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 फरवरी,  2008

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भारत विकास संगम 2008

गाय को आर्थिक आजादी का प्रतीक बनाया जाए

सूर्यकांत जालान (सुरभि शोध संस्थान)

हमारे प्रयासों में गाय की केन्द्रीय भूमिका है। मेरा स्पष्ट मत है कि आज गाय को आर्थिक आजादी का प्रतीक बनाया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जिस तरह गांी ने चरखे को बनाया था।

भारत विकास संगम का आयोजन काशी से इतना दूर रखना कई लोगों को असुविाजनक लगा होगा। लेकिन ऐसा करना जरूरी था। हमें शहर की सुविाओं के बिना भी रहने की आदत होनी चाहिए। यहां मैं भास्कर राव जी के साथ अपनी एक मुलाकात का उल्लेख करना चाहता हूं। वे उस समय अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अधयक्ष थे। उन्होंने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात कही कि हम वनवासियों के कल्याण की बात तो करते हैं लेकिन उनके बीच रहना नहीं चाहते हैं। इसलिए अगर गांव का भला करना है तो हमें गांव में रहने की आदत डालनी चाहिए। आज शहर आरित जिस जीवन शैली को हम जी रहे हैं, उससे हमारा पर्यावरण तेजी से प्रदूषित हो रहा है। गंगा की हालत दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। हमारे पूर्वजों ने हमें स्वच्छ गंगा दी थी, लेकिन हम कैसी गंगा अपनी संतानों के लिए छोड़ रहे हैं, इस पर विचार किए जाने की जरूरत है। गंगा की रक्षा के साथ-साथ जल की समस्या के समाधान की दिशा में भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है। आज गांवों में बेरोजगारी और तमाम अन्य समस्याओं का समाधान यह है कि कृषि, पशुपालन और ग्रामोद्योग में समन्वय स्थापित किया जाए। इस सबके बीच गाय की एक केन्द्रीय भूमिका होगी। सुरभि शोध संस्थान में हमने इस बात को व्यावहारिक रूप से पररखने की कोशिश की है। भारत विकास संगम में जिन बातों पर जोर दिया गया, उनमें से कई बातों को आप व्यावहारिक रूप में यहां होते देख सकते हैं। मेरा स्पष्ट मत है कि आज गाय को आर्थिक आजादी का प्रतीक बनाया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जिस तरह महात्मा गांधी ने चरखे को बनाया था। 

(प्रस्तुति: भारतीय पक्ष ब्यूरो)

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन