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जनजागरण |
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ग्रामीणों ने की जंगल की रक्षा |
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अर्जुन प्रसाद |
गिरिडीह जिला अंतर्गत गादी निवासी
65 वर्षीय
विश्वनाथ मंडल साइकिल से घूम-घूमकर वन संरक्षण का
अलख जगा रहे हैं। उनके कारण कोदैया,
साठीबाद,
बुढ़ियाटांड़,
रंगाधारी,
जगजगो,
गादी बेडमुक्का के जंगल अभी भी
हरे-भरे हैं। वे इस कार्य को वर्ष 1988
से करते आ रहे हैं। उस समय वे
जमुआ प्रखण्ड के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे।
उन्होंने
बताया कि गादी और रंगाधारी
गांव का जंगल पूरी तरह कटकर समाप्त हो चुका था,
केवल जड़े बची हुई थीं। उनके मन
में यह बात आई कि अगर इसमें हस्तक्षेप नहीं किया गया
तो पेड़ों की जड़ें भी समाप्त हो जाएंगी। अन्तत: जलावन
की लकड़ी कौन कहे, लोगों
को दतौन एवं पत्ताा भी जंगल से प्राप्त न हो सकेगा।
यह क्षेत्र पूरी तरह रेगिस्तान बन जाएगा। बस,
यहीं से
उनके मन में एक निश्चय जागा। उन्होंने अपने सहयोगी
पूरन सिंह के साथ घर-घर जाकर जंगल बचाने हेतु लोगों
को प्रेरित करना शुरू किया।
बेडमुक्का,
रंगाधारी
एवं गादी के ग्रामीणों के बीच बैठक कर एक वन संरक्षण
समिति का गठन किया गया। समिति के सदस्यों की
साप्ताहिक बैठक शुरू की गई। जंगल कुछ हरा-भरा होने
लगा तो आस-पास के गांवों के ग्रामीणों
द्वारा दैनिक उपयोग के दातौन-पत्ता आदि की प्राप्ति
हेतु जंगल नष्ट करने का प्रयास होने लगा। समिति के
सदस्यों को यह बात समझ में आई कि मात्र दो-तीन गांव
के लोगों द्वारा जंगल बचाने का कार्य संभव नहीं हो
पाएगा। अत: आस-पास के नौ गांवों को मिलाकर एक बड़ी
समिति का गठन किया गया। निर्णय लिया गया कि वन
संरक्षण समिति के जो सदस्य बिना कारण बताए बैठक में
उपस्थित नहीं होते,
उन्हें एक
रफपया आर्थिक जुर्माना के रूप में समिति में जमा
करना होगा।
बाद में इन नौ गांवों के अतिरिक्त
अन्य अठारह गांवों के ग्रामीणों की बैठक कोदैया में
हुई। दो-ढाई सौ ग्रामीणों की यह बैठक विश्वनाथ मंडल
के नेतृत्व में हुई। ग्रामीणों ने जंगल बचाने हेतु
अपनी प्रतिबध्दता जताई। इन
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गांवों के ग्रामीणों के अनुभव के आधार
पर फन: एक समिति का गठन किया गया। जंगल बचाने की बात
बच्चे से लेकर बूढ़े तक करने लगे। यह पूछे जाने पर कि
शिक्षण कार्य करते हुए जंगल बचाने के अभियान के लिए
समय कब निकालते थे,
श्री मंडल ने बताया कि वे
साप्ताहिक रविवार एवं अन्य पर्व त्यौहारों की छुट्टी
के दिन वन संरक्षण हेतु समय देते हैं। आवश्यकता पड़ने
पर विद्यालय के समय के पूर्व भी ग्रामीणों के साथ
बैठक कर लिया करते थे। वन संरक्षण हेतु क्षेत्र के
आकार के अनुसार समिति द्वारा रक्षकों की बहाली की
जाती है। रक्षक जंगल बचाने का कार्य घूम-घूमकर किया
करते हैं। इसके अतिरिक्त बैठक की सूचना सदस्यों तक
पहुंचाना,
जंगल काटने वाले व्यक्तियों को समिति
की चेतावनी भेजना जैसे काम भी वे करते हैं। समिति
द्वारा दोष के अनुसार आर्थिक एवं सामाजिक दंड भी
लगाया जाता है। अगर व्यक्ति दंड मानने से अस्वीकार
कर दे तो पूरे साक्ष्यों के साथ वन विभाग के पास
संबंधित व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई हेतु आवेदन दिया
जाता है। ऐसे व्यक्तियों के ऊपर विवश होकर वन विभाग
को मुकदमा करना पड़ता है।
1998
में शिक्षक पद से सेवानिवृत्त होने
के बाद श्री मंडल वन संरक्षण के कार्य में पूरी तरह
जुड़ गए। उनका कहना है कि दस-बारह वर्षों तक उन्हें
अच्छा सहयोग मिला। परंतु बाद में जंगल तैयार हो जाने
के बाद सहयोग में कुछ कमी आई। इसका मुख्य कारण वे
चोरी-छुपे लकड़ी बेचकर पैसा कमाने वाले असामाजिक
तत्वों को मानते हैं। वर्तमान में मुख्य रूप से
गिरिडीह एवं जमुआ प्रखण्ड के अतिरिक्त बेंगाबाद में
दो समिति,
डुमरी में एक समिति एवं बिरनी
प्रखण्ड में तीन समितियां,
कुल मिलाकर
75
समितियां कार्यरत हैं।
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