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 जनवरी,  2008

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अंधविश्वासों को तोड़ चला

नवलेश कुमार

बंगलोर में पला-बढ़ा, वहीं पढ़ा-लिखा एक नौजवान जब अपने पैतृक गांव लौटता है और वहां व्याप्त अंधविश्वास, अशिक्षा और गंदगी देखता है तब उसे विकल्पों की कमी नजर आती है। उसे लगता है कि या तो वह गांव छोड़कर बंगलोर लौट जाए या फिर एक आधनिक गांव का निर्माण करे। पर कैसे...? क्या पहले से कुण्डली जमाए लोग परिवर्तन बर्दाश्त करेंगे? क्या अंधविश्वासों में जकड़ा समाज प्रगति पथ पर अग्रसर होगा? और सबसे बड़ी बात यह कि क्या वह इन परिस्थितियों में टिक पाएगा? इन सवालों की परवाह नहीं करते हुए प्रोफेसर शशि भूषण प्रसाद सिन्हा नाम के इस शख्स ने सामाजिक बदलाव का बीड़ा उठाने का फैसला किया।

अभी वे वारिसलीगंज के एस. एन. सिन्हा कालेज में अंग्रेजी पढ़ाते हैं। उनके गांव मकनफर में एक परंपरागत धारणा थी कि नाग-पंचमी से पहले धान की रोपाई प्रारंभ नहीं की जा सकती। इस कारण यह गांव फसल के मामले में आस-पास के गांवों से पिछड़ जाता था। अन्य गांव के लोग पानी की उपलब्धता के अनुसार बीजों की बुआई कर देते थे। जबकि मकनफुर निवासी अपनी परंपराओं से बंधो थे और हर हाल में नाग-पंचमी के बाद गांव के उत्तार में बाबा यदुराम ठाकुर के प्रसिध्द पिण्ड पर पूजा करने के बाद ही धान की रोपाई प्रारंभ करते थे।

प्रोफेसर साहब ने लोगों को समझाना चाहा कि इन अंधविश्वासों की गिरफ्रत से बाहर निकलो और धान की रोपाई मौसम के अनुसार तय करो ना कि ठाकुर बाबा की पूजा के अनुसार। पर लोग परंपराओं और अंधविश्वासों को इतनी आसानी से भूलने वाले नहीं थे। जिसे वर्षों खाद-पानी डालकर सींचा गया था वह लोगों के दिलो-दिमाग से इतनी असानी से कैसे बाहर निकलता। लोगों ने उन्हें ही समझाना शुरू किया, 'बेटा ऐसा नहीं बोलते, बाबा ठाकुर ;भगवानध्द गुस्सा हो जाएंगे तो अनर्थ हो जाएगा। नाग-पंचमी से पहले धान की रोपनी रता नहीं है... यह प्रोफेसर पागल हो गया है।' एक बुढ़िया जिसके दोनों पैर कब्र में लटक रहे थे उसने एक बार कहा, 'पढ़-लिख कर इंसान निर्बुध्दि हो जाता है ऐसा सुना था लेकिन आज तो देख रही हूं।'

प्रोफेसर साहब इन बातों को सुन-सुन  कर परेशान तो होते, लेकिन उनकी धारणा नहीं बदली। उन्होंने उस अंधविश्वास को तोड़ने का फैसला किया। उन्होंने प्रण किया कि इस बार नाग-पंचमी के पहले ही मैं अपने खेतों में न की रोपनी शुरू करूंगा... पर कैसे...? वह किसान तो थे नहीं... खेती करने के लिए किसानों की आपस में साझेदारी होती है। टैक्ट्र, पानी, बीज, मजदूर यह सब खेती करने के लिए आवश्यक हैं और उनके पास इन सभी-चीजों का ना होना, अपने आप में एक प्रश्न बन गया कि आखिर वे खेती करेंगे कैसे...? आस-पास के लोग उनका साथ देंगे या नहीं? क्योंकि लोगों की मान्यताओं के अनुसार वह भगवान को नाराज करने जा रहे थे।

उनके पक्के इरादे को देखकर एक गाड़ीवान आगे आया। उसने अपने बैलों की जोड़ी हल के लिए उपलब्धा करवाई और खेत जोतने की जिम्मेदारी खुद संभाली। अब मजदूरों की समस्या थी। गांव का एक भी मजदूर मरने के डर से उनके खेत पर काम करने को तैयार नहीं था। तब काफी मुश्किल के बाद बगल वाले गांव से कुछ मजदूर इस शर्त पर राजी हुए कि यदि उन्हें कुछ हुआ तो एक लाख रुपया उनके परिवार वालों को दिया जाएगा।

खेती करने का वह प्रयोग अपने आप में एक किंवदंती बन चुका है। आज भी लोग उस धान की रोपाई के समय की समस्याओं का जिक्र कर खूब हंसते हैं। वर्षों से व्याप्त अंधविश्वास मिट चुका है और अब लोग अपनी नासमझी पर मौन हो जाते हैं। अब वहां नागपंचमी तक धान के पौधो हरियाने लगते हैं। कुछ ऐसी ही धारणा प्याज से संबंधित भी थी। मकनफर के लोगों की मानें तो उन्हें याद नहीं कि गांव में कब प्याज उपजाया गया था। यहां के लोगों की मान्यता थी कि ये गांव ठाकुर (भगवान) का है और यहां प्याज नहीं उपजाना चाहिए। मगर प्रोफेसर साहब कहां मानने वाले थे। इस बार भी उन्हें रूढ़िवादियों की वर्षों फरानी चुनौतियों का सामना करना था लेकिन अंत में जीत धुन के पक्के प्रोफेसर साहब की ही हुई।

प्रोफेसर साहब ने आस-पास के गांव के विद्यथिथों को नि:शुल्क शिक्षा देने का कार्य प्रारंभ किया। अपने कुछ साथी शिक्षकों से सहयोग लेकर नौजवानों मे जागृति पैदा करने के लिए उन्होंने मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाना शुरू किया। उनकी कक्षाओं में बच्चों की उपस्थिति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। उनसे पढ़े बच्चे आज गांव की शान हैं और अपनी उपस्थिति देश-दुनिया में दर्ज करा रहे हैं। गांव से नजदीक के शहर वारिसलीगंज की दूरी तीन किलोमीटर है। गांव से वहां आने-जाने के लिए कोई सड़क नहीं थी। दो-तीन गांव घूमकर शहर तक जाने का रास्ता था।

प्रोपेफसर साहब ने लोगों से गांव से शहर तक एक सड़क बनाने की बात की। लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ना प्रारंभ किया। पर किसी ने सच ही कहा है, 'चलना है तो चल पड़ो निकल आएंगे रास्ते। आंधिायां किसी के नक्शे-कदम देखती नहीं।'

उन्होंने सड़क अपनी पहल पर बनाने का काम प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे गांव के नौजवान, बच्चे और वृध्द सभी सड़क बनाने के अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। देखते-ही-देखते एक नई-नवेली दुल्हन सरीखी सड़क मकनफर गांव के सीने पर लताओं की तरह लिपटी नजर आने लगी। बकौल प्रो. आन्नद बर्धान प्रोपेफसर शशिभूषण सिन्हा दूसरे 'दशरथ मांझी' हैं, इनसे जुड़ा एक मिथक तो यह भी है कि प्रोफेसर साहब की पत्नी शहर के कन्या उच्च विद्यालय में प्रधानाधयापिका हैं। उन्हें विद्यालय जाने में काफी परेशानी होती थी इसलिए उन्होंने सड़क का निर्माण किया। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो प्रोपेफसर साहब ही जानें।'

आज 'मकनफर' गांव शिक्षा, सड़क, बिजली, सफाई, कृषि के मामले में अन्य गांवों के लिए एक आदर्श बन गया है। इस मुकाम तक गांव को पहुंचाने में प्रो. शशिभूषण प्रसाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दुस्तान मे छ: लाख गांव हैं और सही मायने में कहें तो आज हर गांव को एक जागरूक शशि भूषण की आवश्यकता है। तब ही गांवों के इस देश में खुशहाली आ पाएगी। आजादी के बाद के वर्षों में देश को लफ्रफाजी करते नेता मिले हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त अफसर लेकिन यदि हमें गांधी के आदर्शो का भारत बनाना है तो 'शशि' ढूंढ़ना होगा जो हर घर तक सफाई और हर हाथ तक कलम पहुंचा सके।

यह नौजवानों की एक बड़ी भूल है कि वे हमेशा व्यवस्था का रोना-रोते रहते हैं। पर यह भूल जाते हैं कि हमारे आस-पास ही 'शशि' जैसे लोगों के उदाहरण भी हैं जो उसी व्यवस्था से टक्कर लेकर एक आदर्श समाज, गांव का निर्माण करने में अपना सर्वस्व झोंक देते हैं। आज ऐसे लोगों को सकारात्मक सहयोग देने और उनसे प्रेरणा लेकर पहल करने की आवश्यकता है और अगर ऐसा हो सका तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन