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 जनवरी,  2008

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ग्रामीण कन्याओं की खातिर

गिरीन्द्र नाथ

भारतीय समाज में आज भी बहुत से लोग हैं जिनके सपने दूसरों के लिए होते हैं। अक्सर यह सपना समाज के उत्थान से जुड़ा होता है। यह आम 'सपनों' से साफ अलग और मौलिक होता है। इसे पूरा करना सरल नहीं होता। लगातार कठिन राहों से गुजरना पड़ता है। लेकिन, ये सपने यदि हकीकत में बदल जाएं तो सच मानिए समाज का कुछ भला जरूर होगा। ऐसा ही देखने को मिला बिहार के 'चम्पानगर' गांव में। यह कोसी का इलाका है। यहां 'बाहुबली संस्कृति' भयानक रूप में तांडव मचा रही है। फिर भी, यहां कुछ-न-कुछ होता रहता है जो अंधोरे में आशा की लौ जलाए हुए है। जिला मुख्यालय 'पूर्णिया' से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है 'चम्पानगर' गांव। यहां 52 वर्षीय महिला इसे अपने सपनों का गांव बनाने में लगी हैं। मृदुला सिन्हा नाम की इस महिला ने महानगरों की 'हाई-प्रोफाइल लाइफ' को झटके में छोड़कर इस गांव की लड़कियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठा लिया है। मृदुला सिन्हा ने सन् 1998 में ही महानगरीय जीवन को छोड़ 'चम्पानगर' गांव में बसने का मन बना लिया था। आगे उन्होंने ऐसा किया भी। उन्होंने नींव डाली एक गैर सरकारी संस्था 'निखार' की। 'निखार' के सहारे पूरे गांव की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने का उनका इरादा आज सफल होता दिख रहा है। तपती दुपहरी हो या कंप-कंपाती ठंड। हर पल मृदुला सिन्हा ने लड़कियों की प्रतिभा में निखार लाने का काम किया है। कभी इस उपेक्षित इलाके में लड़कियां जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ी हुई थीं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के अन्य क्षेत्रों को लेकर इनकी समझ के दरवाजे बंद पड़े थे। लेकिन, मृदुला सिन्हा की एक कोशिश से आज चम्पानगर की लड़कियां एक अलग दुनिया की सैर कर रही हैं। शिक्षा प्रदान करना ही 'निखार' को पहली जरूरत महसूस हुई। शुरफआती दिनों में सुबह-शाम लड़कियों को घर-घर से बुलाकर पढ़ाया जाता था। पहले तो लड़कियां तैयार नहीं होती थीं। लेकिन, धीरे-धीरे हर परिवार की लड़कियां पढ़ने आने लगीं। आज सुबह-शाम वही लड़कियां अपनी बहनों को पढ़ा रही हैं। यह है शिक्षा को लेकर जागरूक करने का प्रतिफल। शिक्षा-प्रसार के बाद मृदुला ने स्वास्थ्य पर अपना धयान वेंफद्रित किया। स्वास्थ्य जागरूकता का पाठ पढ़ने के बाद लड़कियां अब खुद यह अभियान चला रही हैं।

यहां रोजगार बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए मृदुला सिन्हा ने जागरूकता अभियान के बाद रोजगार को अपना लक्ष्य बनाया। इन्होंने यहां के ग्रामीण अंदाज को एक नया रूप प्रदान किया, या यूं कहें कि इस महिला ने यहां की  प्रयोगशाला में एक अभिनव प्रयोग किया। इसमें वह पूर्णतया सफल रहीं। यहां की प्रमुख फसल जूट (पटसन) को लेकर 'निखार' ने एक प्रयोग किया। जूट के कालीन और अन्य सजावटी सामानों को यहां की लड़कियां बनाने लगीं। रंग-बिरंगे कालीन स्थानीय बाजार में तो अपनी स्थिति मजबूत नहीं बना पाए। लेकिन, मुंबई-कोलकाता और दिल्ली में इसकी मांग को देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ। किसी ने यह सोचा भी नहीं था कि इनका अभिनव प्रयोग इतनी लोकप्रियता हासिल कर लेगा। खैर! मेहनत का फल सामने आना था और आया। अब यहां की लड़कियां ब्यूटीशियन का कोर्स भी करने लगी हैं। इस पाठयक्रम से तो लड़कियों में एक नया परिवर्तन आया। इसका अंदाजा लगाना कठिन है कि गांव में भी ब्यूटीपार्लर हो सकता है। लेकिन, यदि चम्पानगर का दौरा किया जाए तो यह 'जमीनी सच्चाई' देखी जा सकती है। आज यहां की लड़कियां नए युग के साथ कदम-ताल कर रही हैं, वो पढ़ाई से लेकर हर क्षेत्र में अव्वल हैं।

मृदुला जी बतलाती हैं, 'शुरू में तो ऐसा लगा कि अब कुछ संभव नहीं है। लड़कियां घर से बाहर नहीं निकलती थीं। उनके माता-पिता पढ़ाना नहीं चाहते थे। लेकिन, मैंने धर्य बनाए रखा और आज जो कुछ है वह उसी धर्य और लड़कियों के सहयोग का परिणाम है। आज तो मेरा कारवां आसमान को छूने की जिद्द कर रहा है। हमारे यहां की लड़कियां कालेज जाने लगी हैं। पहले तो स्कूल के बारे में भी ये सोचती नहीं थीं...'

'निखार' के द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के जरिए जागरूकता का अभियान समय-समय पर चलता रहता है मसलन-स्वास्थ्य शिविर, शिक्षा शिविर आदि। निखार की लड़कियां उपेक्षित जातियों के बच्चों को 'प्रात: कक्षा' में पढ़ा रही हैं। स्वरोजगार के जरिए मृदुलाजी ग्रामीण पृष्ठभूमि में एक क्रांति की लहर चला चुकी हैं। लड़कियां कालीन बनाती हैं तो उसकी बिक्री के बाद उन्हें नकद राशि प्रदान की जाती है। इससे लड़कियों को आत्मबल मिलता है। 'निखार' की कार्यकर्ता राखी कहती हैं, ''अब तो बगल के गांव से भी लड़कियां आने लगी हैं... हम तो सबल हो ही गए हैं। अब सभी बहनों को सबल बनाएंगे।''

यहां वर्ष में तीन बार बाहर से विशेषज्ञों को बुलाया जाता है। ये विशेषज्ञ लड़कियों को नई दुनिया से रूबरू कराते हैं। मृदुला जी अपनी पूरी जिंदगी ही 'निखार' को समर्पित कर चुकी हैं। सपनों को पूरा करने की एक मिशाल उन्होंने कायम की है। लड़कियों को सबल बनाने के बाद मृदुलाजी लड़कों के लिए भी काम करेंगी। दरअसल इस महिला के पास योजनाओं का एक पूरा भंडार है। यदि योजनाएं यूं ही सफल होती जाती हैं तो यकीन मानिए समाज का एक आदर्श चेहरा 'चम्पानगर' में देखने को मिलेगा।

दरअसल 'निखार' की कहानी आगे बढ़ने की कहानी है। गांव को बदलने का बीड़ा किसी न किसी को उठाना ही पड़ेगा। इसके लिए न तो संसद में बिल पास करने की आवश्यकता है और न ही नेताओं के भाषणों की। जो लोग समाज को बदलने का ख्वाब रखते हैं उनके लिए मृदुला जी एक मिशाल हैं। दिल्ली-मुंबई आदि जगहों में रहने वालों की ख्वाहिशें अब उस मूल की तरफ जानी चाहिए जहां सपने अभी तक सोए हुए हैं। आज 'निखार' नामक इस गैरसरकारी संगठन ने चम्पानगर की आधी आबादी को शिक्षा की राह दिखाई है। उनके रोजगार का प्रबंध कराया है। केवल एक महिला की चाहत ने कईयों को आगे बढ़ाया है। आज लोगों को ऐसे कदम उठाने की काफी जरूरत है क्योंकि, आंकड़ों की बिसात पर समाज का एक बड़ा तबका आज भी पिछड़ा हुआ है। आशा है 'निखार' का यह रूप और भी कई गांवों को आलोकित करेगा।

'विकास न हुआ' का रोना रोने से भला है कि मृदुला जी की तरह खुद विकास का बीड़ा उठाया जाए। साहित्यकारों ने कहा भी है कि-

''अपना गम ले के कहीं और न जाया जाए/घर में बिखरी हुई चीज को सजाया जाए...''

ईमेल: girindranath@gmail.com

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन