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जनजागरण |
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घर बचाओ देश बचाओ अभियान |
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ब्रजेश कुमार झा |
आजकल
ऐसी पंक्तियां कई घरों में गूंज रही
हैं। आजादी के साठ साल पूरे होने को हैं। अब तक भारत
को विकास की अपनी दिशा तय कर लेनी चाहिए थी। लेकिन,
ऐसा नहीं
हो पाया है। देश की जनता परेशान है। करोड़ों परिवारों
को दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल रही है। वहीं नई
अर्थव्यवस्था यानी वैश्वीकरण के नाम पर विदेशी चीजों
के वास्ते बाजार तैयार किया जा रहा है।
ऐसी परिस्थिति में अक्षय जैन ने
'घर बचाओ-देश
बचाओ' का नारा दिया है।
वे 'दाल-रोटी'
पत्रिका और म्यूजिक अलबम के
माधयम से अपना संदेश पिछले कई वर्षों से देशभर में
पैफलाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह
कारवां तो जनता को ही चलाना है। जरूरी है सभी एक जुट
रहें। अक्षय जी कहते हैं कि पहली नजर में तो
'घर बचाओ देश-बचाओ'
अभियान का स्वरूप क्रांतिकारी
नहीं लगेगा। वह है भी नहीं। लेकिन,
इस अभियान में एक बड़ी लड़ाई के
बीज छिपे हुए हैं। हमें इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों
तक पहुंचाने की संभावनाएं तलाश करनी हैं। हमें यह
सोचना होगा कि हमारा जीवन और हमारी दुनिया अब बाजार
और बहुराष्ट्रीय वंफपनियों के कब्जे में क्यों है?
इसका जवाब यह है कि हमारे घर पर
हमारा कब्जा नहीं रहा। इसी को को धयान में रखते हुए
हमने नारा लगाया है कि 'घर
बचेगा तो समाज बचेगा,
समाज बचेगा तो देश बचेगा।'
अक्षय जैन भारत की तमाम समस्याओं का
कारण वैश्वीकरण को मानते हैं। उनके मुताबिक विदेशी
पूंजी और विदेशी संस्कृति से छुटकारा पाना बेहद
जरूरी है। बाजारीकरण के इस दौर में हमें देशी
उत्पादों पर फिर से भरोसा करना होगा। बाजार पर हमारी
निर्भरता कम से कम हो,
इसके लिए हर संभव कोशिश की जानी
चाहिए। यही मुक्ति का एक मात्र मार्ग है। हमें हर
हाल में भारतीय जीवनशैली को अपनाना होगा। यहां की
तमाम व्यवस्थाओं के भारतीयकरण के बारे में सोचना और
उसे क्रियान्वित करना होगा। आज परिस्थितियां विषम
हैं। लेकिन, रास्ते बंद
नहीं हुए हैं। सिर्फ हमें आगे बढ़ने की जरूरत है।
अक्षय जी ऐसे मौके पर कवि हस्तीमल 'हस्ती'
का एक शेर
याद दिलाते हैं-
'रास्ता
कहां नहीं होता।
सिर्फ हमको पता नहीं होता'
वे कहते हैं,
देश बड़ा है तो गरीबी भी बड़ी है।
सौ करोड़ लोगों की समस्याएं भी अंतहीन हैं। बिना लड़े
हार मान लेना मूर्खता और कायरता है। आखिरी पंक्ति के
लोगों को भी जीने का पूरा हक मिले,
ऐसा सोचने से हमें कौन रोक सकता
है? पिछले चार वर्षों से
अक्षय जैन 'घर बचाओ-देश
बचाओ' अभियान चला रहे
हैं। वैश्वीकरण के खिलाफ उन्होंने लम्बे समय तक
'दाल-रोटी'
पत्रिका का संपादन किया। इस
आंदोलन को देश में दूर तक पहुंचाने के लिए 'आगे
और लड़ाई है' नामक आडियो
सीडी तैयार की गई। इन गीतों के गीतकार स्वयं अक्षयजी
हैं। वैसे तो इनकी ख्याति एक कवि,
व्यंग्यकार और वक्ता के रूप में
है। लेकिन,
इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है
और वह है एक आंदोलनकारी की।
अक्षय जी पिछले कई सालों से बिना थके
अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका मानना है कि,
पहल करना जरूरी है। उन्होंने
स्वयं पहल की है। कई लोग अब उनके साथ हैं। वो कहते
हैं कि हमारे अभियान को और साथियों की जरूरत है। आज
नहीं तो कल, समानधार्मा
लोग एक साथ आएंगे। वक्त हमें साथ लाएगा। क्योंकि,
हमारा
जीवन खतरे में है। अभियान गति पकड़ रहा है। हलचलें
तेज हो रही हैं। अक्षय जी अपने उद्देश्य को पूरा
करने की ईमानदार कोशिश में लगे हैं। उम्मीद है भारत
की जनता अपने पारंपरिक मूल्यों को महसूस कर पाएगी।
और इनके साथ खड़ी होगी।
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