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भारत विकास संगम
2008 |
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कहना नहीं
अब करना है |
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के.एन.
गोविंदाचार्य राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन) |
तीन दिनों में हम सब लोगों ने बहुत
कुछ सुना है,
समझा है,
सीखा है और बताया भी है। एक
दूसरे से सीखने की प्रक्रिया सत्र के अलावा भी हम
लोग चलाते रहे हैं। सब ने सबसे लाभ लिया है। हर समय
हम लोग व्यस्त भी रहे इस मायने में । जितना कुछ हम
सबके द्वारा कह दिया गया है,
उसके बाद करना ज्यादा है,
कहने-सुनने की जरूरत कम है।
उद्धघाटन
दिया गया वक्तव्य:
भारत
विकास संगम में आप सभी का स्वागत है। यहां बहुत से
लोग अपने-अपने समूहो
के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित हैं। उनके पास
बताने के लिए बहुत कुछ है। यहां उपस्थित सभी लोगों
के लिए उनका बताना बहुत उपयोगी होगा। यदि कोई जमीन
के लिए काम कर रहा है,
तो वह
फसल के लिए काम करने वालों से बहुत कुछ सीख सकेगा।
जो फसल के लिए काम कर रहा है,
वह
छोटे उद्योगों के बारे में सीख सकेगा। जो कारीगरी के
लिए काम कर रहा है वह गायों के बारे में सीख सकेगा।
जो किसानों के लिए काम कर रहा है,
वह देश
की सुरक्षा के बारे में सीख सकेगा। जो लोग व्यवस्था
परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं तो उनके पास भी
सीखने और सिखाने के लिए बहुत कुछ होगा। इन सबके
साथ-साथ शिक्षा,
स्वास्थ्य,
संस्कार के बारे में बहुत लोग अपनी-अपनी जगह पर बहुत
कुछ काम किये हुए हैं,
जो आज
यहां इकट्ठा हैं। इस मायने मे यह भारत विकास संगम
है। यह भारत विकास संगम का सम्मेलन या अधिवेशन नहीं
है। यह स्वयं में एक संगम है,
जिसमें
बहुत सारे लोग आये हैं और एक दूसरे से बहुत लाभ ले
सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कुम्भ में बहुत
ज्यादा व्यवस्था सामूहिक रूप में होती ही नहीं है।
क्योंकि इतने प्रकार के लोग आते हैं कि वहां एक मंच
से क्या होगा?
वहां सभी लोग बिना किसी एक व्यवस्था
से बंधे स्वतंत्र रूप से मिलते-जुलते हैं। इतने बड़े
आयोजन में वही शायद अच्छी व्यवस्था हो सकती है। यहां
भारत विकास संगम के इस सम्मेलन में भी थोड़े से
प्रयास से साढ़े तीन सौ से अधिक लोग बैठे हैं। जबकि
काशी से जो प्रतिभागी होने थे और सुरभि शोध संस्थान
के लोग अभी यहां नहीं बैठे हैं। इसके अलावा
तीस-पैंतीस लोग नीचे से सुन रहे हैं। वे लोग उफपर
इसलिए नहीं आ रहे क्योंकि यहां और लोगों के बैठने की
जगह ही नहीं है।
मैं आप लोगों से यह कहना चाहता हूं
कि कभी-कभी एक बड़े काम को छोटा समूह कर देता है।
जबकि वही काम लाखों की सदस्यता वाले संगठन भी नहीं
कर पाते। इसलिए सबकी अपनी-अपनी भूमिका रहती है। कोई
काम न तो बड़ा होता है,
न छोटा होता है। केवल अपने आकार
से यदि कोई खुद को बड़ा मानने लगे तो वह बड़ा होता
नहीं है। आज चुनौतियां दूसरी हैं। इसलिए संवाद,
सहमति और सहकार की जरूरत है।
अखिल भारतीय स्तर पर संवाद अधिक हो सकता है। प्रदेश
के स्तर पर अधिक सहमति हो सकती है और सहकार तो जिले
स्तर पर ही सबसे ज्यादा होगा। इसलिए 'हमारा
जिला हमारी दुनिया' फिर
माइक्रो लेवल पर काम करना है। व्यवस्था परिवर्तन की
बात करें तो हमें यह तय करना होगा कि तात्कालिक,
मध्यकालिक
और दीर्घकालिक स्तर पर क्या होगा?
इस पर चरणबध्द ढंग से विचार करना
होगा। व्यवस्था परिवर्तन होगा कैसे?
उसमे सत्ता परिवर्तन की कोई
भूमिका है या नहीं है। अगर सत्ता और दलीय राजनीति की
भूमिका है तो उसका प्रतिकार कैसे हो?
उसके मुकाबले में जनहित का रक्षण
कैसे हो? खासकर अंतिम
आदमी के हित की रक्षा कैसे हो सकती है?
ये सारे विषय अभी खुले हुए हैं।
इसलिए ऐसी स्थिति में कोई आदमी ठेका नहीं ले सकता
अंतिम उत्तार देने का। मेरे पास भी नहीं है। इसलिए
हम सबको साहस,
पहल और प्रयोग की अंगुली पकड़ कर
आगे बढ़ना होगा। अपने प्रयोगों और उससे निकले अनुभवों
का आदान-प्रदान करना होगा। उन अनुभवों को अपने जरूरत
की छननी से छान लेना होगा। हमारे स्थान के लिए जो
उपयुक्त हो, उसे अपने ढंग
से आजमा लेना होगा। यही आगे बढ़ने का तरीका होगा। इस
सबमें संवाद की हमेशा जरूरत होगी। अलग मत रखना मतभेद
नहीं माना जाना चाहिए। एक के प्रयोग के अनुभव कुछ,
जबकि
दूसरे के कुछ और हो सकते हैं। इसलिए मतांतर के प्रति
आदर का भाव रखना होगा। यह जरूरी नहीं कि मेरी बात
सभी लोग मानें ही। हम यह गुंजाइश छोड़ें कि अच्छा
लगेगा तो लोग मानेंगे।
भारत विकास संगम के अनुभवों को
संजोकर हमें यह तय करना होगा कि हम अपने क्षेत्र में
क्या करेंगे। हमारी सोच विश्वव्यापी होनी चाहिए और
काम स्थानीय।
'हमारा
जिला, हमारी दुनिया'
की जो अवधारणा
है,
उसके क्रियान्वयन के लिए
क्या-क्या करें, इसके लिए
भी सोचने और कुछ करने की जरूरत है। यदि हम लोग
लक्ष्य लेकर चलते हैं तो बीच की चुनौतियों और बीच के
तकाजों
से
भी हम अधिक सफलता-कुशलता पूर्वक निपट पायेंगे,
ऐसा दृश्य
बन रहा है।
समापन समारोह के दौरान दिया गया
वक्तव्य:
तीन दिनों में हम सब लोगों ने बहुत
कुछ सुना है,
समझा है,
सीखा है और बताया भी है। एक
दूसरे से सीखने की प्रक्रिया सत्र के अलावा भी हम
लोग चलाते रहे हैं। सब ने सबसे लाभ लिया है। हर समय
हम लोग व्यस्त भी रहे इस मायने में। जितना कुछ हम
सबके द्वारा कह दिया गया है,
उसके बाद करना ज्यादा है,
कहने की जरूरत कम है। भारत विकास
संगम के नाम से हम लोग पहली बार तीन साल पहले मिले
थे। वह शुरूआत ही थी। उसमें अनायास ही सब लोग जुट गए
थे। उस सम्मेलन में बहुत कुछ सोचा नहीं गया था,
लेकिन सहज ही यह बात आई कि हां
कुछ होना चाहिए, कुछ हो
सकता है। होना चाहिए की इच्छा और हो सकता है का
विश्वास,
इतना उसमें से प्राप्त हुआ था। उसके
बाद तीन साल तक सब लोग अपने-अपने काम में लगे ही
रहे। इन तीन सालों में मुझे भी काफी कुछ देखने-समझने
का अवसर मिला।
अब तक हमने जो यात्रा की है,
उसमें कुछ बातें हमारे सामने
स्पष्ट होती गई हैं जैसे- सृष्टि,
सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी पर
अलग-अलग जगहों की स्थिति भी अलग-अलग होती है। इसके
कारण जल, वायु,
प्रकाश,
उष्मा,
भोजन,
भवन, भाषण,
भजन सबकी अलग-अलग स्थितियां बनती
हैं। इसी सन्दर्भ में हमने ये जाना कि 'दुर्लभं
भारते जन्म मनुष्यं तत्र दुर्लभम्',
फिर उसी के तहत ये भी जाना कि
भारत पर प्रकृति की,
परमात्मा की कृपा है,
इसी के कारण यहां एक विशेष दैवीय त्रिकोण अखंड चलता
है। उसी में ये भी समझा था कि सूर्य भगवान के
आशीर्वाद से घर की माता,
गौमाता और
धरती
माता,
इनका परस्पर पोषण चलता रहता है।
भारत के अलावा दुनिया के अन्य भू-भागों में
ऐसा
नहीं है। घर की माता गौमाता और
धरती
माता की सेवा करे तो गौमाता घर की माता को दूध
दे
और
धरती
माता को उसकी खुराक दे।
धरती
माता की खुराक वही है जो
धरती
से उगे और फिर जमीन में वापस आए। हम जानते हैं कि
गोबर हो,
गोमूत्र हो,
कोई भी मल हो,
सभी को सूर्य के कारण रूपांतरित
होकर खाद का स्वरूप मिल जाता है। इसलिए
धरती
भी घर की माता को अनाज और गौमाता को चारा देती है।
एक
ध्रुव
से दो शेष
धुवों
का संपोषण होने के कारण त्रिकोण चलता ही रहता है
अखंड। यह सब इंग्लैड में नहीं हो सकता। सूर्य के
सापेक्ष अपने भूखंड की स्थिति के कारण भारत के
निवासियों का भू-मनोविज्ञान अलग होता है,
भू-राजनीति अलग प्रकार की हो
जाती है, भू-अर्थनीति अलग
हो जाती है, भू समाजनीति
अलग हो जाती है। समाज की संरचना,
समाज की संस्कृति,
समाज का मनोविज्ञान,
सब अनोखापन
धारण
कर लेता है। इसके कारण यहां जमीन,
जल,
जंगल, जानवर,
जीविका और जीवन की एक विशिष्ट
शैली विकसित होती है। यहां सभी प्राणियों के बीच
जीवंत संबंध है। यहां व्यक्ति,
परिवार,
पड़ोस,
गांव, समाज,
दुनिया,
सृष्टि,
परमेष्टि सभी को एक ही चेतना की
अभिव्यक्ति माना गया है। हमें यह भी समझ में आया है
कि यहां गांव, गाय,
खेती,
किसानी सब मिली-जुली चीजें हैं। कोई भी एक घटक कमजोर
होगा तो बाकी भी कमजोर होगा ही होगा। दीवार की एक
ईंट घिसकेगी तो
धीरे-धीरे
दीवार भी भरभरा कर मिटेगी। इसी संदर्भ में हमने ये
जाना है कि देश की तासीर और जरूरत के हिसाब से
चलेंगे तो आगे बढ़ेंगे। तासीर,
तेवर,
जरूरत की बिना पहचान या परवाह के चलेंगे तो घटेंगे।
इसलिए रोटी-कपड़ा और मकान,
पढ़ाई-दवाई, पेयजल,
ऊर्जा सभी के बारे में हमारी
नीतियां अपनी जरूरत के हिसाब से होनी चाहिए। हमने ये
भी जाना है कि विकास का अर्थ संस्कृति का विनाश नहीं,
विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश
नहीं। समृध्दि भरपूर रही,
संस्कृति न रही तो सृष्टि रावण की लंका हो जाती है।
संस्कृति रही,
समृध्दि न रही तो वो सुदामा हो जाती
है। हम समृध्दि और संस्कृति दोनों के संतुलित स्वरूप
के ही उपासक हैं।
हमारी परंपरा हमें बताती है कि
संपत्ति और
धन-दौलत
तो चलती नाव में भरते हुए पानी के समान है। पानी अगर
नाव से बाहर रहे तभी अच्छा है। अंदर पानी भरते जाना
अच्छे भविष्य का लक्षण नहीं होता। किसी परिवार में
आते हुए धन को सद्कर्मों में दोनों हाथों से उलीचने
की क्षमता अगर नहीं रही तो डूबना तय माना जाता है।
हमने ये भी सुना है कि अमीर दो तरह के होते हैं-
आंतरिक और बाहरी। अब सेक
एकड़
जमीन किसी के पास हो और उसमें बगल की झुग्गी-झोपड़ी
को उजाड़ने की अकुलाहट बनी रहे,
करोड़ों का बैंक बैलेंस हो और बगल
की जमीन हड़पने की साजिश में शामिल रहे तो उसे तो
गरीब ही कहा जाएगा। ऐसा व्यक्ति बाहर से बेशक अमीर
दिखे, अंदर से तो वह गरीब
ही है। और जो बाहर से अमीर और अंदर से गरीब है वह
कैसे सुखी होगा? सुख तो
अंदर की चीज है। बाहर का गरीब यदि अंदर से अमीर रहता
है तो ज्यादा सुखी रहता है। इसी प्रकार हमने सुना है
कि आदमी न बड़ा होता है न छोटा होता है,
आदमी-आदमी होता है। बड़ा वही होता
है जिसका मन बड़ा होता है। अब अगर हमको सुख पाना है,
दुनिया में अपनी भूमिका अदा करनी
है तो उसका रास्ता है स्वदेशी और विकेन्द्रीकरण।
स्वदेशी और विकेन्द्रीकरण के पहिए पर जो रथ चलेगा,
उसी से हम विकास के रास्ते चल
पाएंगे। वास्तविक विकेन्द्रीकरण वह है जिसमें सत्ता
और संसाधन
दोनों का विकेन्द्रीकरण हो। आज की संपूर्ण स्थितियों
में कंपनियों और पार्टियों की प्रभुसत्ता से मुक्त
हम एक स्वायत्ता समाज चाहते हैं। फिर इसकी प्रक्रिया
के नाते हमने जाना है कि इसके लिए केवल सत्ता
परिवर्तन से काम नहीं चलेगा। मात्र सत्ता परिवर्तन
से चेहरे बदल जाते हैं चाल वही रह जाती है। व्यक्ति
और पात्र बदल जाते हैं,
प्रवृत्ति वही रह जाती है। इसलिए
कुछ और, कुछ इससे परे
करने की जरूरत है। इसी सन्दर्भ में हमारे अनुभव में
आया कि 'सत्ता आगे,
समाज पीछे तब तो होगा सत्यानाश,
समाज आगे सत्ता पीछे- तब तो होगा
स्वस्थ विकास।' जहां तक
भारत की तासीर की बात है तो हमने सुना है कि भारत
केवल राजसत्ता से संचालित नहीं होता,
बल्कि यह
धर्मसत्ता,
उसके अधीन
समाज सत्ता,
उसके अधीन
राजसत्ता और उसके अधीन
अर्थसत्ता से संचालित होता आया है।
ये सब बातें हम पिछले वर्षों में
एक-दूसरे से समझते-समझाते आ रहे हैं। आज के संदर्भ
में जब हम चीजों को देखते,
समझते हैं तो पता चलता है कि
पहले हम सरकारवाद के प्रभाव में थे और अब बाजारवाद
की मार झेल रहे हैं। बाजारवाद के इस दौर में सबसे
ऊपर अर्थसत्ता और उसके अधीन
राजसत्ता,
समाजसत्ता और
धर्मसत्ता
की स्थिति है। हम इस पिरमिड को उलटना चाहते हैं। और
अगर ये सब होना है तो इसके लिए जनमानस तैयार करना
होगा। इसी सोच से हमने इन विषयों पर बहस चलायी है।
पिछले कुछ समय से देश में,
बेशक सीमित रूप से ही,
यह बहस चल पड़ी है कि सत्ता और
दलीय राजनीति की भूमिका क्या हो?
राजसत्ता की इस सब में भूमिका
क्या हो? राजसत्ता के
प्रति हमारी दृष्टि क्या हो आदि-आदि। इस बहस में हम
किसी एक निश्चित उत्तर पर नहीं पहुंचे हैं। लेकिन
इतना निष्कर्ष जरूर निकला है कि राजनीति को बेलगाम
नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि आज के दौर में राजसत्ता
की तारक शक्ति हो न हो,
उसकी मारक शक्ति तो बहुत है। राजनीति को नियंत्रित
करने के लिए जो उपाय
ध्यान में आता है,
वह यह कि देश में 1936
के पहले
की कांग्रेस की तर्ज पर एक समानांतर राजनैतिक
आन्दोलन की शुरुआत की जाए।
समझ के स्तर पर जब हम यहां तक पहुंच
जाते हैं तो फिर प्रश्न उठता है कि आगे क्या रास्ता
हो। व्यवस्था परिवर्तन की बात जब हम करते हैं तो
विश्व इतिहास के कई पहलू सामने आ जाते हैं। दुनिया
में तो सत्ता परिवर्तन की कौन कहे,
भयंकर क्रांतियां तक हुई हैं।
1789 में प्रफांस की
राज्य क्रांति हुई। लेकिन 52
साल बीतते-बीतते यह क्रांति
रोब्सपेअर के रास्ते नेपोलियन की तानाशाही में
परिवर्तित हो गयी। 1917
की रूस की राज्य क्रांति हुई। जार-जरीना खत्म हो गए।
वहां राजनीतिक रिक्तता थी। उस रिक्तता को भरने के
लिए ही लेनिन आया था। उसने अपनी सेना खड़ी की। सेना
के लिए पैसा कहां से आया,
कोई नहीं जानता।
लेनिन की मृत्यु के बाद पूरे ही स्टेट अपरेटस का
स्टालिनीकरण हो गया। समाज बदला नहीं था। ब्रेजनेव का
समय आते-आते कुछ समझ में आया जो गोर्बाचोव के रूप
में पूरा हुआ। और इस प्रकार राज्य के जरिए समाज
बदलने की बात करने वाली व्यवस्था का अंत हो गया। इस
सबके बीच समाज जस का तस बना रहा।
दुनिया की अगर देखें तो हम जान
पाएंगे कि संविधान
कोई शास्वत सत्य नहीं होता। फ्रांस का संविधान
कई-कई बार बदला गया। मैं सिर्फ संशोधन
की बात नहीं कर रहा हूं। जर्मनी में भी पिछली
शताब्दी में तीन बार संविधान
बदला गया। कोई लिखा हुआ संविधान
तो इंग्लैंड में है ही नहीं। बगल के नेपाल में तो
संविधान
बदलने की स्थितियां चुनाव के बिना ही उत्पन्न हो
गईं। माओत्से तुंग अगर चीन में आए थे तो किसी संविधान
के कारण नहीं। चीन में संविधान
के नाम पर पिछले वर्षों में बहुत कुछ नया हुआ है।
सार्थक परिवर्तन राज्य के द्वारा
होगा या राज्य के बिना होगा,
इसके बारे में कोई सटीक उत्तर
देना संभव नहीं है। किसी भी तरीके को पूरी तरह से
रिजेक्ट करना सही नहीं होगा। ऐसी स्थिति में जब कोई
उत्तर नहीं मिले तो गांधी
कहते थे,
'वन स्टेप इज इन फार मी'
अर्थात एक कदम आगे बढ़ो फिर
देखेंगे। यदि हमें दूर मंजिल पर जाना है और वहां तक
रोशनी फेंकने के लिए हमारे पास सर्चलाइट नहीं है तो
क्या हम बैठ जाएंगे?
नहीं। हम लालटेन की कुछ फुट की रोशनी में ही आगे
बढ़ेंगे। हमारे बढ़ने के साथ ही रोशनी भी आगे बढ़ेगी और
अंतत: हम अपने लक्ष्य तक पहुंच जाएंगे। हमें नजदीक
भी देखना है और दूर भी देखना है। अर्थात बाइफोकल
दृष्टि चाहिए। केवल दूर देखते रहे तो नजदीक के पत्थर
से ठोकर खाकर गिर पड़ेंगे। अर्थात सरकारों की मारक
शक्ति का प्रतिकार नहीं कर पाएंगे। और यदि नजदीक की
दृष्टि ही रही तो हम यही देखते रहेंगे कि इस सरकार
का क्या हुआ, उस सरकार का
क्या हुआ। इस पार्टी का क्या हुआ,
उस पार्टी का क्या हुआ। हम
चौराहे पर दिशा भ्रम के शिकार हो जाएंगे। फिर ऊपर
जाने की बजाए कोई पगडंडी हमको शायद नीचे ही उतारती
चली जाए। इसलिए ऐसी स्थिति में जितना दिखता है आगे
बढ़ते चलें, नीयत ठीक रहे,
प्रतिबध्दता ठीक रहे,
हम अपनी शक्ति,
बुध्दि,
क्षमता और कुशलता का सर्वाधिक
उपयोग करें,
यही सबसे कारगर उपाय है।
आज देश में जो परिस्थितियां हैं
उन्हें बदलने के लिए परिवर्तनकामी शक्तियों का
हिंसक हो जाना एक बड़ा खतरा है। डा. लोहिया ने एक बार
विचार के नाते निर्जीव हिंसा का जिक्र किया था।
अर्थात आदमियों को न मारो लेकिन मालगाड़ी को पटरी से
उतार दो। जिसमें यात्री हों उस गाड़ी को नुक्सान न
पहुंचाओ। इसे वे निर्जीव हिंसा कहते थे। लेकिन इतना
बारीक अंतर कागजी तौर पर तो हो सकता है,
व्यवहार में आम आदमी के लिए यह
अंतर कर पाना संभव नहीं है। डा. हेडगेवार ने कहा था
भगत सिंह सही थे या गलत,
इस पर बहस बेमानी है। लेकिन भगत सिंह ने जिस बात के
लिए अपना बलिदान दिया, वह
सही था या नहीं, इस बात
पर चर्चा की जानी चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि हर
कोई भगत सिंह नहीं बनता,
लेकिन जो बनता है वह निंदा का पात्र नहीं है। उससे
अपने को तटस्थ, उससे अपने
को दूर रखने की जरूरत नहीं है। अपने को दूर रखने की
कोशिश करना कहीं न कहीं मन में
अपने ही प्रति किसी डर की ही अभिव्यक्ति होती है।
प्राय: हम जो नहीं कर सकते,
उसे 'हम
नहीं करेंगे' या 'हमें
नहीं करना चाहिए' का आवरण
चढ़ा देते हैं। एक ही चीज के दो अलग-अलग हिस्से हैं।
सच कहें तो हमें इस एकेडमिक बहस में पड़ने की जरूरत
ही नहीं है। हमें तो बस आगे बढ़ने की जरूरत है। हम जो
भी करें, शांतिपूर्ण ढंग
से करें तो अच्छा होगा। राज्य की हिंसा को अपने
खिलाफ भड़काना अर्थात 'आ
बैल मुझे मार' की सोच ठीक
नहीं। लेकिन जब बैल अनायास ही मारे तो उससे निपट
लेने की स्थिति में अपने को रखने में कोई बुराई नहीं
है। हमें 'आ बैल मुझे मार'
की स्थिति में खुद को नहीं डालना
चाहिए। इसलिए शांतिपूर्ण पध्दति पर आग्रह जरूरी है,
हिंसा और अहिंसा के बारे में
तात्विक मतभेद रखने के बाबजूद। इसलिए जयप्रकाश जी ने
नक्सलवादियों को उस स |