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भारत विकास संगम |
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संगम
का
नया
शास्त्र |
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रामबहादुर
राय |
गोविंदाचार्य कहां तक उस जमावड़े को
समझा सके,
यह कहना कठिन है। लेकिन,
उन्होंने जो कहा उसे अगर वहां आए
लोगों ने गांठ बांध
ली होगी तो भारत विकास संगम नए जमाने
का ऐसा मंच बन सकता है जिसके हर अंग और उपांग की
प्रेरणा समान होगी। उन्होंने यह समझाने का प्रयास
किया और साफ संदेश दिया कि भारत विकास संगम को एक और
नया संगठन मत समझिए। यह तो मंच है जिसे सबको जोड़ना
है।
बनारस में एक मित्र का सहज ही सवाल
था कि गोविंदाचार्य क्या करना चाहते हैं?
ऐसी जिज्ञासा वाले वे अकेले व्यक्ति नहीं हैं। देश
भर में जगह-जगह ऐसे लोग फैले हुए हैं जो जानना चाहते
हैं कि
'भारत
विकास संगम'
क्या है?
वे यह तो
जानते हैं कि गोविंदाचार्य के बगैर भारत विकास संगम
का कोई मतलब नहीं है,
लेकिन वे यह नहीं जानते कि इसे किस रूप में देखें और
समझें। जो लोग जिज्ञासावश पूछते हैं उनका भाव यह
होता है कि गोविंदाचार्य निरर्थक कामों में लगे हुए
हैं,
यानि वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं।
ऐसे लोगों ने बिना सोचे समझे अपना नतीजा निकाल लिया
है। जब चुनावी राजनीति के दायरे में इसे आंका जाएगा
तब यह कुछ हद तक सही माना जा सकता है। प्रश्न रेखा
चुनावी राजनीति पर है। लेकिन वह अब सार्थक बदलाव का
जरिया नहीं रह गई है। ऐसी स्थिति में गोविंदाचार्य
से बड़ी राजनीति की उम्मीद करने वालों को यह भी समझना
चाहिए कि फुरसत के वक्त की भी एक राजनीति होती है।
भारतीय राजनीति के दो पाट बन गए हैं।
ये दोनों समानांतर हैं। कहीं मिलते नहीं हैं। एक पर
चुनावी अखाड़ा होता है तो दूसरे पर समाज साधना
की धूनी होती है। इन समानांतर पाटों में भारत विकास
संगम को अलग से देखने की जरूरत है। उसे सिर्फ चुनावी
राजनीति या उससे बड़े लक्ष्य के मुट्टे के ही आधार
पर जांचना-परखना जल्दबाजी होगी। इसके विपरीत यह कहना
भी जल्दबाजी होगी कि भारत विकास संगम का इन मुट्टों
पर रुख क्या होगा। क्या वह चुनाव के प्रति उदासीन
रहेगा,
जैसा कि कभी रचनात्मक संस्थाएं
रहा करती थीं। इस तरह के अनुमान का आधर
अतीत होता है। उस तरह के अनुभव पर अनुमान लगाए जाते
हैं। भारत विकास संगम में जो अतीत के अनुभव खोजना
चाहेंगे उनको कुछ न कुछ खोट मिल ही जाएगा। जो फर्क
की बारीकी देख सकेंगे वे पाएंगे कि यह भिन्न प्रकार
का मंच है। भारत विकास संगम का तीन दिनों का जो
दूसरा जमावड़ा गत दिसंबर में हुआ,
उसके नेतृत्व में राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ, सर्वसेवा
संघ, भाजपा,
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,
स्वदेशी जागरण मंच,
गायत्री परिवार,
मध्यस्थ दर्शन और आजादी बचाओ
आंदोलन के विचारों का साझापन है। क्या इसी रूप में
यह संगम है? सतह तौर पर
यही दिखता है। जरा गहरे उतरें तो कुछ और ही नजारा
है। उसमें आकर्षण है। रंग-बिरंगापन है। यही इस संगम
का वह सूक्ष्म तत्व है जो जितना मजबूत होता जाएगा
उतना ही इसमें प्रवाह होता चला जाएगा। जिस संगम को
हम जानते हैं, वहां गंगा,
यमुना और सरस्वती का मेल होता
है। इन तीनों नदियों के अपने स्वभाव के संयोग से
संगम की महिमा बनती है। भारत विकास संगम में कर्ता,
प्रेरणा
और अधिाष्ठान का संयोग दिखने लगा है। यही उसे दूसरे
मंचों से भिन्न स्वरूप देता है।
गोविंदाचार्य कहां तक उस जमावड़े को
समझा सके,
यह कहना कठिन है। लेकिन,
उन्होंने जो कहा उसे अगर वहां आए
लोगों ने गांठ बांध
ली
होगी तो भारत विकास संगम नए जमाने का ऐसा मंच बन
सकता है जिसके हर अंग और उपांग की प्रेरणा समान
होगी। उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया और साफ
संदेश दिया कि भारत विकास संगम को एक और नया संगठन
मत समझिए। यह तो मंच है जिसे सबको जोड़ना है। कुछ लोग
इसे गठबंधन की राजनीति का युगधर्म बता सकते हैं। वे
अपने नजरिए में संभवत: सही ही होंगे। ऐसा नहीं है कि
वे आखिरी सच को पा चुके हैं। इसे सिर्फ उनका नजरिया
ही मानना चाहिए। लोकतंत्र का मतलब भी यही है। इसके
बावजूद यह सवाल बना ही रहता है कि आखिर भारत विकास
संगम है क्या?
भारत विकास संगम को जानने-समझने और
पहचानने का प्रश्न इसलिए खड़ा होता है क्योंकि वह एक
पड़ाव पर पहुंच गया है। उसके दूसरे जमावड़े से इतना
साफ हो गया है कि वह एक-एक कदम बढ़ रहा है। अगर पहले
जमावड़े में ही उसका प्रारंभ और अंत हो जाता तो फिर
यह समझने की जरूरत भी नहीं रहती कि भारत विकास संगम
क्या है?
यह जरूरत ही इसलिए पड़ी है
क्योंकि इसने अपने सफर का एक मुकाम पा लिया है। जिन
लोगों ने रामबाग के इस जमावड़े को देखा,
वे इसे सघनता से महसूस कर सकते
हैं। जिन्होंने बनारस के पहले सम्मेलन को देखा होगा
वे ही तुलना करने में अधिक सक्षम हो सकेंगे। भौतिक
रूप से पहले और दूसरे जमावड़े में दूरी 70
किलोमीटर
की ही होगी। लेकिन समय के हिसाब से देखें तो तीन साल
का फासला है। अब जिस तीसरे भारत विकास संगम की घोषणा
हो चुकी है उसे हर मायने में लंबी छलांग लेनी है।
उत्तर से दक्षिण की यात्र उसे पूरी करनी है।
पहले जमावड़े में गोविंदाचार्य अकेले
थे। पर दूसरे में वे कम-से-कम तीन सहयोगियों के
केंद्र में हैं,
शरद कुमार साधक,
सूर्यकांत जालान और बसवराज
पाटिल। उस समय उनको नए रास्ते की तलाश थी। कह सकते
हैं कि अपने चालीस साला सार्वजनिक जीवन के जंगल में
खट्टे-मीठे अनुभवों की पोटली लेकर वे बियावान में
भटक रहे थे। रास्ते की खोज के लिए उन्होंने भारत
विकास संगम को बनारस में रखा था। इन तीन सालों में
वे देश भर के सरोकारी समूहों के अगुआ बन गए हैं और
लोग उनसे नेतृत्व की उम्मीद कर रहे हैं। वहीं
गोविंदाचार्य हैं कि संयोजन तक ही अपने को सीमित
रखना चाहते हैं। इस बार जहां भारत विकास संगम के लिए
लोग जुटे वह बनारस के करीब है। चुनार की एक पहाड़ी पर
जहां रचना, आंदोलन और
जमीनी सूझ-बूझ का संगम हुआ,
वह गंगा के किनारे उस किले से
थोड़ी ही दूर पर है, जहां
से चंद्रकांता संतति के तिलिस्म का रोचक सिलसिला
शुरू होता है, जिसे बाबू
देवकीनंदन खत्री ने जन-जन तक पहुंचाया। इन तीन सालों
में क्या गोविंदाचार्य ने वह रास्ता पा लिया है जिस
पर वे सरोकारी समूहों को चलने के लिए प्रेरित कर
सकेंगे?
उन्होंने इस संगम के लिए जो चिट्ठी
भेजी उसमें अनुभवों के आदान-प्रदान का न्योता था।
साफ है कि उन्हें कुछ कहना है और दूसरों से सुनना भी
है। वैसे तो वे यह सिलसिला सात साल से चला रहे हैं।
उनका देश भर में फैले समूहों से सीधा नाता जुड़ गया
है। इसका प्रमाण इस संगम में दिखा। नहीं तो केवल
चिट्ठी पाकर कोई सैकड़ों किलोमीटर का सफर कर एक
अनजानी सी जगह में क्यों आता। इंतजाम जितना था और
जितने लोगों के लिए था,
वह छोटा पड़ गया। इस कारण संगम की
सार्थकता में संदेह प्रकट किया गया। जो अधिक संवाद
की आशा करते थे उन्हें निराश होना पड़ा। अनेक
महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हो ही नहीं सकी। लेकिन,
इस मायने में संगम सफल रहा कि
इसमें नए चेहरों की भरमार रही। इससे यह मतलब भी
निकाला जा सकता है कि थके-हारे लोग घर बैठ रहे हैं
और दूर तक जा सकने वाले जुड़ते जा रहे हैं। बहते हुए
जल की निशानी यही होती है। उसमें प्रवाह होता है।
प्रकृति का दूसरा नाम प्रवाह है। जहां प्रवाह है
वहीं सृजन की संभावना होती है। इस संगम में दो तरह
के लोग थे। एक वे जो बुलाए गए थे। दूसरे वे जो आए
थे। जो बुलाए गए थे,
उनमें से कई गुरुघंटाल थे। वे अपने फन के माहिर हैं।
उनमें से कई को किसी भी तरह सफलता पा लेने की कला
आती है। आयोजकों ने उन्हें बुलाया और वे आए। अपनी
बात सुनाकर वे चलते बने। इससे जो छाप पड़ी उसको धोने
और साफ करने की कोशिश भी हुई,
पर बेकार रही। अगर ऐसे आयोजन में
सफलता ही कसौटी होगी तो जिस 'दिशासूत्र'
से संगम प्रेरित माना जाता है उस
पर गंभीर प्रश्न भी पैदा होता है। बनारस के भारत
विकास संगम में एक 'दिशासूत्र'
अपनाया गया था। काफी सोच-विचार
कर उसे 2004 के सम्मेलन
में स्वीकार किया गया था। उसकी दो भुजाएं
हैं-सांस्कृतिक प्ज्ञफनर्जागरण और व्यवस्था
परिवर्तन। इस पर वैचारिक विमर्श इस संगम में हुआ ही
नहीं। इससे कर्ता,
अधिाष्ठान और प्रेरणा को जो बल मिल सकता था उसका
अभाव बना रहा। विचार की सामग्री यानी खुराक का यह
अभाव कुछ मायने में गोविंदाचार्य के भाषण से पूरा हो
सका। सांस्कृतिक फनर्जागरण और व्यवस्था परिवर्तन के
सतही मुट्टों पर चर्चा अब काफी नहीं होगी। इसके नए
आयाम समझने होंगे। मजहबी आतंकवाद,
समानांतर यानि
काले धन की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के
खतरों को गहरे उतरकर समझना किसी भी दूरगामी अभियान
के लिए जरूरी हो गया है।
यह संगम नए तरीकों की खोज के लिए
बुलाया गया था। जिसके अपने-अपने क्षेत्र में अनुभव
हैं और वे सार्थक काम कर रहे हैं,
उन्हें सुनने से जो लोग प्रेरित
हुए होंगे, उनको अपने
क्षेत्र में प्रयोग करने की प्रेरणा
मिली होगी। यह कई गुना बढ़ जाता अगर
मीडिया का रुख संगम के प्रति सकारात्मक होता। मीडिया
की नजर में भारत विकास संगम स्थानीय घटना मात्र थी।
उसके इस रवैये से इतना ही फर्क पड़ेगा कि साधारण
नागरिक उन सूचनाओं से वंचित हो जाएगा जो उसके जीवन
को बदलने में सहायक हो सकती थीं। इसके बावजूद संगम
का संदेश देश के हर कोने में सजीव तरीके से
पहुंचेगा। वे लोग संदेशवाहक बनेंगे जो शरीक हुए।
परंपरागत तरीका यही है। भारत विकास संगम का यह
सिलसिला अगर बढ़ता रहा तो वास्तव में कुंभ की जो
परंपरा है वह इसमें प्रतिफलित होने लगेगी।
अशोक मेहता समाजवादी आंदोलन के नेता
रहे हैं। वे अपने साथी-सहयोगियों से कहा करते थे कि
हम उस तरह की परंपरा क्यों नहीं डाल सकते जैसे कुंभ
की होती है। यही परंपरा भूदान के प्रणेता विनोबा भी
सर्वोदय में उतारना चाहते थे। वे जो चाहते थे उसके
साकार होने की संभावना बन गई है। गोविंदाचार्य संगठन
से असंगठन की ओर बढ़ रहे हैं। भारत विकास संगम उसका
एक नमूना है। क्या यही वह नया औजार होगा जिससे
व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ी जाएगी?
इस संगम ने जो कार्यशैली अपनाई
है उसमें स्थानीयता पर जोर है। पिरामिड पलटने की यह
तरकीब कारगर हो सकती है। जहां शक्तिसंचय अक्षुण्ण है
वह सबसे निचला केंद्र ही हो सकता है। राजनीतिक दल और
दूसरे संगठनों का लक्ष्य होता है-एक राष्ट्रीय संगठन
बनाना। भारत विकास संगम इस क्रम को पलट रहा है। इसे
संघीय अवधारणा में समझना अगर कोई चाहे तो मुश्किल
होगी। इसे देश की अपनी परंपरा में समझना आसान होगा,
जहां जनपद और गांव केंद्र में
होते थे। सांस्कृतिक फनर्जागरण और व्यवस्था परिवर्तन
को जनपद और गांव के संदर्भ में समझने-समझाने के लिए
गोविंदाचार्य ने एक नारा दिया है- 'हमारा
जिला, हमारी दुनिया'।
इस खाके में रंग भरकर बाजारवाद से पार पाया जा सकता
है। इसके लिए जैसे लड़ाके चाहिए वैसे भारत विकास संगम
की कार्यशैली से निकल सकेंगे,
यह भविष्य
बताएगा। ऐसे प्रयासों का इतिहास इतना ही बताता है कि
हर जंग के अपने लड़ाके होते हैं। जमाना उन्हें गढ़ता
है। नेतृत्व उनको रास्ता दिखाता है। यह जरूरी नहीं
है कि नेतृत्व का वही रूप हो जो हम जानते हैं। हर
जमाने में नेतृत्व अपना स्वरूप बदल लेता है। जिसका
जीवन समाज के सरोकार से संचालित होता है वह किसी भी
परिस्थिति में नेतृत्व दे सकने में समर्थ होता है।
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