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 जनवरी,  2008

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जनसेवा

गरीबों के स्वास्थ्य की चिंता

छवि कौशिक

इस जग में अतिसामान्य जीवन गुजारने के लिए भी एक व्यक्ति को कम से कम रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत होती है। इसके साथ ही प्राकृतिक या अप्राकृतिक वजहों से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए इंसान को चिकित्सा की भी जरूरत पड़ती है। आज भी भारत की एक चौथाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। ऐसे लोगों को रोटी कपड़ा और मकान तक नसीब नहीं हो पा रहा है। ऐसे में एक बात तो साफ है कि देश की एक बड़ी आबादी चाह कर भी अपने स्वास्थ्य पर धयान नहीं दे पा रही है। ये अनेक छोटी-बड़ी बीमारियों से स्वयं ही जूझती है क्योंकि इनके पास डाक्टर के पास तक जाने के लिए पैसे नहीं होते। आवश्यक उपचार नहीं होने की वजह से ऐसे लोगों की बीमारी भयावह रूप धारण कर लेती है और कई बार तो इन्हें इसकी कीमत जान देकर भी चुकानी पड़ती है। गरीबों और जरूरतमंदों के ईलाज के नाम पर बनने वाली तमाम सरकारी योजनाएं अब तक खोखली ही साबित हुई हैं। पर अच्छी बात यह है कि दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से स्वार्थ पर आधारित होती दुनिया में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो दूसरों के लिए जीते हैं। ऐसे लोग उनकी खुशी में ही अपनी खुशी तथा सुख ढूंढते हैं।

जनसेवा को समर्पित दिल्ली में अनेक ऐसी स्वयंसेवी सस्थाएं और लोग हैं जो सरकारी या गैरसरकारी मदद से गरीबों को मुफ्रत शिक्षा, चिकित्सा जैसी अनेक सेवाएं प्रदान करने में लगे हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हैं-संगीता बुध्दिराजा। जो मीडिया की चकाचौंधा से दूर एक संस्था 'करुणा-प्रेम' के संग दिल्ली के कई इलाकों में जरूरतमंदों की सेवा कर रही हैं। उनकी संस्था बगैर किसी सरकारी सहायता के चल रही है। यह संस्था पिछले दस साल से गरीबों तथा जरूरतमंदो की सेवा में रत है। करुणा-प्रेम लोगों के स्वास्थ्य से संबंधिात समस्याओं को दूर करने के लिए काम कर रही है। इस संस्था से जुड़े लोग नि:स्वार्थ भाव से जनसेवा में लगे हुए हैं। इन लोगों का उद्देश्य बीमारी को दूर भगाना और आम लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता  फैलाना है। इस संस्था के साथ काम कर रही संगीता बुध्दिराजा अपनी पारिवारिक जिम्मदारियों का निर्वहन करते हुए समाज सेवा में लगी हुई हैं। किसी ने सही कहा है कि एक छोटी सी घटना संवेदनशील इंसान के जीवन का रुख बदलने के लिए पर्याप्त है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण दर्ज हैं। संगाीता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बात उन दिनों की है, जब संगीता स्कूल में पढ़ती थीं। संगीता बताती हैं, 'एक घटना ने मेरी सोच को बदल दिया। स्कूल के दिनों में मैं सोशल सर्विस क्लब की प्रमुख थी। क्लब की तरफ से एक बार हम कोड़िया कलोनी गए। जहां बस्ती के बच्चे शादी की जूठी पत्तलाें से बचे चावलों को इकठ्ठा कर उन्हें धाो कर खा रहे थे। यह मेरे लिए काफी बुरा अनुभव था। इस घटना ने मुझे झकझोर दिया। इसके बाद मैंने प्रण लिया कि दिन में एक बार ही खाना खाउंफगी और जितना हो सकेगा गरीबों की मदद करूंगी।'

इस घटना ने संगीता के मन को विचलित कर दिया और वे समाज सेवा की ओर मुड़ गईं। शुरुआत में व्यक्तिगत स्तर पर उन्होंने जनसेवा की। कुछ समय बाद वे करुणा प्रेम से जुड़ गईं। इस संस्था के साथ जुड़ने से पहले संगीता गरीब बच्चों को मुफ्रत शिक्षा देती थीं। अभी संगीता संस्था के साथ मिल कर दिल्ली की झुग्गियों में रहने वालों के बीच काम कर रही हैं। इन उपेक्षित बस्तियों में रहने वालों की सुधा लेने वाले विरले ही मिलते हैं। पर संगीता यहां रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याऐं को सुलझाने में ही सुखी हैं। झुग्गियाें में रहने वाले जरूरतमंदों को संगाीता अपनी संस्था के सहयोग से मुफ्रत उपचार करवा रही हैं। वे बीमार लोगों की सर्जरी में भी हाथ बंटाती हैं। अब तक उन्होंने करुणा प्रेम के साथ मिल कर सैकड़ों लोगों को संकट से उबारा है। यह पूछे जाने पर कि वे यह काम क्यों करती हैं? बगैर कुछ सोचे संगीता कहती हैं, 'मन की शांति के लिए। जब यहां से कोई मरीज ठीक हो कर जाता है तो वह जो दुआएं देता है, उसका कोई मोल नहीं होता है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात यह है कि हम जब एक मरीज को ठीक करते हैं तो सिर्फ उसी का भला नहीं होता बल्कि एक परिवार को नई दिशा मिलती है।' वाकई, ऐसे में यह कहना बिल्कुल वाजिब होगा कि इसी तरह छोटे-छोटे स्तर पर भी परिवारों का भला होता रहा तो  समाज पर इसका सकारात्मक असर पड़ना तय है। आज चारों तरफ पैसे का बोलबाला बढ़ गया है। जीवन के हर क्षेत्र में इसका काफी हद तक दखल हो गया है। समाज सेवा की राह चलने वालों को भी इस समस्या से दो-चार होना पड़ता है। पर असली सूरमा तो वही है, जो ऐसी समस्याओं से पार पाते हुए जनसेवा में लगा रहे। दरअसल, इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि अगर इरादे नेक हों तो कितनी भी मुश्किल राह आसान हो ही जाती है। संगीता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। यह पूछे जाने पर कि सरकार से न जुड़े होने पर दवाइयों का खर्च, मशीनों का खर्च कहां से आता है? वे कहती हैं, 'जब नीयत अच्छी हो तो खुदा भी रहम करता है। संस्था से जुडे लोग कुछ अपनी तरफ से मदद करते हैं। वहीं समाज में अभी भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अच्छे कार्य में अपनी शक्ति अनुसार आर्थिक मदद करते हैं। हमें ऐसे ढेरों लोग मिले हैं। समाज का भला चाहने वाले लोगों के सहयोग से हम जरूरतमंदों की सेवा कर पा रहे हैं।'

पिछड़े इलाकों में काम करने के दरम्यान आने वाली समस्याओं के संदर्भ में संगीता बताती हैं, 'वैसे तो हमें अधिकांश जगहों पर सहयोग ही मिला है। पर लोगों की निरक्षरता उनके और उनके स्वास्थ्य के आड़े आती है। आज भी हमारा देश अंधाविश्वास की गिरफ्त में है। हमारे सामने ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें हमने देखा है कि अंधाविश्वास की वजह से लोग आधाुनिक चिकित्सा पध्दति से इलाज करवाने मे कतराते हैं। इस दिशा में लोगों को जागरूक किए जाने की जरूरत है।' स्वास्थ्य और अशिक्षा के बीच के सबंधों को रेखांकित करते हुए संगीता बताती हैं, 'गरीबों के स्वास्थ्य से जुड़े हमारे पास जो मामले आते हैं, उनमें से अस्सी फीसदी मामले लापरवाही के होते हैं। जैसे बचपन में कोई जल गया तो उसका इलाज घर पर ही हुआ। प्राय: यह लापरवाही मजबूरी में होती है क्योंकि इलाज के लिए पर्याप्त पैसे मरीज या उसके घर वालों के पास नहीं होते।'

इस दिशा में जागरूकता फैलाने की खातिर उनकी संस्था प्रयासरत है। आम जन को जागरूक करने के लिए तथा उनका इलाज करने के लिए हर छ: महीने में बड़े-बड़े कैम्प लगते हैं और छोटे-छोटे कैम्प तो हर महीने किसी न किसी बस्ती में लगते ही हैं। इनके जरिए हर बार सैकड़ों लोगों के जीवन में खुशी का संचार होता है।

ईमेल: Chhavik112@yahoo.com

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन