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जनजागरण |
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गांधी
पर कठपुतलीगिरी |
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गीता पंत |
वतॅमान परिस्थितियों में यह बहुत
जरूरी है कि गांधी के बारे में सही समझ बने।
'अनुयाई
या आलोचक'
के
बजाय गांधी से दोस्ती की जरूरत है। एक ऐसा ही प्रयास
'राजस्थान
समग्र सेवा संघ'
द्वारा
हुआ है,
जिसमें
कठपुलती नाटक के मंचन द्वारा गांधी के सिध्दांतों और
विचारों का प्रचार-प्रसार
किया जा रहा है। गांधी के जीवन दर्शन को कठपुलती के
माधयम से लोगों तक ले जाने का यह पहला प्रयास है।
कठपुतली नाटक के माधयम से बापू के
'मोहन
से महात्मा'
(जो
नाटक का नाम भी है)
बनने
तक के सफर को बड़ी ही खूबसूरती के साथ दिखाया है।
करीब एक घंटे के इस नाटक में समग्र सेवा संघ के डेढ़
दर्जन पुरुष व महिलाओं की टीम महात्मा गांधी के बचपन
से लेकर मृत्यु तक के सफर को कठपुलती नाटक के माधयम
से जीवंत करने की कोशिश कर रही है। नाटक में घटनाओं
का मार्मिक चित्रण किया गया है,
जिसमें
बचपन में की गई गलतियों को सुधारने,
दक्षिण
अर्फीका में किए गए सफल सत्याग्रह,
गांधी
व आन्दोलनकारियों पर अंग्रेजों द्वारा किए गए
अत्याचारों सहित दांडी मार्च,
गोलमेज
सम्मेलन,
असहयोग
आन्दोलन,
भारत
छोड़ो आन्दोलन तथा कस्तूरबा गांधी की मृत्यु के
दृश्यों की भावपूर्ण प्रस्तुति है। कठफलती कालाकारों
ने गांधी की जेल यात्रओं,
आमरण
अनशन,
आजादी
के बदले देश विभाजन,
उसके
परिणामस्वरूप हुए सांप्रदायिक
दंगों को दृश्य व धवनि के सुंदर सम्मिश्रण द्वारा
जीवंत बना दिया है। वहीं कस्तूरबा गांधी के देहांत
पर विलाप करते गांधी और प्रार्थना सभा में नाथूराम
गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या के दृश्य उपस्थित
लोगों की आंखों में आंसू छलका देते हैं। गांधीजी की
मृत्यु पर पं.
जवाहर
लाल नेहरू द्वारा यह कहना कि
'देश
का प्रकाश बुझ गया'
से
पूरे माहौल में उदासी छा जाती है। नाटक की
सारगर्भिता व मार्मिक मंचन लोगों को यह मंथन करने को
प्रेरित करते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में गांधी
के विचार व दर्शन कितने सार्थक हैं। नाटक की रोचकता
व निरंतरता को बनाए रखने के लिए बीच-बीच
में 'रघुपति
राघव राजाराम'
और
'साबरमती
के संत'
जैसे
दिल को छूने वाले गीत-संगीत
का भी प्रयोग किया गया है। नाटक का मंचन इतना
प्रभावोत्पादक और सजीव है कि सभी मंत्रमुग्धा हो
जाते हैं। यही कारण है कि नाटक देखने के लिए हजारों
की भीड़ उमड़ रही है। विभिन्न स्कूलों,
समारोहों तथा विशेष आयोजनों में नाटक के प्रदर्शन के
बाद परिणाम भी काफी उत्साहजनक रहा है। बच्चों को
गांधी के विषय में अभी तक सिर्फ किताबों के माधयम से
जानकारी मिलती थी,
लेकिन
इस तरह के प्रयासों से जहां बच्चों का मनोरंजन होता
है,
वहीं
खेल-खेल
में बच्चे आजादी की कहानी और गांधीजी की शिक्षाओं को
भी आत्मसात कर लेते हैं,
जो वे
उबाऊ भाषणों और किताबों द्वारा नहीं ग्रहण कर पाते।
इस नाटक ने लोगों की भागदौड़ की जिंदगी में बापू के
अस्तित्व का एहसास कराया है।
'मोहन
से महात्मा'
की
र्स्किप्ट लिखने,
कठपुलती तैयार करने,
गाने व
डायलाग लिखने में सर्व सेवा संघ के अधयक्ष श्री सवाई
सिंह तथा डायरेक्टर मिथिलेश केमार और उनकी टीम को
करीब तीन माह का समय लगा। इसे गुलाबी शहर जयपुर के
स्कूलोंमें दिखाने की योजना थी,
परन्तु नाटक को युवाओं और बच्चों का
जो समर्थन मिल रहा है उससे इसकी मांग पूरे देश में
ही बढ़ा दी है।
नि:संदेह गांधी
आज
भी उतने ही प्रसंगिक हैं। भले ही हमने गांधी
को
सरकारी आफिसों की दीवारों और पुस्तकालयों की किताबों
में सीमित कर दिया,
पर अब समय आ गया है कि हम गांधी
दर्शन को जनसंचार माधयमों से जोडें तथा उसके
प्रचार-प्रसार में कठपुलती जैसे लोकमाध्यमों
का प्रयोग कर उसे आम जनता तक ले जाएं। पप्पेट शो
कठपुलती नाटक
'मोहन
से महात्मा' एक साधारण
आदमी के व्यक्तित्व की असाधारण
कहानी है।
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