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एक मिशाल |
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गोबर गैस से चलते कुटीर उद्योग |
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ऋतेश पाठक |
कस्तूरी
मृग
की कहानी आप लोगों ने जरूर सुनी होगी। जिस तरह अपनी
नाभि में स्थित कस्तूरी की गंध से भ्रमित मृग भटक
रहा होता है,
शायद उसी स्थिति में आज हमारा
देश है। गोबर गैस व अन्य जैविक अपशिष्टों से सस्ती
बिजली पैदा कर ऊर्जा संकट से लड़ने की क्षमता हमारे
पास जरूर है,
मगर फिर भी स्थिति यह है कि ऊर्जा के
ही मुद्दे पर हम अन्य देशों की चिरौरी कर रहे हैं।
वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में
प्रकृति की अपूर्व देन कोर् मूत्ता रूप में लाने का
प्रयास सफल कर दिखाया है,
मधय प्रदेश के होनहार उद्यमियों
ने। जरा सोचिए, गोबर की
बदौलत बिजली पैदा कर अगर कई लघु उद्योगों की जरूरत
पूरी कर दी जाए तो केसा रहेगा?
स्थिति अविश्वसनीय सी मालूम पड़ती
है, लेकिन इसे सच कर
दिखाया है भोपाल निवासी राजेन्द्र सिंह ने। पेशे से
सिविल इंजीनियर राजेन्द्र जी का पोल्ट्री फार्म का
व्यवसाय है। पोल्ट्री उद्योग में प्रकाश की जरूरत तो
सर्वविदित है ही। अत: राजेन्द्र जी को अपना यह
व्यवसाय चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली की
आवश्यकता पड़ी। 1995 में
फार्म की स्थापना के साथ उन्होंने सरकारी बिजली का
कनेक्शन लिया। जैसी कि कल्पना की जा सकती है,
अनियमित
विद्युत आपूर्ति उनके व्यवसाय में खलल डालती रही।
ऊंपर से बिल भी भारी भरकम। परेशान श्री सिंह ने अपनी
जरूरत के लायक बिजली वफी वैकल्पिक व्यवस्था करने की
ठानी।
वैकल्पिक व्यवस्था के लिए उन्हें
जैविक अपशिष्ट ही सबसे उपयुक्त स्रोत जान पड़ा।
आर.एस. एग्रो फार्म नामक अपने पोल्ट्री फार्म के साथ
ही उन्होंने एक गौशाला भी खोल ली जिसमें लगभग
50 गाय व भैंसें
रखी गईं। इनके गोबर से गैस बनाने के लिए उन्होंने
गोबर गैस संयंत्र भी बनवाया। फिर शुरू हुआ लगातार
प्रयोगों का सिलसिला। जल्दी ही सफलता उनके हाथ लगी।
उन्होंने जेनसेट में ईंधन के रूप में थोड़े से डीजल
के साथ बायोगैस का प्रयोग कर बिजली का उत्पादन आरम्भ
कर दिया। प्रयोग सफल होने से उत्साहित राजेन्द्र जी
ने तीन गोबर गैस संयंत्र बनवा लिए और उनकी मदद से
अपनी जरूरत से भी ज्यादा बिजली पैदा करने लगे।
सरकारी बिजली की लुकाछिपी तो खत्म हुई ही,
साथ-साथ भारी बिल का बोझ भी उतर
गया। श्री सिंह के अनुसार बिजली बिल के 60-70
हजार रफपए अदा करने की बजाए अब
उन्हें सिर्पफ डीजल खरीदने के 10-15
हजार रफपए खर्च करने पड़ते हैं,
साथ में गाय-भैसों के लिए चारे
का इंतजाम करना पड़ता है। जिसकी कीमत दूध व अन्य
उत्पादों से वापस मिल जाती है। इतनी भारी बचत के साथ
सरलता से बिजली पैदा कर रहे श्री सिंह आज छोटे
उद्योगों को बिजली-आपूर्ति कर पाने में भी सक्षम
हैं। वे कहते हैं, ''अगर
आस-पास के व्यवसायी चाहें तो हम उन्हें रियायती दर
पर बिजली उपलब्धा कराएंगे।''
सोचने वाली बात है कि जब देश में
इतने सस्ते संसाधनों का विपुल भंडार सहज उपलब्धा हो,
साथ ही उनके अनुप्रयोग के लिए मेध
शक्ति व श्रमशक्ति भी हाजिर हो तो कभी ईरान के सामने
तेल के लिए और कभी अमरीका तथा अन्य देशों के सामने
परमाणु उफर्जा के लिए हाथ पसारने की क्या आवश्यकता
है। अपने इस प्रकृतिप्रदत्ता खजाने का सदुपयोग कर
जहां हम उफर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होंगे,
वहीं
रोजगार के भी अतिरिक्त अवसर विकसित कर पाएंगे।
इसी तरह दूसरी भी कहानी है अदम्य
इच्छाशक्ति की सफलता की। कुछ कर गुजरने की मानसिकता
से पाए परिणामों की। यह कहानी है मिलजुल कर किए गए
प्रयासों से विकास की नयी
धारा
बहाने की। यह एक करारा तमाचा है इतराते,
इठलाते बाजार के मुंह पर। यह एक
मिसाल है विवेंफद्रित उत्पादन व्यवस्था के जरिए
अर्थव्यवस्था को सशक्त करने की। आपके सामने प्रस्तुत
किया जा रहा वाकया है,
मोबानाकेरी गांव
का।
कर्नाटक राज्य के हासन जिले में
स्थित इस छोटे से गांव ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी
पहचान बनाई है,
वैकल्पिक
उफर्जा के माधयम से अपनी पेयजल समस्या दूर करने के
कारण। इस सूखाग्रस्त क्षेत्र में पेयजल की समस्या
लंबे समय से बनी हुई थी। काफी दूरी पर कुछ तालाब थे।
सरकार द्वारा कुछ नलकूप भी लगवाए गए। पर स्थिति में
कोई परिवर्तन न हुआ। कभी बिजली नदारद तो कभी सप्लाई
के लिए पानी गायब। ऐसे में ग्रामीणों ने वैकल्पिक
व्यवस्था करने की सोची। कुछ वर्षों पूर्व गांव वालों
के सहयोग से गोबर गैस चालित पेयजल संयंत्र स्थापित
किया गया। तब से ग्राम पंचायत की देखरेख में यह
संयंत्र काम कर रहा है। इस संयंत्र के चालू होने से
गांव वासियों को काफी राहत मिली है। स्थानीय निवासी
भानुमती बताती हैं कि अब वह बचे हुए समय का उपयोग
बच्चों को पढ़ाने के लिए करती हैं। कल्पना की जा सकती
है कि इस उपाय ने विकास के कितने द्वार खोले हैं।
सिर्पफ प्यास ही शांत नहीं हुई,
बल्कि इस योजना से गांव के
अंधोरे घरों में रोशनी भी फैली। गोबर गैस से चलने
वाले 5 हार्स पावर क्षमता
के जेनरेटर की सहायता से 750
किलोवाट बिजली पैदा की जा रही
है। बिजली की इस विपुल मात्रा से गांव के 150
घरों में लगातार 6
घंटे आपूर्ति की
जाती है। इस योजना के तहत गोबर गैस के दो प्लांट
स्थापित किए गए हैं।
खास बात यह है कि ग्रामीणों के
सामूहिक प्रयास से शुरू की गई इस योजना में सहयोग और
उपयोग दोनों ही क्षेत्रों में हर ग्रामवासी की बराबर
हिस्सेदारी है। हर घर से गोबर इकट्ठा किया जाता है,
लोग खुद संयंत्र तक गोबर
पहुंचाते हैं। संयंत्र पर मिल-जुलकर काम किया जाता
है। फिर सभी के बीच बिजली बांटी जाती है और पेयजल
पहुंचाया जाता है। जिस घर से जितना गोबर मिलता है,
उसे उस वजन के 60
प्रतिशत के बराबर गोबर गैस ईंधन
के लिए वापस कर दी जाती है। वाकई सामूहिक प्रयास व
उससे विकास कार्यों की सफलता का अनूठा उदाहरण बना
हुआ है,
यह मोबानाकेरी गांव।
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