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धर्मसत्ता |
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दवाओं की
मुनाफाखोरी
के
खिलाफ |
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डा. समित शर्मा |
मरीजों
का
शोषण व दवा व्यापार में मुनाफाखोरी हमारे समाज के
लिए गंभीर चुनौती है। आजादी के साठ वर्ष बाद भी हम
अपने देशवासियों
को
प्राथमिक उपचार व आवश्यक दवाईयां उपलब्ध नहीं करवा
पाए हैं।
'सन 2000
तक सबके लिए स्वास्थ्य'
का क्या हश्र हुआ यह सभी को पता
है। पर, सोचने की बात है
कि क्या, वास्तव में हम
लोग, हमारे सभी
देशवासियों को उपचार व दवा दिलवा पाएंगे?
क्या,
आज साधारण
सी बिमारियों का उपचार भी लाखों करोड़ों गरीबों की
पहुंच से बहुत दूर नहीं है?
क्या,
वास्तव में साधारण
बीमारियों का इलाज भी बहुत महंगा नहीं हो गया है?
आज बहुत से बीमार लोग तो इलाज काफी
महंगा होने के कारण मजबूरी में ही डाक्टर के पास
जाते हैं। लाखों की संख्या में गरीब लोग ऊची कीमत
होने के कारण दवाईयां नहीं खरीद पाते व काल का ग्रास
बन जाते हैं। इस कारण कई गरीब बच्चे अनाथ हो जाते
हैं,
कई महिलाएं विधवा हो जाती हैं और
कई माताओं की गोद सूनी हो जाती है। क्या,
हम इन लोगों की जान बचा सकते हैं?
क्या,
यह संभव है?
इन सब प्रश्नों से व्याकुल होकर
महंगे इलाज की समस्या के कारणों पर जब शोध किया गया
तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
यह पता लगा कि दवा कंपनियों की
मुनाफाखोरी,
ब्रांड नाम की मोनोपोली व
चिकित्सा व्यवसाय में मोटे कमीशन के कारण मरीजों का
जमकर शोषण किया जा रहा है। अधिकतर दवाओं का बिक्री
मूल्य उनके उत्पादन लागत से बहुत ज्यादा है। साधारण
उपयोग में आने वाली कुछ दवाइयों का बिक्री मूल्य
उसकी लागत मूल्य से दस से बीस गुणा तक है। जैसे
जुकाम की गोली सेट्रिजिन का लागत मूल्य डेढ़ से दो
रुपया प्रति दस गोली है लेकिन मरीज को बाजार में यह
25
से 30
रुपए में दस गोली मिलती है। इस प्रकार बुखार की गोली
निमेसुलिड की दस गोलियां दो रुपए में बनती हैं। पर
बाजार में दस गोलियों की कीमत 25
से 35
रुपये तक है। इसका मतलब यह है कि जब जुकाम होने पर
हम यह दवाइयां बाजार से खरीदते हैं तो हम इनकी
वास्तविक कीमत से बहुत ज्यादा कीमत चुकाते हैं। मान
लिया जाए कि अगर हम इन सभी दवाइयों की दस-दस गोलियां
खरीदें तो हमें (25+30+75
त= 130)
कुल 130
रुपए चुकाने होंगे। पर वास्तव
में इनकी कीमत है (2+2+14=18)
कुल
18
रुपए मात्र।
अब रामू नाम के एक ठेला मजदूर का
उदाहरण लें,
जिसे अपने निमोनिया से पीड़ित
बच्चे के लिए डाक्टर ने एक एन्टिबायोटिक का
इन्जेक्शन लाने को कहा है। अमिकासिन 500
नाम के इस इन्जेक्शन की वास्तविक
कीमत मात्र 9.90 रुपए है।
पर इस पर 70 रुपए मूल्य
अंकित है। इसका मतलब रामू को यह इन्जेक्शन 70
रुपए देने पर ही मिल सकेगा। पर
उसके पास तो सिर्फ 12
रुपए हैं। अब क्या होगा?
क्या वह अपने बच्चे के लिए इन्जेक्शन खरीद पाएगा?
क्या बिना इंजेक्शन के उसके
बच्चे की जान बच पाएगी?
भारत में जहां 26 करोड़ से
ज्यादा लोग दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पाते,
वे महंगी दवाइयों के लिए पैसे
कहां से लायें? क्या,
रोज बहुत से गरीब बच्चे इसी तरह
दवा के अभाव में मर नहीं जाते?
सम्पन्न व्यक्ति के साथ तो सिर्फ
धोखा
हो रहा है लेकिन गरीब पर तो यह घोर अत्याचार है।
उसकी तो जान दांव पर लगी है। क्या उसकी यही नियति है?
क्या हम लोग संवेदनहीन हो गए हैं?
क्या हम कुछ भी नहीं कर सकते?
क्या,
हमें इस हत्यारी व्यवस्था को बदलने का प्रयास नहीं
करना चाहिए, जिसके कारण
असमय ही कई लोग काल का ग्रास बन जाते है?
सामाधान:-
जरा सोचें,
अगर यह जीवन रक्षक इंजेक्शन
जिसकी वास्तविक कीमत मात्र 9.90
रुपये हैं उसे हम मरीज को
70 रुपए के स्थान पर 11
या 12
रुपये में उपलब्ध करा दें तो बहुत से गरीब अपने
बच्चों के लिए दवा खरीद पाएंगे। इससे बहुत सी जानें
और बचाई जा सकेंगी। भारत जैसे गरीब देश में ऐसे
असंख्य लोग हैं जिनकी जेब में ठेला मजदूर रामू की
तरह ईलाज के लिए मात्र 10-12
रुपए तो हैं लेकिन 70
रुपए नहीं
हैं। ऐसे लोगों को तब तक ईलाज सुलभ नहीं कराया जा
सकता जब तक आवश्यक एवं जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें
उनके सामर्थ्य के अनुसार न हों। अगर किसी प्रकार हम
आवश्यक दवाओं की कीमतें कम कर पाएं तो बहुत से गरीब
लोग अपने खर्चे पर अपना इलाज स्वयं करा लेंगे।
दवा की कीमत कम करने
के लिए किसी सब्सिडी की भी आवश्यकता नहीं है। अगर
दवा बाजार में चल रही मुनाफाखोरी को नियंत्रित करें
एवं चिकित्सा व्यवसाय में बढ़ रही कमीशनखोरी को बन्द
कर दिया जाए तो दवा की कीमतें स्वत: ही कम हो जाएंगी
एवं मरीजों के ईलाज का खर्च बहुत कम हो जाएगा।
इसी सिध्दान्त को धयान में रखते हुए
झालावाड़ जिले में एक अभिनव प्रयोग किया गया। इसे दो
चरणों में लागू किया गया। पहले तो खुले बाजार से
नामी कंपनियों
(Cipla, Cadila,
Ranbaxy etc)
की दवाइयां उनके साल्ट नाम (Generic
name)
से
खरीदी गईं। उनकी कीमतें आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम
थीं। खरीद मूल्य पर
20
प्रतिशत लाभ जोड़कर ये दवाइयां जिला
अस्पताल के बाहर स्थित चारों सहकारी उपभोक्ता
भण्डारों पर बिक्री हेतु उपलब्ध कराई गईं। इसके साथ
ही इन सरकारी दवा की दुकानों के बाहर मूल्य सूचियां
भी टांगी गर्इं जिसमें इन दवाओं पर अंकित कीमत एवं
उनका बिक्री मूल्य दोनों दिखाया गया था।
दूसरे चरण में
डाक्टरों को ब्रांड विशेष की दवाइयों का मोह छोड़कर
सरकार की नीति अनुसार जेनरीक नाम से दवाइयों के
पर्चे लिखने के लिए तैयार किया गया। जब कम कीमत पर
दवाइयां सरकारी दुकानों पर उपलब्ध हो गईं और डाक्टर
इन दवाइयों को मरीजों को लिखने लगे तो बहुत सुखद
परिणाम सामने आए।
परिणाम: आंकड़े बताते
हैं कि यह प्रयोग वांछित परिवर्तन लाने में काफी हद
तक सफल रहा :-
मरीजों को बहुत सी दवाइयां सहकारी
भण्डार पर अंकित मूल्य से काफी कम कीमत पर मिलने
लगी। प्रतिस्पर्धा
के
चलते बहुत से मेडिकल स्टोर्स भी अपने ग्राहकों को
अंकित मूल्य से कम मूल्य पर दवा बेचने लगे। जेनरीक
नाम से दवा लिखने के कारण,
अस्पताल से मुत दवा प्राप्त करने
वाले मरीजों की संख्या में पांच गुना तक वृध्दि हुई,
क्योंकि
सभी सरकारी अस्पतालों में सभी दवाइयां जेनरीक नाम से
खरीदी जाती हैं। इस प्रकार कई हजार मरीजों को मुफ्रत
में ही दवा मिलने लगी।
ईलाज मुफ्रत अथवा सस्ता मिलने से
ओ.पी.डी. में आने वाले मरीजों की संख्या में वृध्दि
हुई। इसका मतलब बहुत से मरीज जो अस्पताल आने से
कतराते थे,
वे भी ईलाज के लिए आने लगे।
मरीजों की संख्या बढ़ने के बावजूद भी मेडिकल स्टोर्स
की बिक्री पचास प्रतिशत से भी कम रह गई है। इसका
मतलब जिले के लोगों की जेब से दवाइयों पर होने वाला
व्यय भी आधा
ही रह गया है। जब दवाएं ब्रांड नाम
से लिखी जाती थीं तो वे सभी दुकानों पर नहीं मिलती
थीं लेकिन अब चूंकि दवा का मूल (साल्ट/जेनरीक) नाम
लिखा जाता है तो इधर-उधर ढूंढने की बजाए ये किसी भी
दुकान से खरीदी जा सकती हैं।
पेंशनर्स को नई
व्यवस्था का लाभ सबसे ज्यादा मिला। अब तक वे दवा
पाने के लिए दुकान-दुकान भटकते थे लेकिन आज वे खुश
हैं कि अधिकतर दवाइयां उन्हें अस्पताल अथवा सहकारी
भण्डार से ही मिल जाती हैं। पेंशनर्स मेडिकल फण्ड के
मासिक खर्च में भी कमी आई है। इससे न सिर्फ राजकोष
में लाखों रुपयों की बचत होने लगी है बल्कि बड़ी
संख्या में पेंशनर्स को अपनी खर्च सीमा को बढ़वाने के
लिए भटकना नहीं पड़ेगा।
सरकारी कर्मचारियों के चिकित्सा व्यय
बिलों का भुगतान सरकार द्वारा किया जाता है। दवाइयों
की कीमत कम होने से औसत बिल की राशि भी कम हो गई।
इससे राजकोष पर पड़ने वाले भार में भी कमी आई है। कुछ
दवाइयां,
विटामिन आदि जिनका चिकित्सकीय
प्रभाव भी संदिध
है,
मरीजों को
सिर्फ इसलिए लिख दी जाती थीं ताकि एक कंपनी विशेष की
दवा की बिक्री बढ़े और डाक्टर को उससे कुछ लाभ मिले।
ऐसी अवांछित व अनावश्यक दवाइयों के साइड इफैक्टस भी
होते ही हैं। नई व्यवस्था में स्वत: ही इस पर भी
प्रभावी नियंत्रण हो गया।
जिला स्तर पर तो यह प्रयोग सफल हो
गया और मरीजों को इसका लाभ भी मिला। पर क्या यह
समस्या सिर्फ एक जिले की है?
यह शोषण तो पूरे देश में हो रहा
है। फिर इसका सम्पूर्ण निदान क्यों न हो?
क्यों न जो लाभ एक जिले के लोगों
को मिला, वह सभी
देशवासियों को मिले? और
ऐसा संभव भी है। वह भी बहुत आसानी से। केन्द्र सरकार
अपने एक छोटे से आदेश मात्र से इस शोषण की व्यवस्था
का काम तमाम कर सकती है। केन्द्र सरकार को आवश्यक
वस्तु अधिनियम, 1955 के
अन्तर्गत दवाइयों की अधिकतम कीमत निधर्रित करने का
अधिकार है। 1970
में सभी दवाओं की कीमतों पर सरकार का
नियंत्रण था। पर अब कुछ ही दवाओं की कीमतों पर सरकार
का नियंत्रण है। इसका मतलब शेष सभी दवाओं पर दवा
कंपनी अपनी मनमर्जी का मूल्य छाप कर मरीज से चाहे
जितने रुपए वसूल सकती है और आज ऐसा हो भी रहा है।
भारत में बहुत सी स्थानीय व
बहुराष्ट्रीय कंपनियां दवाओं पर कई गुना कीमत छाप कर
करोड़ों का मुनाफा कमा रही हैं। यह पैसा गरीब की जेब
से छीना जा रहा है। वो लोग जानते भी नहीं कि कौड़ियों
की लागत से बनने वाली दवाइयों को सोने के भाव बेचा
जा रहा है। दुख की बात यह है कि इस कारण बहुत से
गरीब लोग मर जाते हैं,
क्योंकि
उनके पास दवाएं खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं
होते हैं। हम खुली अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण की
कीमत गरीब देश-वासियों की जान देकर चुका रहे हैं।
क्या यह सही नहीं है कि दवा कंपनियां मनमाना मूल्य
छाप कर जाने-अनजाने बहुत से मरीजों को इलाज से वंचित
कर रही हैं।
यदि भारत सरकार चाहे तो मात्र एक दवा
मूल्य नियंत्रण आदेश से उन लोगों को इलाज सुलभ करा
सकती है,
जो दवाइयां महंगी होने के कारण
उपचार से वंचित रह जाते हैं। ऐसा मूल्य नियंत्रण कम
से कम आवश्यक एवं जीवन रक्षक दवाओं पर तो किया ही जा
सकता है। उल्लेखनीय है कि ऐसी दवाओं की संख्या लगभग
350 है। ऐसा करने में
विश्व व्यापार संगठन के प्रावधान
भी आड़े नहीं आते हैं। सौभाग्य से मात्र इतनी सी
दवाइयों से
95
प्रतिशत से अधिक रोगों का सफलता पूर्वक उपचार किया
जा सकता है। यदि हम चाहें तो इस छोटे से प्रयास से
बहुत से लोगों की पीड़ा हर सकते हैं और असंख्य मरीजों
को असमय मरने से बचा भी सकते है।
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