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खेती-किसानी |
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भूमिहीन किसानों को सुझाया रास्ता |
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उमाशंकर मिश्र |
देश
में भूमिहीन कृषि-मजदूरों अथवा अल्प
भूमि वाले किसानों की बहुत बड़ी संख्या है। पटना की
नौबतफर तहसील के गांव आजाद नगर की लालमुनी देवी भी
ऐसे ही कृषकों की जमात का एक हिस्सा हैं। ऐसे कृषकों
के पास खेती करने का हुनर और जज्बा तो होता है,
लेकिन भूमिहीनता उन्हें बेबस बना
देती है। मजबूरन उन्हें दैनिक मजदूरी कर अपना गुजर
बसर करना पड़ता है। लेकिन लालमुनी देवी के साथ अब ऐसा
नहीं है, क्योंकि
उन्होंने अपने कौशल के बूते परिस्थितियों से लड़ना
सीख लिया है। 40 वर्षीया
लालमुनी देवी भले ही अल्प-शिक्षित हों,
लेकिन उन्होंने भूमिहीनता के दंश
का रोना नहीं रोया और घास-फूस से बने अपने घर की
छप्पर को ही जीवन-यापन के साधान के तौर पर उपयोग
करना सीख लिया। अब वे घर के गीले छप्पर में मशरूम की
खेती करती हैं। अपने इसी हुनर की बदौलत लालमुनी देवी
आज न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में
सफल हुई हैं, बल्कि वे
हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन चुकी
हैं। खेती के उनके इस अनूठे तरीके को सात समंदर पार
भी सराहा गया। गेहूं और ज्वार पर शोध करने वाले
मैक्सिको स्थित एक प्रसिध्द संस्थान ने श्रीलंका,
पाकिस्तान,
नेपाल,
भूटान और भारत समेत सात एशियाई
देशों के ऐसे 25 अग्रणी
उद्यमीय कौशल वाले किसानों की सूची में लालमुनी देवी
को सर्वोच्च स्थान दिया है। अपनी इस उड़ान से पूर्व
लालमुनी देवी को जीवन अत्यंत नीरस जान पड़ता था।
आंखों से दुर्बल पति और एक विकलांग बेटे समेत चार
प्राणियों के परिवार का भरण-पोषण आसान नहीं था। बड़े
बेटे की मजदूरी से जो थोड़ी बहुत आय होती थी,
बस वही परिवार के गुजारे का
सहारा थी। लालमुनी देवी भले ही भूमिहीन हों,
लेकिन मशरूम की खेती उनके जीवन
में एक आशा की नई किरण बनकर आई। वे कहती हैं कि
'ये तो मेरे लिए
सोना-चांदी से कम नहीं है।'
यह सब बताते हुए लालमुनी भावुक
हो जाती हैं, क्योंकि आज
वे इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि अब उनकी बेटी के
विवाह में कोई अड़चन नही आएगी। ऐसा आत्मविश्वास
उन्हें मशरूम से होने वाली आय के कारण ही मिला है।
हालांकि भूमिहीन लालमुनी देवी के लिए यह जानते हुए
कि उनके पास जमीन नहीं है,
मशरूम की खेती करने का
फैसला
आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नही हारी और
500 रुपये की छोटी सी
पूंजी से मशरूम उत्पादन का कार्य शुरू कर दिया। गंगा किनारे के इस पूर्वी विशाल मैदानी भाग में
जोतें आमतौर पर छोटी हैं और आबादी भी गरीब बहुल है।
यहां लोग अपेक्षाकृत बड़े किसानों के खेतों में
मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन-यापन करते हैं। चावल और
गेहूं यहां की मुख्य फसलें हैं। बरसात के मौसम में
चावल, तो सर्दियों के
शुष्क मौसम में यहां गेहूं की खेती की जाती है। पटना
से करीब घंटे भर का सफर तय करने पर ही स्थित है आजाद
नगर गांव, जहां लालमुनी
देवी का परिवार नमीयुक्त छप्पर वाले एक कमरे के घर
में रहता है। उनके घर में प्रवेश करते ही अंदर हरेक
कोने पर मशरूमों को देखा जा सकता है। शायद ही कोई
स्थान बचा होगा जहां मशरूम न उगाया गया हो। इस
सिलसिले की शुरुआत 'इंडियन
कौंसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च संस्थान'
की पहल पर आयोजित एक ट्रेनिंग
कार्यक्रम के दौरान हुई थी। इससे पहले लालमुनी देवी
ने मशरूम के बारे में कभी सुना भी नहीं था। वे कहती
हैं 'हमें बताया गया था
कि भारत के बड़े शहरों और विदेशों में भी इसकी काफी
मांग है। प्रशिक्षण के पश्चात् उन्होंने इसे घर पर
ही उगाने का फैसला कर लिया। शहर से अधिक दूरी नहीं
होने के कारण लालमुनी देवी को अपने मशरूमों को बेचने
के लिए बाजार भी आसानी से उपलब्धा हो गया। जिससे इस
काम में उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। आज वे
गांव की 20-25 महिलाओं के
समूह को घर पर ही मशरूम उगाने की ट्रेनिंग भी देती
हैं। एक सवाल उठता है कि गेहूं और ज्वार के
प्रोत्साहन देने वाली एक एजेंसी ने ही आखिर लालमुनी
देवी के इस प्रयोग को सराहने की पहल क्यों की?
वह इसलिए क्योंकि गेहूं के भूसे
का उपयोग मशरूम के उत्पादन के लिए किया जाता है।
गेहूं के भूसे और सड़ी हुई घास से बनाए गोलों में
मशरूम उगाना निश्चित तौर पर काबिलेतारीफ है। इस तरह
के गोलों को एक पालीथीन में डालकर नमीयुक्त छप्पर के
नीचे लटका दिया जाता है। आइस्टर प्रजाति के मशरूम के
पोषण हेतु आर्द्र वातावरण की आवश्यकता होती है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस तरह के दीर्घकालीन
उपायों से एक बहुत बड़े ग्रामीण समुदाय को फायदा
पहुंच सकता है। शुरू के दो वर्ष तक तो 'इंडियन
कौंसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च'
संस्थान ने ही मशरूम के बीज
लालमुनी को उपलब्धा करवाए। लेकिन अब लालमुनी खुद
50 रुपये से 60
रुपये प्रति किलो की दर से बीज
बाजार से खरीद लेती हैं। एक किलोग्राम बीज से करीब
10-14 किलो मशरूम का
उत्पादन हो जाता है। 'इंडियन
कौंसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च'
संस्थान के कृषि वैज्ञानिक ए.आर,
खान बताते हैं कि 'सर्दियों
में उगाई जाने वाली मशरूम की प्रजाति की कीमत आमतौर
पर 50-60 रुपये प्रति
किलो जबकि गर्मियों के मौसम में पैदा की जाने वाली
किस्म की कीमत 80-120
रुपये प्रति किलो रहती है। आज लालमुनी देवी की मशरूम
की प्रत्येक उपज करीब 20
हजार रुपये से 25 हजार
रुपये तक पहुंच जाती है। मशरूम को तैयार होने में
करीब तीन महीने का समय लग जाता है और किसी भी मौसम
में इसकी खेती की जा सकती है। नमी एवं उपयुक्त
तापमान की अपेक्षित उपलब्धाता से मैदानी भागों में
भी मशरूम की खेती की जा सकती है। मशरूम को एक इन्डोर
फसल के तौर पर जाना जाता है। इसके विकास के लिए
14 से 18
डिग्री सेल्सियस तक तापमान और
85 प्रतिशत नमी की
आवश्यकता होती है। मशरूम को गेहूं एवं
धान
के चारे,
गेहूं की भूसी,
यूरिया,
जिप्सम और चिकन मैन्योर को
मिलाकर तैयार किए गए कम्पोस्ट पर उगाया जाता है। यही
नहीं मशरूम उगाने की ट्रेनिंग
के लिए 'राष्ट्रीय
मशरूम अनुसंधान
केन्द्र'
सोलन,
हिमाचल प्रदेश से सम्पर्क किया जा सकता है। इसके
अलावा राज्यों के कृषि- विश्वविद्यालयों से भी मशरूम
उत्पादन के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।
नाबार्ड, नेशनल
हार्टीकल्चर बोर्ड और बैंकिंग संस्थान भी मशरूम
यूनिट्स एवं कम्पोस्ट मेकिंग यूनिट्स की स्थापना के
लिए ट्टण भी मुहैया करवाते हैं। मशरूम पौष्टिकता की
दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसमें प्रोटीन,
फाइबर्स एवं फोलिक एसिड के तत्व
समाहित होते हैं। इस तरह के तत्व आमतौर पर अनाज एवं
सब्जियों में कम ही पाए जाते हैं। आज मशरूम अपने
इन्ही गुणों के चलते प्रसिध्दि पाता जा रहा है।
जिसके चलते इसका बाजार तेजी से बढ़ रहा है।
व्हाइट-बटन मशरूम को र्फेश अथवा डिब्बाबंद पैकिंग
में आचार, कैंडी,
बिस्कुट,
मुरब्बा अथवा सूप पाउडर बनाकर भी
आसानी से बेचा जा सकता है। शहरी बाजारों में इनकी
खासी मांग है। इसके अलावा अब तो फर्मास्युटीकल
कंपनियों में मशरूम की मांग की जाने लगी है। मशरूम
की करीब दो हजार खाद्य प्रजातियों में से 280
किस्मों
का भारत में भी उत्पादन किया जाता है। भारत में पैदा
की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण मशरूम की किस्म गुच्छी
को माना जाता है। घरेलू उपभोग की बजाय इसका एक बड़ा
हिस्सा पाश्चात्य देशों को निर्यात कर दिया जाता है।
यूएसए और स्विटजरलैंड भारत से मशरूम
का आयात करने वाले दो मुख्य देश हैं। भारत में मशरूम
उत्पादन का चलन कोई नई बात नहीं है।
1950 के दशक में हिमाचल प्रदेश
सरकार ने राज्य के पहले सहायक प्लांट पैथोलॉजिस्ट
एवं माइकोलॉजिस्ट के तौर पर एस,एस,
जैन को नियुक्त किया। हिमाचल
प्रदेश के अंदरूनी हिस्से में फल उत्पादकों एवं
किसानों को फसलों में लगने वाली बीमारियों के बारे
में जानकारी देने का सफर शुरू किया तो उन्होंने पाया
कि राज्य के किसानों की हालत बहुत जर्जर थी और वे
गरीबी में गुजर बसर कर रहे थे। उन्होंने किसानों की
मदद करने का निश्चय किया। उन्होंने गौर किया तो पाया
कि वहां फलों के वृक्षों की सड़ी हुई टहनियों,
गेहूं के
अनुपयोगी अंश और पशुओं के अपशिष्ट से मशरूम के
उत्पादन की भरपूर संभावनाएं थीं। इसी ने उन्हें
खाद्य मशरूम के उत्पादन हेतु प्रेरित किया। उन्होंने
सोलन में रहकर रिसर्च शुरु कर दी और जब वे सफल हो गए
तो अपशिष्टों से मशरूम उत्पादन की विधि का राज्य में
प्रसार किया। परिणामत: लोग मशरूम उत्पादन के लिए
प्रोत्साहित होने लगे।
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