|
जनसेवा |
|
दिव्य प्रेम सेवा मिशन |
|
रविशंकर |
आधुनिकता
की
चकाचौंध से भरे आज के दौर में जब युवा वर्ग चमक-दमक
वाले कैरियर के पीछे भाग रहा है,
वहीं कुछ युवक ऐसे भी हैं,
जिन्होंने समाज सेवा को ही अपना
कैरियर बना लिया है। समाज में उपेक्षित व वंचित वर्ग
की सेवा करने का लक्ष्य लेकर जीवन जीने वाले ये साधारण
से दिखने वाले युवक अविश्वसनीय प्रतीत होने वाले असाधारण
और महत्वपूर्ण काम कर गुजरते हैं। ऐसे ही एक युवक
हैं आशीष गौतम,
जिन्होंने
समाज के सर्वाधिक उपेक्षित वर्ग,
कुष्ठ रोगियों की सेवा का व्रत
लिया है। स्वामी विवेकानंद के सेवा-दर्शन से प्रेरित
आशीष गौतम, और उनके कुछ
साथियों ने कुष्ठ रोगियों की पीड़ा और समस्याओं को
समझकर जिस सेवाकार्य का बीज डाला था,
वह आज दिव्य
प्रेम सेवा मिशन के रूप में एक विशाल वटवृक्ष हो गया
है।
अद्भुत सेवाव्रती
22
अक्टूबर,
1962
को
जन्मे श्री गौतम प्रारंभ से ही आधयात्मिक व सामाजिक
सोच रखते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए.,
एल.एल.बी. करने के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
के प्रचारक बने।
1988
से
1995
तक
प्रचारक रहने के बाद आधयात्मिक प्रवृत्तिा के कारण
वे हिमालय क्षेत्र में भ्रमण के लिए निकल गए।
प्रारंभ में गंगोत्री और बाद में वे हरिद्वार में
रहे। हरिद्वार में रहते हुए उन्होंने कुष्ठ रोगियों
की समस्या का नजदीक से अधययन किया। चंडीघाट के पास
की बारह-पंद्रह सौ की आबादी में से लगभग
500
कुष्ठ
रोगी हैं। उन्होंने देखा कि इनमें से अनेक ऐसे हैं
जो वास्तव में अब कुष्ठ रोगी नहीं हैं। उनका कुष्ठ
रोग समाप्त हो चुका है परंतु उनकी रोग प्रतिरोधक
क्षमता नष्ट हो जाने के कारण यदि उन्हें सामान्य घाव
भी होता है तो वह जल्दी ठीक नहीं होता। पूर्व में
कुष्ठ रोगी होने के कारण समाज में वे उपेक्षित रहते
हैं और उनके घावों की ठीक से मरहम-पट्टी नहीं हो
पाती। इसलिए कुष्ठ रोग न होने पर भी केवल सामाजिक
उपेक्षा के कारण उनके घाव सड़ते रहते हैं और उनके अंग
गलते रहते हैं। श्री गौतम ने यह देखने के बाद अपने
कुछ सहयोगियों के साथ उनकी मरहम-पट्टी का काम
प्रारंभ किया। कुछ दिन यह काम करने के बाद उन्हें
लगा कि यह काम तात्कालिक रूप से तो अच्छा है,
लेकिन
इससे इस समस्या का कोई सामाजिक हल नहीं निकल सकेगा।
उन्होंने यह भी देखा कि इन कुष्ठ रोगियों के बच्चे
स्वस्थ और सक्षम होने पर भी समाज की उपेक्षा के
शिकार होते हैं। समाज में कुष्ठ रोग के बारे में
फैली अज्ञानता का अभिशाप इन निर्दोष मासूम बच्चों को
भोगना पड़ता है। माता-पिता के कुष्ठ रोगी होने के
कारण गरीबी की मार तो इन पर पड़ती ही है,
साथ ही
समाज की उपेक्षा व तिरस्कार के कारण भी ये बच्चे
असामाजिक जीवन जीने को अभिशप्त होते हैं। श्री गौतम
ने यह सब देखकर इनके लिए कुछ करने का निश्चय किया और
उनके इस निश्चय से
12
जनवरी,
1997
को दिव्य प्रेम सेवा मिशन नामक प्रकल्प का जन्म हुआ।
प्रारंभ के दिन
प्रारंभ में इलाहाबाद से आए आठ
कार्यकर्ताओं ने चंडीघाट के पास हनुमान मंदिर के
निकट झोपड़ी डालकर चिकित्सा केंद्र प्रारंभ किया।
दवाओं की व्यवस्था भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स के
कर्मचारियों ने की। लोगों के घरों में जो दवाएं
व्यर्थ पड़ी रहती थीं परंतु जिनकी समय-सीमा समाप्त
नहीं हुई रहती थी,
ऐसी दवाएं मिशन द्वारा अपने
स्थान पर संग्रहित करवाई गईं। दवा देने के लिए एक
चिकित्सक का भी प्रबंध किया गया। इसके लिए गुरुकुल
कांगड़ी विश्वविद्यालय के मेडिकल छात्रों को जोड़ा
गया। इसी क्रम में मार्च, 1998
में कुष्ठ रोगियों के 15
बच्चों को लेकर चंडीघाट में सेवा
कुंज के नाम से एक छात्रावास प्रारंभ किया गया। सन्
2002 में मिशन ने
हरिद्वार से ऋषिकेश मार्ग पर 15
बीघे जमीन खरीदी और वहां वंदे
मातरम् कुंज के नाम से एक विधिावत छात्रावास प्रारंभ
किया।
वर्तमान स्वरूप
वर्तमान में हरिद्वार स्थित सेवा
कुंज परिसर से कई प्रकल्प संचालित होते हैं। आस-पास
की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों,
कुष्ठ रोगियों ओर वनगुर्जरों के
लिए समिध
नामक एक सामान्य चिकित्सालय चलाया
जाता है। कुष्ठ रोगियों की नियमित मरहम पट्टी और
उन्हें आवश्यक दवाएं उपलब्धा कराने के लिए सुश्रुत
अल्सर केयर सेंटर काम कर रहा है। कुष्ठ रोगियों और
आस-पास की उपेक्षित बस्तियों के बच्चों के लिए माधव
राव देवले शिक्षा मंदिर नामक विद्यालय चलाया जा रहा
है। सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले उन बच्चों के लिए
एकल विद्यालय है जो रास्तों के अभाव एवं जंगली
जानवरों के भय से विद्यालय नहीं आ पाते
वंदे मातरम् कुंज में प्रदीप वाटिका
नामक छात्रावास है जहां देश के
12 प्रांतों से आए हुए कुष्ठ
रोगियों के स्वस्थ बच्चे रहते हैं और उनके लिए दिव्य
भारत शिक्षा मंदिर नामक विद्यालय चलाया जाता है।
प्रदीप वाटिका दिव्य प्रेम सेवा मिशन का एक अभिनव
प्रयोग है। इस छात्रावास के संचालन के लिए कभी कोई
सरकारी सहायता नहीं ली गई। हांलाकि समाज का भरपूर
सहयोग मिशन को मिलता रहा,
परंतु समाज कुछ धन देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न
समझ ले,
इसके प्रति मिशन के कार्यकर्ता सदैव
प्रयत्नशील रहते हैं।
स्वावलंबी
भविष्य
छात्रावास में रह रहे बच्चों के
संतुलित विकास के लिए विविध प्रकार के शैक्षिक,
शारीरिक और आधयात्मिक कार्यक्रम
चलाए जाते हैं। शैक्षिक विकास के लिए उन्हें सामान्य
शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी शिक्षा भी दी जाती है,
ताकि ये बच्चे आगे चलकर अपने
पैरों पर खड़े हो सकें। तकनीकी शिक्षा के तहत सिलाई,
बैनर लिखना,
साज-सज्जा के काम,
मोमबत्ती व अगरबत्ती बनाना,
मधु मक्खी पालन,
कंप्यूटर आपरेटिंग जैसे काम
सिखाए जाते हैं। शिक्षा के साथ-साथ संस्कार के लिए
प्रात: एवं सायं दैनिक अग्निहोत्र,
गंगा आरती और 'हरे
रामा हरे कृष्णा' का पाठ
आदि कार्यक्रम होते हैं। बच्चों को धयान का भी
अभ्यास करवाया जाता है। छात्रावास में बच्चों को
दिया जा रहा तकनीकी प्रशिक्षण छात्रावास के आय का
स्रोत भी बन रहा है। मधु
उत्पादन और मोमबत्ती निर्माण से प्रतिमाह लगभग बीस
हजार रुपयों की आमदनी होती है। इसी प्रकार एक अनूठे
प्रयोग के रूप में गुलाब की खेती की जाती है जिससे
वर्तमान में 40-50
हजार रुपए मासिक
की आय होती है।
चण्डीघाट में रहने वाली गरीब,
निराश्रित महिलाओं को स्वाबलंबी
बनाने की दिशा में एवं उनमें आत्मविश्वास की भावना
का पोषण करने हेतु सेवा मिशन द्वारा समृध्दि का
संचालन किया जा रहा है। समृध्दि प्रकल्प के माधयम से
महिलाओं को हस्तनिर्मित कागज के विविध उत्पाद जैसे
डायरी, फाइल,
फोल्डर,
आफिस स्टेशनरी,
कैरी बैग,
लैम्प शेड,
ग्रीटिंग कार्ड,
सी.डी. कवर,
मोबाईल स्टैण्ड जैसे 80
प्रकार के
उत्पाद बनाए जाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। उनके
द्वारा निर्मित उत्पादों की बिक्री की भी व्यवस्था
की गई है।
सेवा मिशन के वन्देमातरम् कुंज परिसर
में एक आदर्श गौशाला की स्थापना की गई है। वर्तमान
समय में यहां
15 गायों का पालन हो रहा है,
जिससे लगभग 25
से 30
लीटर दूध प्रतिदिन प्राप्त होता है। इसका प्रयोग
बालकों के पोषण पर किया जाता है। गाय के गोबर,
गौमूत्र
आदि का प्रयोग जैविक कृषि एवं बागवानी आदि के लिए
किया जाता है। वन्देमातरम् कुंज परिसर में बालकों के
माधयम से सब्जी की खेती तथा बागवानी आदि का कार्य भी
किया जाता है।
मिशन के संयोजक श्री संजय कुमार
बताते हैं कि हमारा उद्देश्य एक छात्रावास या
स्वास्थ्य केंद्र चलाना भर नहीं है। समाज में कुष्ठ
के बारे में फैले अंधविश्वासों को दूर करने और कुष्ठ
रोगियों के प्रति समाज की उपेक्षा समाप्त करना मिशन
का मुख्य उद्देश्य है। इसलिए इन प्रकल्पों को चलाने
के लिए सारी सहायता समाज से केवल आर्थिक अनुदान के
रूप में ही नहीं,
बल्कि श्रमदान,
अधयापन,
स्वास्थ्य केंद्र
संचालन में सहयोग जैसे प्रत्यक्ष कार्यों के माधयम
से भी ली जाती है।
समाज में कुष्ठ रोगियों के प्रति
व्याप्त उपेक्षा को दूर करने के लिए मिशन द्वारा
रामकथा योजना भी चलाई जाती है। वर्ष में
2-3
स्थानों पर इसका आयोजन किया जाता
है। इसके लिए आयोजन स्थल के आस-पास व्यापक संपर्क
किया जाता है। श्री संजय ने बताया कि बड़ी रामकथा के
आयोजन में 200 कार्यकर्ता
लगते हैं और उस स्थान पर 100
से अधिाक बैठकें करनी होती हैं।
इस प्रकार 15-20 हजार
लोगों से सीधा
संपर्क हो जाता है और उन तक मिशन की
बातें आसानी से पहुंच जाती हैं। विजय कौशल जी महाराज
जैसे संत के कारण रामकथा के सभी आयोजन अत्यंत सफल
सिध्द होते हैं।
सामान्यत: लोगों की कल्पना होती है
कि ऐसे सामाजिक या सेवाकार्यों में लगे लोग गृहस्थ
या पारिवारिक नहीं होते अथवा होते हैं तो उनका जीवन
काफी दुखमय होता है। परंतु मिशन ने इस अवधारणा
को भी गलत सिध्द कर दिया है। श्री आशीष गौतम के
अतिरिक्त वंदेमातरम् व सेवा कुंज में लगभग सभी
कार्यकर्ता गृहस्थ हैं और सपरिवार वहीं रहते हैं।
समाज की सेवा ही उनका कैरियर,
व्यवसाय
आदि सब कुछ है। हालांकि प्रारंभ में यह प्रारंभ में
इतना सरल नहीं था।
श्री संजय कुमार बताते हैं कि कुष्ठ
रोगियों के लिए काम करना है,
यह जानकर
परिवारों में शुरुआत में कुछ विरोध हुआ था। परंतु
कार्यकर्ताओं के दृढ़ निश्चय ने इस विरोध को सहयोग
में बदल दिया। श्री संजय जोर देकर कहते हैं कि आज का
नवयुवक दिग्भ्रमित नहीं है। प्रेरणा मिलने पर वह
सेवा के ऐसे कार्यों में लग सकता है। उचित प्रेरणा व
दिशा के अभाव में ही वह दिग्भ्रमित दिखता है।
संपर्क :
सेवाकुंज, चंडीघाट,
हरिद्वार, (उत्तरांचल), दूरभाष :(01334)222211
email :
divya_prem03@hotmail.com
website :
www.divyaprem.org |