|
भारत विकास संगम
2008 |
|
हम लोक विज्ञान के बीज सहेजने में लगे हैं |
|
रवीन्द्र शर्मा |
मैं हम चाहते हैं कि पश्चिमी
ज्ञान-विज्ञान की बाढ़ में यहां का सबकुछ डूब जाये,
उससे पहले
हमारे पास भारतीय लोक ज्ञान-विज्ञान और यहां की
परंपरा के जो भी बीज हैं वह सब इकट्ठा करके रख लिया
जाये। यह शायद फिर कभी भविष्य में काम आए।
आंध्र
प्रदेश से हूं। हमारा वहां एक छोटा सा कला आश्रम है
जिसमें हम लोककलाओं एवं लोकविज्ञान के संरक्षण का प्रयास
कर रहे हैं। हम फराणों की उस कहानी से प्रेरित हैं
जिसमें ऋषियों ने प्रलय के पूर्व संपण बीजों,
प्रजातियों एवं
ज्ञानसंपदा को एक जगह इकट्ठा किया और
महाप्रलय आने पर एक नाव में बैठकर उन सभी की रक्षा
की। प्रलय के बाद जब समुद्र शांत हुआ तो ऋषियों ने
बचाए हुए बीजों,
प्रजातियों और ज्ञानसंपदा के सहारे फिर से सृष्टि की
रचना की। हमें भी लगता है कि पश्चिमी ज्ञान के रूप
में एक प्रलय हमारे दरवाजे तक आ पहुंची है जिसमें
भारत का संपूर्ण लोक विज्ञान,
भारत की लोककलाएं,
भारत की सभ्यता,
भारतीय संस्कृति,
भारतीय परंपरा,
यह सब कुछ खत्म हो जायेगा। हम चाहते हैं कि पश्चिमी
ज्ञान-विज्ञान की बाढ़ में यहां का सब कुछ डूब जाये,
उससे पहले हमारे पास भारतीय लोक
ज्ञान-विज्ञान और यहां की परंपरा के जो भी बीज हैं
वह सब इकट्ठा करके रख लिया जाये। यह शायद फिर कभी
भविष्य में काम आए।
एक समय था जब हमारे पास के गांव में
लोहे से लेकर कागज और काजल तक लोग बना लेते थे। वो
क्या विधायें थीं और उसके पीछे क्या विज्ञान था?
हमारे इलाके में 1960-70
तक भी यह सब कुछ चला है। क्योंकि
हमने अपने आंगन में मुंह देखने वाला आइना बनते हुए
देखा है। हमारा इलाका पूरा आदिवासियों का इलाका है।
वहां तीन-चार तरह के आदिवासी हैं। एक सवाल यह भी है
कि क्या ये 100 साल पहले
आदिवासी थे। हम जब अतीत को खंगालते हैं तो पता चलता
है कि हमारे यहां 100
साल पहले लोहा
बनाने वाली जातियां थीं। उस वक्त हमारे ही इलाके में
एक लाख टन लोहा हर साल तैयार होता था। वहां का लोहा
बहुत अच्छा माना जाता था। हर घर में तीस-चालीस किलो
लोहा रोज तैयार हो जाता था। समय के साथ लोहा बनाने
वाले परिवार पूरे के पूरे आदिवासी हो गए। उनको सबसे
पिछड़ा हुआ आदिवासी मान सकते हैं। आठवीं शताब्दी से
लेकर अठारहवीं शताब्दी तक हुकूमत करने वाली जातियां
आज आदिवासी बन करके बैठी हुई हैं। अफगानिस्तान से
लेकर कन्याकुमारी तक नमक का व्यापार करने वाला समाज
आदिवासी बन गया है। अब उन्हें खुद अपना अतीत भी नहीं
पता है।
मैं जब बड़ोदरा से पढ़ाई पूरी करके आया
तो मुझे लोक विज्ञान से जुड़ी तमाम बातों को जानने और
उन्हें सहेजने की इच्छा हुई। मैं बहुत ज्यादा
लम्बा-चौड़ा इलाका तो नहीं घूमा। सिर्पफ
20
कि.मी. के अन्दर ही मैंने घूमना
चालू किया और सब कुछ देखता गया। क्योंकि हमारे यहां
एक कहावत है कि पांच कोस पर पानी बदले 10
कोस पर बानी। इसलिए हमारा सब कुछ
10-20 कोस के अन्दर ही
चलता रहा है। उसी के भीतर हमारा एक पूरा संसार था और
दुनिया थी। हम लोग तो अपने गांव को ही अपनी दुनिया
मानते थे। जितनी चीजें दुनिया में बनती हैं,
वह हमारे गांव में बननी चाहिए,
ऐसी हमारे यहां धारणा थी। यहां
के लोग हर काम की चीज खुद ही बना लेते थे। कैसे
बनाते थे और कैसे लोगों को व्यवस्थित रखते थे,
यह जानना बड़ा रोचक रहा। पता चला
कि यहां 20 किमी के दायरे
में तीन सौ साठ जातियां रहती थीं और उनके माध्यम
के
पास
360 तकनीकों में महारत होती थी।
बहुत लम्बा चौड़ा हिसाब है। एक गांव में अगर इतने तरह
के कारीगर रहते थे तो उसे हर प्रकार से परिपूर्ण,
हर प्रकार
से सक्षम और समर्थ गांव माना जा सकता है।
पुराने समय के कारीगरों और उनसे जुड़ी
कलाओं को जानने के पहले हमने ये समझा कि कोई भी काम
आदमी क्यों करता है?
पहले
तो
हर आदमी अपने काम में अपने आहार की
सुरक्षा को देखता है। अगर यह नजर नहीं आए तो वह अपना
काम छोड़ कर भाग जाएगा। दूसरा उस काम को लेकर व्यक्ति
समाज में गौरव चाहता है। ये दो चीज होने पर ही आदमी
मन लगाकर काम करता है। फरानी व्यवस्था में कारीगरों
को ये दोनों चीजें सुनिश्चित की जाती थीं।
हमको तो पढ़ाया गया है कि भारत कृषि
प्रधान देश है मगर हम लोग नहीं मानते। भारत देश तो
वास्तव में उद्योग प्रधान
देश था। कृषि प्रधान तो गांव की अर्थव्यवस्था थी।
हमारे यहां हर घर एक कारखाना था,
जिसको खत्म कर दिया गया है। आज
से बीस साल पहले तक तो आदिवासी औरत भी दो किलो चांदी
अपने जिस्म पर पहन कर घूमती थी। इतनी चांदी उनके पास
कहां से आई थी? ये सब
जानते हैं कि चांदी हिन्दुस्तान की जमीन से कभी भी
नहीं निकली। चांदी जितनी आई है हिन्दुस्तान में,
वह तो बाहर से ही आई है। बाहर से
हमारे आदिवासियों तक चांदी कैसे पहुंच गई,
यह कभी आपने सोचा?
यह चांदी उन्हें
उनके काम के लिए मिली थी। वे अपने समय के इज्जतदार
और समृध्द लोग थे।
हमारे यहां आज से बीस-तीस साल पहले
अगर बच्चा पैदा होता था तो कई संस्कार होते थे। जो
बच्चा पैदा होता था उसका परिचय केश खण्डन कार्यक्रम
में नाई के साथ,
कर्ण छेदन कार्यक्रम में सोनार
के साथ, वस्त्र
धारण्
कार्यक्रम में दर्जी के साथ होता था। इस प्रकार उसे
गांव की अर्थव्यवस्था से बड़े व्यवस्थित ढंग से जोड़ा
जाता था। इसी प्रकार आपसी सामंजस्य ऐसा था कि अगर
कोई आदमी मर जाता तो बांस का काम करने वाला बांस
लाता,
कुम्हार मटका लाता,
जुलाहा कपड़ा लाता,
हरिजन आग जलाता,
सुनार पंचरत्न लेकर के आता मुंह
में डालने के लिए तो दर्जी कपड़े के सिले हुए पूफल
लाता था। हर जाति का एक प्रतिनिधि अपनी एक-एक चीज
लेकर के वहां इकट्ठा होता और अंतिम संस्कार सारे लोग
मिल कर करते थे। इस तरह से वहां एक व्यवस्था बन गई
थी। हम तो वसुधैव कुटुम्बकम् मानने वाले लोग रहे
हैं? वसुधा का मतलब तो
सबकुछ होता है। पहाड़ भी है झाड़ भी है। नदी भी है
नाले भी हैं। पशु भी हैं और पक्षी भी हैं। इसलिए
बहते हुए पानी और गाय को हम मां का दर्जा देते हैं।
आदिवासी गूलर की झाड़ को अपनी मां मानते हैं। क्योंकि
उनका जो मूल फरुष है वह गूलर का दूध पीकर के बड़ा हुआ
था। गांव में तो उनके घर में गूलर का झाड़ होता ही
है। वह उनके लिए मां है। यहां सब वृक्षों के साथ,
सब पशुओं
के साथ हमारा कोई ना कोई रिश्ता रहा है। इस तरह कहा
जा सकता है कि समाज एक कुटुम्ब की तरह जीने के लिए
बहुत अच्छी पध्दतियां बनाए हुए था।
कई फरानी विधाएं आज खतरे में हैं।
आयुर्वेद के बहुत कालेज चल रहे हैं। पर चिंता की बात
यह है कि आयुर्वेद की परंपरा नहीं बचेगी। आने वाले
समय में आयुर्वेद जानने वाला डाक्टर होगा और वह हाथ
पकड़कर दुनिया भर का पैसा वसूलेगा। आज समाज में
वास्तु का पागलपन बहुत ज्यादा है। पर किसी को पता
नहीं कि हमको कैसा घर चाहिए। डिजाइन पर हम लोगों ने
भी बहुत काम किया है। डिजाइनिंग कैसी होनी है?
कैसी वेश भूषा हो?
कैसा घर हो?
यह सब हमारे लोगों ने बहुत
सोच-विचार के तय किया था। भारतीय परंपरा में घर के
पांच लक्षण हैं। पहला लक्षण है कि घर आरोग्य के लिए
श्रेष्ठ रहे। दूसरा लक्षण है कि घर आर्थिक रूप से
सही हो। तीसरा लक्षण है घर आधयात्मिक दिशा में बनाया
जाए और चौथा कि वह प्रकृति से प्रेम सिखाए। घर का
पांचवां लक्षण यह है कि वह सामाजिक हो। आज के घरों
में क्या यह सब है?
आयुर्वेद के अनुसार पैर गर्म,
पेट नर्म,
सर ठण्डा है तो आदमी आरोग्यशाली
है। मगर जब से ये सीमेंट के मकान बनने लगे यह
सिध्दांत उलटा हो गया। इसमें तो सर गर्म होने लगा है
और पैर ठण्डे होने लगे हैं। दूसरा यह कि जब हमारे
पास विशाल घर होते थे, उस
समय भी हमलोग जगह रोकने वाली कोई चीज इस्तेमाल नहीं
करते थे। पंगत लगाकर भोजन होता था और उस जगह का
इस्तेमाल अन्य कामों के लिए भी होता था। अब आधुनिक
ढंग से हम मकान बना रहे हैं तो उस घर की जरूरतें
बहुत हैं। वास्तु शांति करके उसमें घुसने के बाद
डाइनिंग टेबुल और डबलबेड जैसी कई चीजों की आवश्यकता
महसूस होने लगती है। हमारे घर धीरे-धीरे म्यूजियम
बनते जा रहे हैं।
हम लोग तीन व्यवस्थाओं में जी रहे
हैं। एक नेताओं की व्यवस्था है। दूसरी कलेक्टरों की
व्यवस्था है। तीसरी समाज की अपनी व्यवस्था है। एक
व्यवस्था तो समाज को मूर्ख समझती है। दूसरी
व्यवस्था समाज को कोरा कागज मानती है। वहीं समाज की
अपनी व्यवस्था बहुत दमदार और बहुत सामर्थ्यशाली है।
आज भी एक यज्ञ होता है तो
20-20
हजार लोग खाना खाते हैं। सब सहज ही हो जाता है उसके
लिए बहुत बड़ी-बड़ी बैठकें नहीं होतीं। समाज की अपनी
ताकत और सामर्थ्य है। मगर समाज अपनी ताकत भूल गया
है। अगर सचमुच हम व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव करना
चाहते हैं तो हमें समाज को उसकी ताकत से परिचित
करवाना होगा। तभी हम आगे बढ़ पाएंगे।
(प्रस्तुति
: नवलेश कुमार) |