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जनजागरण |
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एक अनोखी प्रथा की वापसी |
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डा. सुरेश मिश्र |
आधुनिकता
और विकास के इस दौर का असर जनजातीय
समाज पर भी बहुत हुआ है। इससे उनकी माली हालत में सुधार
तो हुआ है लेकिन उनकी कुछ ऐसी परम्पराएं और रिवाज
गायब होते जा रहे हैं जो साझा जीवन प्रणाली और आपसी
सहयोग के आधारस्तंभ
थे। झाबुआ के भील समाज में भी कुछ ऐसे रिवाज प्रचलित
थे जो एक दूसरे की नि:शुल्क मदद करने के लिए बनाए गए
थे। ऐसा ही एक रिवाज था अड़जी-पड़जी का।
अड़जी-पड़जी यानी काम के बदले काम,
मेहनत के बदले मेहनत,
विशेषकर खेती से संबंधित कार्यों
में एक-दूसरे को नि:शुल्क मदद करना। जनजातीय समाज
में एक-दूसरे के कामों में मदद करने की परम्परा रही
है। एक-दूसरे को सहयोग करते हुए अपने सभी काम
जैसे-फसल की बुवाई, फसल
कटाई, निराई-गुड़ाई,
खेतों की जुताई,
मेड़बंदी,
घास कटाई,
कुआं खोदना,
घर बनाना तथा कई तरह के कार्यों
में श्रम के स्तर पर सहयोग किया जाता था। अड़जी-पड़जी
में काम के बदले में किसी प्रकार का भोजन या शराब
नहीं दी जाती, बल्कि साथी
ग्रामीण के सहयोगी काम को एक कर्ज के रूप में
स्वीकार किया जाता है और जिसने भी जितना काम किया,
उतना काम दूसरा व्यक्ति भी
आवश्यकता पड़ने पर उस व्यक्ति का करेगा,
यह तय रहता है। इसका हिसाब बहुत
साफ रखा जाता था,
जिससे जरूरत पड़ने पर सभी को एक-दूसरे
की मदद मिल सके। काम करने वाले सभी लोग अपने-अपने घर
से खाना लेकर जाते थे तथा नियत कार्य करते थे जिससे
पैसा और अन्य खर्च की भी इसमें बचत होती थी।
जनजातीय समाज ने अपनी फरातन परम्परा
को छोड़कर जब आधुनिक
जीवन शैली को अपनाया तो इसकी वजह से आपसी सहयोगी
रिश्ते भी खत्म हुए। लोगों में स्वार्थ बढ़ा,
सहयोग की भावना खत्म हुई,
मुद्रा का
जोर बढ़ा और पिछले कुछ दशकों में अड़जी-पड़जी परम्परा
टूट गई।
लेकिन झाबुआ जिले की पेटलावद प्रखंड
के
92 गांवों में अब हालात बदल गए
हैं। वहां अब अड़जी-पड़जी की प्रथा को फिर से अपनाकर
भील लोग आपस में सहयोग करते हैं। इसका श्रेय पेटलावद
प्रखंड के रायफरिया गांव की 'संपर्क'
नामक संस्था के कार्यकर्ताओं को
जाता है। इन कार्यकर्ताओं ने अपने प्रमुख निलेश
देसाई के मार्गदर्शन में ग्रामीणों के साथ मिलकर
सहयोग की फरानी परम्परा को जीवित करने का संकल्प
किया और इस पर काम करना शुरू किया। सम्पर्क संस्था
ने वर्ष 1987-1988 के
दौरान नुक्कड़ नाटकों द्वारा अड़जी-पड़जी की परम्परा को
समाज में स्थापित करने का प्रयास किया। इसके तहत
विभिन्न गांवों में बनाए गए स्वसहायता समूहों तथा
अन्य समूहों की बैठक में ग्राम चौपाल पर ग्रामीणों
के साथ मिलकर इस परम्परा के टूटने से हो रहे नुकसान
पर गंभीर चर्चा की गई। अड़जी-पड़जी को फन: प्रचलन में
लाने के लिए कार्य की प्रकृति के हिसाब से
10-15 लोगों के कई समूह बनाए
गए। बारी-बारी से हर सदस्य के यहां खेती-बाड़ी से
जुड़े ऐसे सभी कामों जिनमें मजदूर बुलाए जाने की
आवश्यकता पड़ती थी, आपसी
सहयोग से निपटाना तय किया गया। सम्पर्क के नाटकों के
मंचन में दर्शाया गया कि अड़जी-पड़जी के क्या-क्या
फायदे हैं। प्रारंभ में इस प्रकार के नाटकों के मंचन
का प्रभाव तात्कालिक ही होता था। जब वास्तविक काम की
जरूरत होती थी तो लोग श्रम का विनिमय करने के लिए
तैयार नहीं होते थे। संपर्क के सतत प्रयास तथा गांव
में समुदाय के साथ लगातार बैठकों में इस बात पर जोर
दिया जाता रहा कि आम तौर पर जनजातीय परिवार में नकद
पैसे नहीं होते,
जिसकी वजह से हमारा काम प्रभावित
होता है। इसलिए जरूरी है कि हम मौद्रिक प्रचलन को कम
करके आपसी श्रम के महत्व को समझें।
एक औसत जनजातीय परिवार को अपने
कृषिगत कार्यों में ही मजदूरी के रूप में प्रतिवर्ष
2500
से 3000
रफपए तक की जरूरत पड़ती है जो
उसके पास नहीं ही होता है। इस रफपए की व्यवस्था के
लिए उसे कर्ज लेना पड़ता है जिससे उसकी कृषि आय घट
जाती है और ब्याज के चर्क में पंफसकर वह अपनी मेहनत
की कमाई साहूकार को दे देता है। वह चर्क हम तोड़ सकते
हैं, यदि हम आपसी सहयोग
के रिश्ते को अपना लें। इस प्रकार के समझाने का
धीरे-धीरे
गांव में असर पड़ा और प्रारंभ में इक्के-दुक्के ही
सही,
लोगों ने अड़जी-पड़जी द्वारा अपने
काम शुरू किए। इनकी सफलता तथा आर्थिक बचत को देखकर
और भी लोग उत्साहित हुए और श्रम का लेन-देन व्यापक
स्तर पर पैफलने लगा। इसका परिणाम यह निकला कि
गांव-गांव में अड़जी-पड़जी परम्परा फन: शुरू हो गई।
लोग उत्साहपूर्वक श्रम का सहयोग करने के लिए जाने
लगे। यह सहयोग की मात्र और अवधि के स्तर पर
अड़जी-पड़जी हेतु बुलाने वाले के यहां )ण के रूप में
अलिखित रूप से दर्ज होता था और बाद में सहयोग करने
वाले की आवश्यकता के हिसाब से यह श्रम लौटाया जाने
लगा। इस वजह से बिना मजदूर बुलाए ही गांव में
खेती-बाड़ी के श्रमप्रधान
खर्चीले कार्य बिना पैसे के ही पूरे होने लगे। इससे
गांव में लोगों के कृषि पर होने वाले खर्च में काफी
बचत होने लगी और कृषि की लागत में कमी आई।
ऐसा नहीं है कि सम्पर्क ने समाज की
कुरीतियों को दूर करने और अच्छे रिवाजों को
फनर्जीवित करने का जो प्रयास किया,
वह लोगों ने एकदम स्वीकार कर
लिया। इन प्रयासों का विरोध जनजातीय समाज के निहित
स्वार्थों वाले वर्ग ने किया। विरोध करने में गांव
के एक-दो प्रभावशाली परिवार भी थे,
जो गांव वालों को कर्ज देते थे,
बेगार कराते थे,
सरकारी कामों में आगे रहते थे और
थाने कचहरी के मामलों में दलाली करते थे। विरोध करने
में वे लोग भी थे जो भीलों की परम्पराओं व रिवाजों
के
धार्मिक
नेता थे।
इन रिवाजों में सुधार
से उनके हितों पर सीधी
चोट
पहुंचती थी। सामाजिक सुधार
के प्रयासों ने उन लोगों के कान खड़े कर दिए जो अब तक
एकमुश्त जनजातीय वोटों की सौदेबाजी करते थे। लेकिन
गांव वालों को
धीरज
से समझाकर संस्था ने अपना काम जारी रखा और उसे
र्कमश: सफलता मिलती गई। अड़जी-पड़जी अपनाने से प्रसन्न
जनजातीय किसानों का कहना है कि इससे सबसे बड़ा लाभ यह
हुआ कि खेती के काम में अब नुकसान की संभावना काफी
कम हो गई,
क्योंकि अधिकांश काम वे स्वयं ही
कर लेते हैं। साथ ही सबके सहयोग से सबका काम समय पर
हो जाता है और किसी की भी खेती पिछड़ती नहीं है।
अड़जी-पड़जी में एक बड़ी धनराशि की बचत होती है। लोगों
में, विशेषकर महिलाओं में
सामूहिक श्रम की प्रवृत्ति का विकास हुआ है। साथ
मिलकर कार्य करने की भावना से विखंडित समाज फन:
जुड़ाव की ओर अग्रसर हो रहा है। अड़जी-पड़जी से काम
करने का एक बड़ा प्रभाव यह देखने को मिलता है कि
जनजातीय समाज में आमदनी बढ़ने की वजह से घर में
बच्चों की देखभाल बेहतर तरीके से हो सकी। एकसाथ काम
करने से जनजातीय परिवारों में एकता की भावना भी बढ़ी
तथा वे संगठन की ताकत को महसूस कर सके,
जिससे
उनका सामाजिक सशक्तिकरण भी बढ़ा।
जिस प्रकार झाबुआ जिले के पेटलावद
प्रखंड के गांवों में जनजातीय लोगों की उपयोगी फरानी
परम्पराओं को फिर से जीवित करने का सफल प्रयास हुआ
है,
वैसा ही प्रयास अन्य स्थानों पर
करने की जरूरत है। इससे न सिर्फ जनजातीय लोगों के
सामाजिक मूल्यों की रक्षा होगी,
बल्कि उनका जीवन
भी बेहतर हो सकेगा। जनजातीय समुदायों के इन रिवाजों
को पहचानना और उन्हें फिर से समाज में स्थापित करना
जनजातीय समुदाय के गौरव की प्रतिस्थापना की ओर उठाया
गया सार्थक कदम होगा। |