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जनसेवा |
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आदिवासियों का सच्चा साथी |
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राकेश कुमार |
सभी
मनुष्यों के जीवन में प्रेरणा और प्रभाव के क्षण आते
हैं। लेकिन सभी इस प्रेरणा को अपने जीवन के लक्ष्य
साधन में उपयोग नहीं कर पाते। सामाजिक जीवन और
राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को निभा पाने के लिए
अंत:प्रेरणा
आवश्यक है। विनोबा भावे से प्रेरणा पाने वाले मेवाड़
के उद्यमी पुत्र मनोहर लाल सरुपरिया अपनी इच्छाशक्ति
और आंतरिक प्रेरणा के बल पर ही आधी
सदी
से भी ज्यादा वक्त मनुष्य मात्र की सेवा के लिए लगा
चुके हैं। चितौड़ के भदेसर ग्राम में सन
1932
में जन्मे सरुपरिया विधार्थी
जीवन से ही संवेदनशील और सामाजिक दायित्व की प्रेरणा
से ओत-प्रोत थे।
सरुपरिया
1977 में विनोबा भावे से मिलने
पवनार आश्रम गए थे। वहां प्रेरणा से उन्होंने विनोबा
संदेश नाम की संस्था का गठन किया और मेवाड़ में गरीब,
वंचित और समाज की मुख्य
धारा
से कटे आदिवासियों के अधिकारों में अवरोध बने
भ्रष्टाचार को मिटाने का संकल्प लिया। उन्होंने बिना
किसी बड़े औपचारिक तंत्र के अपने स्तर पर समाज सुधार
और मानव सेवा के प्रयास अनवरत जारी रखे। अकाल के
दौरान सरुपरिया जी ने गरीब भूखे आदिवासियों को भोजन
से लेकर कपड़े जैसी जरूरत की चीजें मुहैया करवाई।
प्रशासकीय कामों और मजदूरी के लिए
शहर आने वाले आदिवासियों और भूखे गरीबों के लिए वे
वर्षों से भोजन उपलब्ध कराते रहे हैं। समाज सेवा के
नाम पर जहां आज सिर्फ पैसे के लिए काम करने की
परंपरा बनती जा रही है वहीं सरुपरिया ने समाजिक जीवन
के जिस क्षेत्र में भी विसंगति देखी वहीं प्रयास
पूर्वक सुधार
का यत्न किया। इन्हीं कोशिशों का नतीजा था कि
1982
में उदयपुर शहर में पुलिस रिकार्ड
में हिस्ट्रीशीटर के रूप में दर्ज लोगों ने जिला
कलक्टर के समक्ष माफी का निवेदन किया।
सरुपरिया के प्रयासों से इन लोगों को
बैंको से मदद मिली और ये लोग स्वरोजगार के जरिये
समाज की मुख्य
धारा
में शामिल हुए। पर्यावरण के लिए सरुपरिया के प्रयास
प्रशंसनीय हैं। उम्र की परवाह न करते हुए उन्होंने
मेवाड़ के बर्बाद होते जा रहे वनक्षेत्र में अपने
स्तर पर वृक्षारोपण और वृक्ष पालन की पहल की।
आदिवासी समाज की मौजूदा दशा और पिछड़ेपन के लिए जहां
सरकारी नीतियां और भ्रष्टाचार जिम्मेदार हैं वहीं
आदिवासियों में फैली बुराइयां और नशाखोरी भी इसके
लिए समान रूप से उत्तारदायी है।
इसी सच्चाई को महसूस करते हुए
सरुपरिया ने आदिवासी क्षेत्रों में
धार्मिक
और पुरातन आस्था को आधार
बनाकर नशामुक्ति और संकल्प का अभियान चलाया है। इस
अभियान को जबरदस्त सफलता मिली। हजारों आदिवासी
परिवारों ने नशे और दूसरी बुराइयों से तौबा की।
सरुपरिया ने अकाल और गरीबी के चलते विवाह से वंचित
रहने वाले अधिकांश आदिवासी जोड़ों का विवाह करवा कर
भी उन्हें शेष समाज से जोड़ने का प्रयास किया। करीब
पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी सरुपरिया जी निरंतर
बिना किसी श्रेय की इच्छा से अपने इन प्रयासों में
जुटे हैं और लोगों को निरन्तर प्रेरित करने का
महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
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