। जिन दिनों पत्रिका की शुरुआत हुई उन दिनों अनिल
शर्मा 'जोशी'
ब्रिटेन में भारतीय दूतावास में
हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी थे। चूंकि उन्होंने और
अक्षरम् संगोष्ठी से जुड़े अन्य लोगों ने पहले भी
हिन्दी के लिए भारत में काम किया था,
इसलिए उनका भरपूर सहयोग पत्रिका
को मिला। उन्होंने इसे ब्रिटेन के हिन्दी जगत में
प्रस्तुत किया। देखते ही देखते अक्षरम् संगोष्ठी
ब्रिटेन ही नहीं पूरे विश्व के हिन्दी साहित्यकारों
की एक चहेती पत्रिका बन गई। निश्चित रूप से यह एक
बड़ी उपलब्धि थी।
अक्षरम् संगोष्ठी ने अपने छोटे से जीवनकाल में जो
प्रमुख उपलब्धियां हासिल की हैं,
उसमें इसका निष्पक्ष स्वरूप बड़ा
उपयोगी रहा है। पत्रिका ने खेमों में बंटी हिन्दी को
एक ऐसा मंच दिया जहां किसी वाद के लिए पूर्वाग्रह
नहीं था। यहां गरीब,
मजदूरों और वंचितों की बात करने वाले जनवादी
साहित्यकार का स्वागत किया गया और साथ ही राम,
कृष्ण और भारतीय संस्कृति का
यशोगान करने वाले राष्ट्रवादी रचनाकारों के लिए भी
दरवाजे खुले रखे गए। तत्कालीन हिन्दी जगत में यह एक
बड़ी पहल थी। इस पहल का उन सभी लोगों ने स्वागत किया
जो हिन्दी का भला चाहते थे। कई नामी साहित्यकारों ने
अक्षरम के इस प्रयास को अपना भरपूर सहयोग दिया।
रामदरश मिश्र, नरेन्द्र
कोहली और स्वर्गीय कमलेश्वर ने जिस प्रकार पत्रिका
को सहयोग दिया, वह सभी को
मालूम है।
अक्षरम् संगोष्ठी पत्रिका का प्रकाशन अक्षरम् संस्था
के अंतर्गत किया जाता है। पत्रिका प्रकाशन के अलावा
इस संस्था ने साहित्य के क्षेत्र में और कई
महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें दो गतिविधियां विशेष
रूप से उल्लेखनीय हैं। अक्षरम् की ओर से प्रतिवर्ष
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव का आयोजन किया जाता है।
यह संस्था का सबसे प्रमुख आयोजन है। प्राय: तीन दिन
तक चलने वाले इस कार्यक्रम में हिन्दी से जुड़े
विभिन्न विषयों पर गोष्ठियों एवं सेमिनार के अलावा
नाटक,
प्रदर्शनी एवं कवि सम्मेलन का
आयोजन किया जाता है। प्रवासी कवि सम्मेलन के नाम से
आयोजित इस कवि सम्मेलन में भारत के अलावा ब्रिटेन,
हालैंड,
अमेरिका,
कनाडा,
फिजी,
सूरीनाम, मारिशस आदि कई
देशों के कवि भाग लेते हैं।
विदेशों में हिन्दी सीख रहे विद्यार्थियों को
प्रोत्साहित करने में भी अक्षरम् की महत्वपूर्ण
भूमिका है। प्रतिवर्ष ब्रिटेन की संस्था
'यू.के.
हिन्दी समिति' यूरोप में
हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन करती है। इस
प्रतियोगिता के द्वारा कुछ ऐसे प्रतिभाशाली
विद्यार्थियों का चयन किया जाता है जो विदेशों में
हिन्दी सीख रहे हैं। इन चयनित विद्यार्थियों को
पुरस्कार स्वरूप भारत भ्रमण पर लाया जाता है। भारत
में इन विद्यार्थियों के भ्रमण की व्यवस्था करने में
अक्षरम् की केन्द्रीय भूमिका होती है। पिछले पांच
वर्षों में अक्षरम् ने जिस प्रकार साहित्य के
क्षेत्र में पहल की है,
वह निश्चित रूप से हिन्दी के चाहने वालों के लिए एक
मिसाल है।
संपर्क: नरेश शांडिल्य,
ए-5,
मंसाराम पार्क, सण्डे
बाजार रोड, उत्तम नगर नई
दिल्ली-110059 |