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 जनवरी,  2008

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जनसेवा

अंतिम सफर का साथी

अरूण कुमार

पूर्वी दिल्ली में शाहदरा के पास ही बसा है विवेक विहार। यहां हर तरह के लोग हैं। पर इसकी पहचान और ख्याति 'शहीद भगत सिंह सेवा दल' के कारण पूरी दिल्ली में है। इस सेवा दल के संस्थापक हैं श्री जितेन्द्र सिंह 'शंटी'। वास्तव में यह सेवा दल आज समाज-सेवा के लिए जो कुछ कर रहा है उसकी मिसाल कम ही देखने को मिलती है।  किसी जरूरतमंद को रक्त उपलब्ध कराना, किसी लावारिस लाश का अन्तिम संस्कार कराना, और यदि कोई गरीब अपने मृत रिश्तेदार का अन्तिम संस्कार नहीं कर सकता तो उसकी सारी व्यवस्था करना। इन सेवाओं के लिए यह संस्था पैसा नहीं लेती। बस आप केवल उन्हें एक बार सूचित कर दें। सूचनाओं के आधार पर इस संस्था ने अब तक हजारों घायलों की जान बचाने में सहयोग किया है, तो दस हजार से अधिक लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार संपन्न कराया है।

इस संस्था की स्थापना के पीछे एक हृदय विदारक घटना छिपी है। संस्थापक श्री जितेन्द्र सिंह 'शंटी' बताते हैं, ''बात 1996 की है। किसी के अन्तिम संस्कार में भाग लेने के लिए मैं निगम बोध घाट गया था। शाम हो चुकी थी। देखा, एक व्यक्ति यमुना तट पर घूम-घूम कर अधजली लकड़ियां इकट्ठा कर रहा था। मैंने सोचा कि वह कोई चोर-उचक्का होगा, इसलिए डांटते हुए पूछा, 'यह क्या कर रहे हो तुम?' थोड़ी देर तो वह व्यक्ति चुप रहा, फिर सुबकने लगा। मुझे ग्लानि हुई कि मैंने उसे डांटा क्यों और उसके पास पहुंच गया। थोड़ी सहानुभूति के साथ पूछा, 'क्यों रो रहे हो?' वह मुंह से तो कुछ बोल नहीं पाया, पर एक लाश की ओर इशारा किया। लाश के पास एक महिला सिर पकड़ कर बैठी थी। पहले तो मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उससे कुछ पूछूं। तब तक वह व्यक्ति भी थोड़ी अधजली लकड़ियों के साथ वहां पहुंचा। रफंधो गले से उसने कहा, 'बाबूजी, यह लाश मेरे 10 वर्षीय बेटे की है और यह महिला मेरी पत्नी है। अस्पताल में इलाज चल रहा था, फिर भी बेटा हम दोनों को छोड़ गया। मेरे पास जो भी पैसा था, वह बेटे के इलाज में ही खत्म हो गया। भगवान हमारी एक तरह से परीक्षा ले रहे हैं। बेटे के अन्तिम संस्कार के लिए लकड़ी खरीद सवूंफ जेब में इतना भी पैसा नहीं है। इसलिए इन अधजली लकड़ियों को चुन रहा हूं।' यह सुनकर मैं जड़ हो गया और सोचने लगा, आज मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। फिर मैंने उस व्यक्ति से क्षमा मांगी और कहा कि आप रफकिए, मैं आपकी मदद करता हूं। पहले तो वह तैयार नहीं हुआ, पर बहुत समझाने के बाद मान गया। इसके बाद मैंने लकड़ी खरीदी और उस बच्चे का अन्तिम संस्कार करवाया। फिर सोचने लगा, ऐसे लोगों की किस तरह मदद की जा सकती है।''

यहीं से उनका सेवा-पथ शुरू हुआ। इसके बाद वे समाज के सहयोग से अपना दायरा बढ़ाते गए। बाद में उन्होंने लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार भी सम्पन्न करना शुरू किया। अब तो इन्होंने पूर्वी दिल्ली के सीमापुरी इलाके में 'अन्तिम निवास' के नाम से एक श्मशान घाट की शुरुआत कर दी है। इस घाट में गरीब लोगों को अपने परिजनों का अन्तिम संस्कार सम्पन्न कराने के लिए न तो किसी तरह का शुल्क देना पड़ता है, न ही उन्हें लकड़ी खरीदनी पड़ती है। जो लोग शुल्क देने की स्थिति में होते हैं, उनसे एक मामूली राशि ली जाती  है।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन