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 जनवरी,  2008

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एक विकलांग ने किया कमाल

गुंजन कुमार 

बुलंद हौसलों और सच्ची लगन के सामने बड़ी रुकावटें भी परास्त हो जाती हैं। चित्रकार श्रीकांत दुबे भी इसी लगन और हौसलों का नतीजा हैं। उनकी एक उम्दा चित्रकार बनने की चाहत को उनकी विकलांगता भी नहीं रोक सकी। वे अपने चित्रों में शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां को इंडिया गेट पर शहनाई बजाते हुए दिखाने के साथ कृष्ण की लीला एवं प्रकृति के हर पहलू को जीवंत कर देते हैं। उनका यह काम उन सभी विकलांग लोगों को एक प्रेरण देता है, जो मदद मिलने के इंतजार में पूरी उम्र व्यतीत कर देते हैं। एक हादसे में अपना दाहिना हाथ गंवाने के बाद भी वे विलाप में आंसुओं की गंगा-जमुना बहाने की बजाय संघर्ष के अग्निपथ पर कला साधना में निमग्न हैं।

दायें हाथ से सभी काम करने वाले श्रीकांत एक दुर्घटना में अपने इसी हाथ को गंवा बैठे। यह घटना उनके लिए ऐसी थी जैसे किसी गायक से उसकी आवाज छीन ली गई हो। लेकिन श्रीकांत ने हार नहीं मानी और अपने दूसरे हाथ  से प्रयास शुरू किया, जिसमें वे पूरी तरह सफल भी रहे। पिछले दस वर्षों में वे हजारों पेंटिंग्स बना चुके हैं। आज श्रीकांत की पेंटिंग्स के प्रशंसक भारत के अलावा विदेशों में भी हैं। लेकिन इसकी जो कीमत उन्हें मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पाई है। आज भी बिक्री एवं प्रदर्शनी के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है। मध्यवर्गीय परिवार से होने के कारण उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी वहां नहीं लग पाती जहां उन्हें उचित दाम एवं सम्मान मिल सके। फिर भी चित्रकार दुबे अपने काम से खुश एवं संतुष्ट हैं। उनके जोश और जज्बे में कोई कमी नहीं आई है। श्रीकांत किसी की मदद की बाट भी नहीं जोहते हैं। उनका मानना है कि संघर्ष पथ पर अकेला चलने वाले की जीत तय है। अपने साथ हुई दुर्घटना के बारे में श्रीकांत दुबे बताते हैं कि जब डाक्टर ने कहा कि दायां हाथ काटना पड़ेगा तो पूरे परिवार में मातम छा गया था। फिर भी जान बचने को लेकर सभी लोग एकमत थे। हाथ कट जाने के बाद बायें हाथ से खाना भी नहीं खाया जा सकता था तो और काम करना दूर की बात थी। लेकिन अपने संघर्षरत प्रयास पर श्रीकांत ने कहा कि 'बिजली का करंट लगने के बाद बमुश्किल जान बच सकी। डाक्टर ने जब हाथ काटकर दिया तो मेरी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। मेरी मां ललिता दुबे ने मुझे हिम्मत बंधायी और मैं धरे-धरे बायें हाथ से काम करने लगा। बायें हाथ से पेंटिंग्स बनाना बहुत कठिन था। इससे थोड़ी सी असावधानी पूरी पेंटिंग को गंदा कर देती। मां ने मुझे पेंटिंग में भी काफी मदद की। मेरी पत्नी वंदना दुबे ने मुझे हमेशा ही अर्जुन बनने की प्रेरणा दी। जिसे सिर्फ मछली की आंख दिखाई देती थी। अभ्यास के सहारे आज मैं कठिन से कठिन पेंटिंग बनाने में भी सक्षम हो गया हूं।

उत्तार प्रदेश के गाजीपुर जिला स्थित खालीसपुर के रहने वाले श्रीकांत दुबे वर्तमान में पूर्वी दिल्ली के जगतपुरी इलाके में रहते हैं। राधोश्याम पार्क के सर्वोदय बाल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यरत श्रीकांत की पेंटिंग्स में भक्तिभाव साफ झलकता है। पिकासो, सतीश गुजराल की पेंटिंग्स से प्रभावित श्रीकांत अपनी पेंटिंग्स में पात्रों का स्पष्ट रेखांकन करते हैं। पात्रों के चेहरे पर उत्पन्न भावों को इस प्रकार अपने कैनवास पर उकेरते हैं मानो वह उक्त भाव लिए सामने खड़ा हो। एक हाथ कटने के बाद भी उनकी चित्रकारी में कोई कमी नहीं है। एक बड़े चित्रकार की सभी खूबियां उनमें समाहित हैं, लेकिन कड़ी मेहनत और लंबे अभ्यास से चित्रकारी में महारत हासिल करने के बाद भी वे गुमनाम हैं। अब तक उल्टे हाथ से इन्होंने हजारों पेंटिंग्स बनाई हैं। इनमें कई सीरिज के रूप में भी है। इनकी पेंटिंग्स में भक्तिभाव अधिक है।

इन्होंने भक्तिरस सहित नौ रसों को बखूबी अपने पेंटिंग्स में दिखाया है। क्रोध और सौंदर्यरस से लेकर वात्सल्य को गहराई से नहीं जानने वाला व्यक्ति भी उसे आसानी से समझ सकता है। अपनी लगन और मेहनत से श्रीकांत ने कई चित्रकारों को पीछे छोड़ दिया है। विकलांगता की दुहाई ये कहीं नहीं देते और न ही कहीं इसका रोना रोते हैं। विकलांगता को ही अपनी शक्ति बनाकर श्रीकांत चित्रकारी में आगे बढ़ते जा रहे हैं। हाथ कटने के समय भले ही इनकी हिम्मत जवाब दे रही थी, लेकिन आज इनके पास हुनर की कोई कमी नहीं है। पेंटिंग्स करना और उसकी  प्रदर्शनी लगाना उनका धयेय बन गया है। अपने इस ध्येय को वे अपने शिष्यों में बांट रहे हैं। स्कूल के छात्र भी इनसे कला की शिक्षा लेकर अपनी योग्यता को बढ़ाने में लगे हैं।

इन्होंने अपनी पेंटिंग्स के जरिए स्वर्गीय उस्ताद बिस्मिल्ला खां को इंडिया गेट पर शहनाई बजाते हुए दिखाया है। इसे बनाने के पीछे के मकसद पर उनका कहना था कि पूरा देश चाहता था कि बिस्मिल्ला खां इंडिया गेट पर शहनाई बजाएं। उनकी भी ये अंतिम इच्छा थी लेकिन यह पूरा नहीं हो सका। मैंने अपनी पेंटिंग्स के जरिए यह दिखाने की कोशिश की है कि इंडिया गेट पर शहनाई बजाते हुए बिस्मिल्ला खां और वहां का प्राकृतिक सौंदर्य कैसा होता। अब तक 5000 से भी अधिक पेंटिंग्स बना चुके श्रीकांत दुबे को अपने काम पर गर्व है। उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी मेहनत से आगे बढ़ता है। दूसरों के भरोसे रहने वाला कभी सफल नहीं हो सकता। मेहनत से कोई भी जंग जीती जा सकती है, चाहे आप कितना भी कमजोर क्यों न हों। अभी तक वे कारगिल युध्द, गाजीपुर के गांव, धर्म, दस अवतार सहित दर्जनों पेंटिंग्स की सीरीज निकाल चुके हैं।

उनका कहना है कि इस प्रकार की सीरीज निकालने के लिए कल्पना शक्ति के साथ-साथ उक्त विषय पर गहन शोध भी करना पड़ता है। जैसा कि मैंने गीता पर शोध करने के बाद उसकी सीरीज निकाली। चित्रकारों की दुनिया पर श्रीकांत दुबे का रुख कुछ गरम है। उनका मानना है कि इस क्षेत्र मे नए लोगों को काफी संघर्ष करना पड़ता है। यहां भी बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने से बाज नहीं आती है। नए उभरते चित्रकारों का पैसों के अलावा नामों के बीच खो जाना आम बात है। श्रीकांत कहते हैं-यदि उनके पास नौकरी नहीं होती तो वे भी पेंटिंग के ढेर में गुम हो जाते। नौकरी होने के बावजूद पेंटिंग के लिए अभी भी कभी-कभी घर एवं मित्रों से पैसा मांगना पड़ता है। क्योंकि पेंटिंग के सामान अत्यधिक महंगे होते हैं। पेंटिंग करना खर्चीला काम है। छोटे कलाकारों को उनकी पेंटिंग का उचित मूल्य नहीं मिलता है, जबकि कला बाजार में नामी कलाकारों के अधूरे कामों की भी बोली लगती है। यहां भी सिर्फ नाम बिकता है। असमानता भरे इस समाज से लड़ने की जिद्द श्रीकांत ने अभी नहीं छोड़ी है। अपने कामों से वे प्रशंसा बटोरने में लगे हैं। श्री दुबे आज उन सभी इंसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत हो सकते हैं जो अपने को कमजोर एवं बेबस समझते हैं।

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 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन