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 फरवरी,  2008

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भारत विकास संगम 2008

हमें अपनी सोच और अपना तौर-तरीका बदलना होगा

बसवराज पाटिल (कोत्तल बसवेश्वर भारतीय शिक्षण समिति)

हमारा सपना है कि आने वाले तीन साल के अन्दर हजार से अधिक संगठनों को एक साथ लाया जाए। इस संगठित सज्जन शक्ति से देश में आशा और विश्वास का एक नया सूरज उगेगा।

 भारत विकास संगम, 2008 में दो प्रकार के लोग उपस्थित हैं। एक तरफ जहां 50-60 साल से उफपर के अनुभवी लोग हैं, वहीं दूसरी ओर इतिहास निर्माण की क्षमता रखने वाले युवा भी हैं। इन दोनों के मेल से हम लोगों को भारत का नवनिर्माण करना है। मेरे एक मित्र का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को लम्बी अवधि के लिए निश्चित काम पर लगाना है तो उसको एक विशेष माहौल में कम से कम तीन माह तक संस्कार देना चाहिए। उनके संस्थान का उट्टेश्य यह है कि 2020 से पहले हर शहर, हर गांव में समग्र समाज के निर्माण के लिए लगभग छह लाख लोग तैयार हो सकें। जब मेरी उनसे पहली बार बातचीत हुई तो मैंने उनसे कहा कि यह सुनने में तो बहुत अच्छा है, लेकिन जब व्यावहारिक तौर पर शुरू करेंगे तो कई कठिनाइयां आयेंगी। जैसे यदि यहां बैठे सभी लोगों को सूचना पत्र में कहा गया होता कि आप लोगों को यहां तीन माह रहना है, तो गोविन्द जी के साथ संभवत: केवल तीन लोग ही होते। ऐसे माहौल में एक विशिष्ट प्रकार के संकट में हम लोग हैं। जब हम समाज में घटने वाली घटनाओं को देखते हैं तो काफी वेदना होती है और कुछ करने की इच्छा होती है। कभी-कभी अपने-अपने जगह पर बैठकर हम लोग बात भी करते हैं। लेकिन प्राय: हमारी बात बात ही रह जाती है, उसे जमीन पर उतारने के लिए हम आगे नहीं बढ़ पाते। ऐसा अक्सर अनुभव की कमी के कारण भी होता है। यहां हम तीन दिन के लिए हैं और इस दौरान हमारा कई अनुभवी लोगों से परिचय होगा। आपमें से जो अनुभवी लोग हैं, उनसे  मेरी प्रार्थना है कि भगवान ने आपको जो भी अनुभव और सद्गुण दिया है, उसे इस भारत विकास संगम में खुलकर बांटें। बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं के जोश को साथ मिलाने से ही बात बनेगी। जोश का होश के साथ तालमेल बिठाने से ही बड़े काम किए जा सकते हैं। 1857 की क्रांति समय से कुछ माह पहले शुरू हो गई थी। इस वजह से दो साल की तपस्या पानी में मिल गई और फिर 90 साल तक देश की आजादी के लिए लाखों लोगों को जान देनी पड़ी। इतिहास के पन्ने हमारे लिए रुके नहीं रह सकते हैं। उन पन्नाें के साथ जुड़ते-जुड़ते अपना भी एक नया इतिहास जोड़ना पड़ता है। इसलिए दुख सहकर, दिल में आग लगाकर, महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विशाल दृष्टिकोण रखकर हम सभी को अपने क्षेत्र में जाकर जुट जाना चाहिए।

यहां पर इस प्रकार के लोग आए हैं जिनका अपने-अपने क्षेत्र में बहुत नाम है। आज हरिद्वार का शांतिवुंफज अपने ढंग से देश में बहुत बड़ी सेवा कर रहा है। विवेकानंद इंस्टीटयूट फार लीडरशीप डेवलपमेंट ने कर्नाटक के उत्तारी भाग में वनवासियों के साथ जुड़कर प्रगति और विकास का एक नया अधयाय लिखा है। आज पूरे देश में उसका नाम है। ऐसे कम से कम अस्सी-नब्बे  अनुभवी लोग यहां पर बैठे हैं। उनसे हम काफी कुछ सीख सकते हैं।

जब तक मनुष्य की सोच नहीं बदलेगी तब तक कुछ नया नहीं हो पाएगा। यूरोप के एक विद्वान ने कहा है कि यदि आप 21वीं सदी में कुछ नया करना चाहते हैं तो आपको पहले अपनी सोच बदलनी होगी। दुर्भाग्य से हमारे देश के अन्दर सभी वर्गों की सोच विकृत हो गई है। किसान की सोच का रास्ता बिगड़ गया है। उद्योगपतियों की सोच का रास्ता, पढ़ने वाले छात्रेंकी सोच का रास्ता बिगड़ गया है। आजकल देश मे राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए होनहार विद्यार्थी आगे नहीं आते हैं। जहां इन विषयों की पढ़ाई होती है, लोग उसे बेकार विद्यार्थियों का कालेज मान लेते हैं। ऐसा ही रहा तो देश में बेसिक साइंस के जानकार नहीं रह जाएंगे और देश में कंगाली छा जाएगी। क्यों? सभी लोग साफ्रटवेयर इंजीनीयिर बनने में लगे हैं। इसका बहुत भयानक परिणाम होगा। इस विकृति से निपटने के लिए समाज के सभी क्षेत्रेंमें हमें एक नई सोच के साथ काम करना होगा। विद्यार्थी की सोच को हमें एक नई उंचाई देनी होगी। छात्रेंको यह सोचना चाहिए कि क्या मैं सुभाष चंद्र बोस के रिकार्ड को तोड़ सकता हूं? क्या मैं विवेकानंद का रिकार्ड तोड़ सकता हूं?

 भारतीय कृषि पध्दति में हमारी आस्था का केंद्र खेती, पानी और जंगल है। सारे विश्व की सम्पत्तिा भूमि में छुपी हुई है। लेकिन आज उसका मालिक दयनीय ढंग से जी रहा है। किसानों की सोच में परिवर्तन लाना पड़ेगा। यहां आए हुए प्रतिनिधियों को भी अपनी सोच का रास्ता बदलना होगा। मुझे गोविंदजी से कोई मोह नहीं है। मैं किसी से प्यार करता हूं तो उसके गुणाें के कारण। आप लोग भी गोविंद जी से उनके गुणों के कारण्ा ही जुड़े हैं। ऐसा मैं समझता हूं। भारत विकास संगम के इस मौके पर हमें यह तय करना होगा कि उनके गुणों से, उनके विचारों से प्रेरणा लेकर क्या हम देश के लिए कुछ नया कर सकते हैं या हम केवल उनका गुणगान कर अपनी जिंदगी गुजारना चाहते हैं। गोविंदजी के चरण छूने से, उनके साथ घंटा-दो घंटा बिताने से काम नहीं चलेगा। गोविंदाचार्य जी के विचारों को लेकर हमें देश के लाखों-करोड़ों लोगों के पास जाना होगा।

हमें यह धयान में रखना होगा कि कोई भी संगठन 500 साल से अधिक जीवित नहीं बचा है। जिस तरह एक व्यक्ति की आयु होती है उसी तरह संगठन की भी आयु होती है। जो लोग अपने संगठन को निजी स्वार्थ की बीमारी से बचा ले जाते हैं उनका संगठन लंबा चलता है। इसलिए हमें भी अपने संगठन को नए ढंग से लीप-पोत कर ठीक रखना होगा। निहित स्वार्थों से इसे बचाना होगा। इसलिए सभी संगठनों से आए लोगों से मेरी विनती है कि वे तीन दिन तक आपस में भरपूर संवाद करें। हमारा सपना है कि आने वाले तीन साल के अन्दर हजार से अधिक संगठनों को एक साथ लाया जाए। इस संगठित सज्जन शक्ति से देश में आशा और विश्वास का एक नया सूरज उगेगा।

हमने कोत्तल बसवेश्वर शिक्षण समिति के नाम से कर्नाटक के चार जिलों में शिक्षा के साथ-साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लोगों के बीच स्वाभिमान लाने की कोशिश की है। हमें अपने इस प्रयास में समाज के सभी वर्गों का भरपूर सहयोग मिला है। शीघ्र ही हम अपने प्रयासों को और विस्तार देने वाले हैं। 

 (प्रस्तुति : गुंजन कुमार)

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन