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सहकार |
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बाबुओं की समाज सेवा |
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प्रदीप कुमार |
कुछ लोग अपनी कर्मठता तथा
संवेदनशीलता के कारण समाज में प्रतिमान बनाते हैं।
मुंबई के एक सरकारी अस्पताल में सामान्य-सी लिपिक की
नौकरी करते हुए,
शिक्षा क्षेत्र को समाजसेवा का
माधयम बना कर श्री मधुकर कृष्ण पवार ने विगत वर्षों
में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। दक्षिण मुंबई के
रत्नागिरी जिले में दूर दराज के क्षेत्रों में अच्छे
विद्यालयों का सर्वथा अभाव था। यदि विद्यालय थे भी
तो हालत दयनीय थी। वहां एक ही शिक्षक चार-चार
कक्षाएं एक साथ लेने को बाधय था,
क्योंकि न तो विद्यालय में
पर्याप्त कमरे थे और न ही फर्नीचर। किसानों तथा गरीब
मजदूरों के बच्चे विद्यालय की फीस नहीं दे सकने के
कारण विद्यालय से निकाले जाते थे। उनका बचपन गरीबी
तथा लाचारी की मार झेलकर छोटी उम्र में ही मजदूरी
करने पर विवश था। ऐसे असहाय और निर्धान लोगों की
जिन्दगी में आशा की लहर बनकर 'लांजा
राजापूर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मंडल'
नामक
संस्था पिछले कई वर्षों से निरंतर रत्नागिरी जिले के
गांवों कस्बों में अपना तेज बिखेर रही है।
1990
में
श्री मधुकर ने अपने समविचारी लोगों एवं सहकर्मियों
को साथ लेकर एक छोटी सी शुरूआत की थी। उन लोगों की
सतत मेहनत और लगन का ही फल है कि आज यह संस्था
रत्नागिरी के अंतर्गत
650
विद्यालयों में आधारभूत संरचना,
भवन,
फर्नीचर,
स्टेशनरी आदि जरूरत के सामान उपलब्ध कराती है। जिन
बच्चों के अभिभावक पढ़ाई का खर्च वहन करने में समर्थ
नहीं हैं और बच्चा मेधावी तथा होनहार है,
वैसे
कुछ विद्यार्थियों को उपरोक्त संस्था अपने खर्च पर
शिक्षा उपलब्धा कराती है। ऐसे बच्चों के चुनाव में
जाति,
धर्म
जैसी अड़चनें कभी नहीं आती हैं। संस्था के सहयोग से
अब तक 200
से
अधिक बच्चे पढ़ाई पूरी कर पाए हैं जिनमें लगभग आधी
लड़कियां थीं। शिक्षा के साथ-साथ उनके रोजगार और
सामाजिक आयोजनों आदि में भी संस्था अपना सहयोग करती
रहती है।
'लांजा
राजापुर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मंडल'
चैरिटी
ट्रस्ट में अधयक्ष के अलावा तीन प्रेक्षक,
एक
महासचिव तथा उन्नीस कार्यकारी सदस्यों की समिति है।
समिति का काम योजना बनाना,
विद्यालय के लिए क्षेत्र का चुनाव करना,
खरीदारी तथा वितरण के अलावा धन-संग्रह करना भी है।
आमतौर पर धन की व्यवस्था मंडल के सदस्यगण एवं सहयोगी
आपस में मिलकर करते हैं। लेकिन आम लोग भी स्वप्रेरणा
से यदा-कदा सहयोग राशि तथा वस्तुएं मंडल को सहयोग के
रूप में प्रदान करते हैं। वितरण व्यवस्था भी
पारदर्शी है। मानसून से दो माह पहले कार्य योजना
बनाई जाती है। फिर वर्षभर सहयोग की राशि तथा वस्तुएं
पहुंचाने का काम होता है। उन विद्यालयों को सहायता
दी जाती है जिनके विद्यार्थी लगातार अच्छे परिणाम
लाते हैं। विद्यार्थियों की कम से कम
90
प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य होती है। एक शर्त में यह
भी है कि भले ही प्राप्तांक अधिक न हो पर विद्यार्थी
को प्रत्येक सावधि परीक्षा में उत्ताीर्ण होना ही
होगा। इसका परिणाम यह होता है कि शिक्षक अपना
दायित्व भली-भांति निभाते हैं। कोष तथा सहायता बेकार
नहीं जाती,
बल्कि
परिणामोन्मुख रहती है। प्रति दो वर्ष में एक बार
मराठी नाटक का मंचन होता है तथा सफल विद्यार्थी,
शिक्षक
एवं कार्यकर्ताओं द्वारा मंच पर पिछले वर्ष का
लेखा-जोखा भी होता है। इस कार्यक्रम द्वारा भी धन
इकट्ठा किया जाता है। मुख्य रूप से कोष साधारण वर्ग
के लोगों से स्वेच्छानुरूप ही प्राप्त किए जाते हैं।
कोष संग्रह के लिए तड़क-भड़क वाले प्रचार-प्रसार से
मंडल जहां तक हो सके,
बचता
ही है। यात्रा में प्रयोग होने वाले वाहन तक का
खर्चा मंडल के पदाधिकारी स्वयं ही देते हैं। कोई भी
मंडल सदस्य बदले में वेतन नहीं लेता,
बल्कि
जरूरत पड़ने पर अपनी जेब से मंडल को योगदान देता रहता
है। दूर-दराज के गांवों में जहां सड़क तक नहीं है,
ये लोग
सहायता राशि पैदल जाकर भी पहुंचाया करते हैं।
वस्तुत: सेवा की लगन की मिसाल है
'लांजा
राजापूर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मंडल'
एवं इसका परिवार। तभी तो इतने वर्षों
से लगातार निर्विवाद रूप से वह अपने कर्तव्य पथ पर
गतिमान है।
शहरों के बदनाम बाबुओं द्वारा समाज
के बेसहारा व जरूरतमंदों के सर्वांगीण विकास के लिए
किए गए ये कार्य उनके उपर लगे आरोपों को झूठा साबित
कर रहे हैं। आठ घंटे की नौकरी के बाद ये लोग अपना
समय मंडल की सामाजिक गतिविधियों में देते हैं।
रत्नागिरी का बड़ा भू-भाग सूखा और बाढ़ की चपेट में आ
जाता है। यहां के किसान मजदूर गरीबी की मार से बेबस
हैं। ऐसे में उनके बच्चे-बच्चियों के असुरक्षित
भविष्य का खयाल कौन रखे?
ऐसे माहौल में रत्नागिरी के ये
बाबू लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार बिना किसी
सरकारी या गैर-सरकारी सहायता के निजी समूह बनाकर
समाज में उम्मीद की लौ जला रहे हैं। आज इनकी संख्या
पचास से अधिक है। वर्तमान में मंडल रत्नागिरि में
प्रतिवर्ष 5 लाख से
9
लाख तक की सहायता ऐसे क्षेत्रों में पहुंचा रहा है
जहां सरकारी तंत्र असफल हो चुका है। मार्च तथा
अप्रैल के महीने में विद्यालयों द्वारा जरूरत के
सामानों की सूची दी जाती है। उसी के अनुसार संस्था
उन्हें वस्तुएं उपलब्धा कराती है। यह कार्यक्रम
योजनाबध्द तरीके से वर्षभर चलता रहता है।
हाल के दिनों में संस्था की ओर से
कुछ और सामाजिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहित किया
जा रहा है। इन सभी कामों में उन्हें समाज का भी
भरपूर सहयोग मिल रहा है। जैसे,
मुंबई के नायर अस्पताल की महिला
डाक्टर ने अपने बच्चे के जन्मदिन पर खर्च की जाने
वाली राशि को संस्था के सुपुर्द कर दिया। आम के एक
व्यवसायी ने संस्था को तीस हजार की रकम प्रदान की।
एक मुस्लिम दंपति ने कोंडुडा गांव में विद्यालय का
भवन ही बनवा दिया। एक ग्राम पंचायत ने आने-जाने में
हो रही कठिनाई कम करने के लिए एक पैदल पुल बनवाया,
क्योंकि मंडल के अधिकारियों को
सहायता सामग्री पहुंचाने के लिए घुटनों पानी में
होकर जाना पड़ता था। ऐसे और कई उदाहरण हैं जो दर्शाते
हैं कि नेक कामों में सहायता की कमी नहीं होती।
'लांजा राजापुर संघमेश्वर
तालुका मंडल' के ईमानदार
प्रयासों को स्थानीय लोगों का भरपूर सहयोग प्राप्त
हो रहा है। समाज के द्वारा समाज के लिए ये प्रयास
वास्तव में अनुकरणीय हैं। रत्नागिरि के बाबुओं के
द्वारा प्रारंभ किया गया छोटा सा यह प्रयास एक बड़ा
बदलाव लाएगा,
ऐसा स्थानीय लोगों का मानना है।
संपर्क:
लांजा राजापुर संघमेश्वर तालुका उत्कर्ष मंडल,
9/5, आर्या नगर,
तारदेव,
मुंबई-400034 |