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 जनवरी,  2008

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आसमान सा पिता

कात्यायनी उप्रेती

मेरी एक ख्वाहिश है। मैं एक बड़ा सा घर बनाना चाहता हूं, जहां सारे बेसहारा, बूढ़े, बच्चे, औरतें रहें। उनका अपना आशियां-जहां वे रहें, काम करें, जिएं।' एक पल अपने इस खूबसूरत सपने में खोते हुए जगदीश कालाणी मुस्करा उठे। जगदीश उत्तारांचल के पिथौरागढ़ शहर के पास ही के गांव धनोड़ा के रहने वाली एक जीवंत शख्सियत हैं जिन्होंने कितने ही नाली में फेंक दिए गए नवजात बच्चों को एक सुलझा हुआ घर दिया, कितने ही बेसहारों, जिंदगी से हारे लोगों को जीने का खुशनुमा मौका दिया और यह जीवंतता आज भी बरकरार है।

दूसरों की सेवा करने का माद्दा बचपन से ही जगदीश के दिल में था। वह कहते हैं- 'दरअसल मेरे माता-पिता से ये संस्कार मुझ में आए।' जगदीश की सामाजिक सेवा के क्षेत्र में शुरुआत 1997 में हुई। अमर उजाला के पत्रकार जगदीश जब पिथौरागढ़ के निराश्रित आश्रम में किसी सिलसिले में रिपोर्टिंग के लिए गए तो वहां की स्थिति देखकर दंग रह गए। कुपोषित-बीमार औरतें, बच्चियां, पंद्रह-पंद्रह साल पुरानी फटी चादरें, बेकार खाना, गंदगी। इस बीमार माहौल ने उनके संस्कार जगा दिए। तुरंत एक-दो लोगों की मदद ली और जुट गए। डी.एम. से मिले, बात की और उनकी मदद से वहां एक 'स्वास्थ्य शिविर' लगवाया। डाक्टर आए, दवा हुई। सब्जी वालों से कह कर फल बंटवाए गए। लोगों से, नेताओं से चंदा लिया गया, किसी ने कपडे बनवाए, किसी ने उफन दे दिया। कुछ प्रगतिशील छात्र-छात्राओं ने बच्चों को पढ़ाकर सहयोग दिया। सिलसिला छह महीनों तक चला और आज वह आश्रम पहले से कई गुना अधिक स्वस्थ है। जगदीश के इस जोश से उन्हें प्यार भी मिला। जगदीश याद करते हुए बताते हैं, 'एक बार जब मैंने आश्रम के बच्चों से पूछा कि मेरे लिए स्वेटर कौन बनाएगा तो सबके हाथ खड़े हो गए और एक छोटी सी लड़की मुस्कराते हुए बोली, आपके लिए आसमानी रंग का स्वेटर बनाऊंगी। आसमानी ही क्यों? पूछने पर बोली, 'आप पर अच्छा लगेगा क्योंकि आप आसमान जैसे हो।' जगदीश कहते हैं, 'उस बच्ची की इस बात ने हौसला दिया और मैं और मजबूत हो गया।' 1999 में जगदीश अमर उजाला हल्द्वानी स्थानांतरित हो गए जहां उनकी जिंदगी एक अलग पहलू से जुड़ी। बात उस दिन की है जब एक फोन की घंटी ने उन्हें जाने-माने अस्पताल के बाहर जुटी भीड़ के बीच पहुंचा दिया। भीड़ का कारण था वहीं नाली में पड़ा कीचड़ से सना हुआ असहाय नवजात बच्चा। बच्चे की सांस चल रही थी। कालाणी ने उसे अपनी कमीज के अंदर डाला और तुरंत अपने कमरे में ले गए। वहां उसे नहलाया-धुलाया, स्वस्थ किया और तीसरे दिन एक बेहद जरूरतमंद अच्छे दंपत्ति ने उसे गोद ले लिया। जगदीश हंसते हुए कहते हैं, फिर ऐसा इत्तोफक हुआ कि मुझे ऐसे बच्चे मिलते चले गए। हल्द्वानी की दो साल की नौकरी में मुझे ऐसे कई बच्चे मिले जिन्हें मैंने लायक गोदों में सौंप दिया।'

मार्च 2002 में जगदीश विवाह सूत्र में बंधो। पत्नी विनीता का पूरा साथ मिला। इस बीच उन्होंने नौकरी भी छोड़ दी। अब वे खुलकर अपने जीवंत सामाजिक कामों को एक बड़े सामाजिक शब्द से सजाकर करने लगे, और यह शब्द था- मुसकान। वह आध्यात्मिक मुस्कान जिसे वे सबके चेहरे पर देखना चाहते थे। जल्द ही मुस्कान जगदीश की संस्था का जाना-पहचाना नाम बन गया।

नवम्बर, 2002 में जगदीश जिले के सीमान्त गांव जौलजीवी का प्रसिध्द मेला देखने गए। एक दो साथी साथ में थे। वहां मंदिर परिसर में गए तो अचानक देखा कि रास्ते में ही एक मानसिक रूप से विक्षिप्त औरत अपने शिशु को जन्म दे रही है। शिशु के जन्म लेते ही जगदीश ने साथियों की मदद से दोनों को गाड़ी में डाला और अस्पताल की ओर बढ़े। विक्षिप्त जननी तो अपने आप को छुड़ाकर भाग गई, बच्चे को अस्पताल पहुंचाने में जगदीश कामयाब हो गए। बच्चा बहुत कमजोर था। डाक्टर ने तुरंत उसे मां का दूध पिलाने की हिदायत दी। कई लोगों से उस बच्चे को दूध पिलाने की मिन्नत की गई पर कोई तैयार नहीं हुआ। अंतत: एक सर्कसवाले की पत्नी, जिसने उसी दौरान शिशु को जन्म दिया था उसे दूध पिलाने को राजी हो गई। लेकिन बाद में जगदीश और उनकी पत्नी जब बच्चे को लेने गए तो सर्कस वाले ने बच्चा वापस करने से मना कर दिया। सर्कस वाला ठीक होता तो जगदीश उसे बच्चा दे देते पर पता चला कि उसकी चारों लड़कियां सड़क पर भीख मांगती हैं। जगदीश ने लड़ाई लड़ने का फैसला किया। पुराने नेक कामों ने साथ दिया, जनता का आक्रोश दिखा और आखिरकार जीत मिली। इस बार बच्चे को खुद जगदीश ने अपना बेटा स्वीकार किया और नाम दिया देवाशीष। खुशी मिली पर साथ ही कमजोर देवाशीष ने दम्पत्ति को परेशानी में डाल दिया। जहां डाक्टर ने कहा कि नहीं बच पाएगा, वहीं पिथौरागढ़ की मशहूर मालिश वाली ने भी ज्यादा मेहनताना देने के वायदे पर भी कमजोर बच्चे की मालिश करने से मना कर दिया। जगदीश याद करते हैं- मैंने भी चैलेंज लिया। बाहें चढ़ाई, खुद मालिश शुरू कर दी। एक घंटा मैं मालिश करता, एक घंटा विनीता। और आज वो पूरा स्वस्थ है।' जगदीश की जिंदगी में एक समय ऐसा आया जब उन्होंने बच्चे गोद देने बंद कर दिए। कारण था एक नन्हे की मौत! एक बार उन्होंने एक बच्चा जो गोद दिया था, कुछ ही दिनों में मर गया। जगदीश का मन खराब हो गया और उन्होंने सोचा कि अब मैं किसी को बच्चा गोद नहीं दूंगा।' उनके इन दृढ़ शब्दों के नतीजतन एक ऐसी रात आई जब आर्थिक रूप से तंग उनके घर में चार नवजात बच्चे एक साथ भूख से रो रहे थे और घर में सिर्फ आधा लीटर दूध था। जगदीश को कुछ सूझा और उन्होंने दूध में पानी व चीनी मिलाकर गर्म करके पिला दिया। बच्चे तो चुप हो गए पर पत्नी ने दुख और गुस्से से कहा, 'ये पाप है।' जगदीश का दिमाग भी ठनका, खूब सोचा-समझा और फिर से बच्चे गोद देने शुरू कर दिए। मगर अब वे बिल्कुल सतक्र हो चुके हैं, 'अब जब किसी को बच्चा गोद देता हूं तो उससे कहता हूं-खूब रोओ, आंसू बहाओ इस बच्चे के लिए। और सच में, उनके आंसू बताते हैं कि उन्हें बच्चे की कितनी जरूरत है। आज जगदीश कई नवजात बच्चों को गोद दे चुके हैं और अक्सर उनकी सलामती के बारे में पूछते रहते हैं।

नवजात बच्चों को गोद देने के अलावा जगदीश ने कई अनाथ बच्चों को भी परिवार दिया है। उनकी सबसे बड़ी बात है कि वे सबके दुखों को उनका अपना बनकर बांटते हैं। जगदीश ने कुछ गरीब लड़कियों की शादी बिना दहेज के खुद लड़का ढूंढकर करवाई है। जगदीश की आमदनी का कोई निश्चित साधन नहीं है। पैसों की कमी उन्हें महसूस होती है पर इसका उन्हें कोई अफसोस नहीं क्योंकि वो अपनी आवश्यकताओं को कम कर जीवन को अच्छी तरह जी रहे हैं। वह अपने कामों के लिए जनता से ही मदद लेते हैं। वह कहते हैं- यह जनता की समस्याएं हैं, वो ही इसे पैदा कर रही है इसलिए उसे ही इसे दूर करना चाहिए।'

आज जगदीश अपनी जिंदगी अपने दो परिवारों के साथ जी रहे हैं, पत्नी और बेटे-बेटी से बना नन्हा परिवार और जिंदगी की मार खाए उन बेसहारों का एक बड़ा भरा परिवार, जिन्हें उनके अपने छोड़कर चले गए। वे नन्हे-मुन्ने जिन्हें जगदीश ने एक सच्चा परिवार दिया है उनसे उनका रिश्ता एक पिता का है। वे कहते हैं 'मैंने चाहे उनको कुछ ही दिन या कुछ ही महीने पाला, पर आज भी वो सब मेरे बच्चे हैं और अब मैं एक हजार बच्चों का पिता बनना चाहता हूं।' जगदीश उन्मुक्त हंसी हंसते हैं। 'अपने जीवन को फलैशबैक में देखते हैं तो मन में क्या आता है? जगदीश इस सवाल पर मुस्कराते हैं और कुछेक पल सोचकर कहते हैं, 'मैंने अच्छा किया है और आगे बढ़िया करना है, बहुत बढ़िया।' जगदीश की  'ध्यात्मिक मुस्कान' अब उनकी आंखों में है, आनंदित सपनों में खोई, जैसे कह रही हो - 'आमीन'

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन