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भारत विकास संगम
2008 |
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धर्म
की नींव पर ही समग्र विकास संभव है |
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वैभव सुरंगे
(शिवगंगा
अभियान) |
शिव गंगा अभियान झाबुआ में गांव के
स्तर पर जलसंग्रहण और समग्र विकास का अभिनव प्रयोग
है। इसके अंतर्गत गांवों में शिवमंदिर स्थापित करके
उसके आसपास शिव की जटाएं अर्थात जलसंरक्षण के विविध
उपाय किए जाते हैं। इस प्रकार आर्थिक विकास के
साथ-साथ सामाजिक-धार्मिक
संस्कार देने का यह प्रयोग अत्यंत सफल रहा है।
मैं झाबुआ जिले का रहने वाला हूं। यह
मध्यप्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी
छोर पर है,
गुजरात,
राजस्थान की सीमा पर,
जहां लगभग
88
प्रतिशत जनसंख्या वनवासियों की है,
जिनको हम आदिवासी कहते हैं। झाबुआ में कई जनजातियों
की मौजूदगी है।
जनजाति शब्द सुनते ही हमारे मन में दो-तीन
प्रकार के विचार आते हैं। ऐसा लगता है कि जनजाति
माने अशिक्षित,
बहुत असभ्य और बहुत दरिद्र। इसलिए इनकी सेवा करनी
चाहिए। इसलिए कपड़े बांटने चाहिए। दवाइयां बांटनी
चाहिए। जनजाति शब्द सुनते ही दूसरा विचार यह आता है
कि उनकी परंपराएं हैं,
उनकी संस्कृति है। उनका रहने का अपना
एक तरीका है। उनके अपने जीवन मूल्य हैं। उनका
संरक्षण होना चाहिए।
शिव गंगा अभियान ने अपने सामने जो
लक्ष्य रखा है वह इन दोनों
बातों से अलग है। हम उन्हें समर्थ बनाना चाहते हैं।
यदि हम उनको दरिद्र,
अशिक्षित मानते हुए उनकी सेवा
करने जाएंगे तो एक प्रकार से हम उन्हें भिखारी बनाते
हैं। ऐसे में उनके अंदर स्वाभिमान नहीं जग सकता और
बगैर इसके कोई भी समाज कभी भी अपने पैरों पर खड़ा
नहीं हो सकता, तरक्की
नहीं कर सकता। वह समाज हमेशा दूसरों को ही देखता
रहेगा। इसलिए उनके स्वाभिमान को सुरक्षित रखते हुए
ही विकास किया जाए। इसी कल्पना के साथ शिव गंगा
अभियान आगे बढ़ रहा है। ह है तो धर्म आधारित विकास
करना पड़ेगा। धर्म को साथ लेना पड़ेगा। शिव गंगा
अभियान समग्र गांव के विकास के लिए चल रहामारे सामने
सवाल था कि वनवासियों का स्वाभिमान सुरक्षित कैसे
रहेगा। हमने महसूस किया कि स्वाभिमान को अगर
सुरक्षित रखना है। झाबुआ जिले में कुल 1320
गांव हैं। 1320
गांवों में से 1230
गांव हमारी कार्ययोजना में शामिल
किए गए हैं। पहली बार हमने केवल 131
गांवों में काम
किया था।
शिव गंगा अभियान झाबुआ में गांव के
स्तर पर जलसंग्रहण और समग्र विकास का अभिनव प्रयोग
है। यहां के
50
प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनको वर्ष में छह महीने मजदूरी
करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। एक परिवार जब मजदूरी
करने के लिए बाहर जाता है तो उनके बच्चों की
शिक्षा-दीक्षा नहीं हो पाती। उनके स्वास्थ्य की दशा
अत्यंत दयनीय रहती है। किसी परेशानी में पंफसने पर
उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होता है। अधिाकतर लोग
ऐसे हैं जो अपनी जमीन होने के बाद भी मजदूरी करने
जाते हैं। पांच-सात बीघा जमीन लगभग प्रत्येक परिवार
के पास है। एक फसल तो पानी के भरोसे हो जाती है
परंतु दूसरी फसल हो नहीं पाती। जुलाई से लेकर
सितम्बर-अक्टूबर तक पहली फसल होती है और नवंबर से
मजदूरी का सिलसिला शुरू होता है जो अप्रैल तक चलता
रहता है। सात-आठ माह तक लोग बाहर रहते हैं। बाहर
रहने के कारण उनका सामाजिक जीवन और व्यक्तिगत जीवन
दोनों बुरी तरह प्रभावित होता है। इससे उनकी आने
वाली पीढ़ियों का भविष्य भी संकटमय हो जाता है। हम
इसे रोकना चाहते थे। हम चाहते थे कि झाबुआ के लोग
अपने गांवों में ही रहकर अपनी रोजी-रोटी कमाएं।
हमने महसूस किया कि झाबुआ के गांवों
में सबसे पहली आवश्यकता है पानी की। पानी के आधार पर
ही पशुपालन एवं कृषि हो सकती है। पानी के आधार
पर ही बाकी चीजों का विकास हो सकता है। इसलिए हमने
तय किया कि हम गांव के लोगों में इस प्रकार की
प्रेरणा जगाएंगे कि गांव का विकास वे स्वयं करें।
इसके लिए हमने प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये,
जिसको हमने वनांचल सशक्तिकरण
प्रकल्प कहा। इस वनांचल सशक्तिकरण प्रकल्प में गांव
के उन युवाओं
को चयनित किया गया जो गांव में रहना चाहते हैं और
फिर उन्हें प्रशिक्षण दिया। हमने उनको राजा भगीरथ की
कहानी सुनाई। उन्हें बताया कि राजा भगीरथ गंगा को
धरती पर उतार लाए थे। गंगा का वेग अधिक होने के कारण
धरती पर प्रलय की संभावना हो गयी थी। इससे बचाने के
लिए शिव जी ने अपनी जटाएं खोल दी। इन जटाओं में आकर
गंगा का वेग कम हो गया और वह विनाश की बजाए विकास का
माध्यम बन गईं। इस कहानी को हमने उनके परिवेश से
जोड़ा और कहा कि हमारे जिले में 35-40
दिन वर्षा होती है,
लेकिन ये सारा पानी हमारे यहां
से बहकर चला जाता है। अगर इस पानी को रोकना है तो
हमें शिव की जटाएं निर्मित करनी होंगी। हमने उन्हें
समझाया कि शिव जटाएं शिवजी की आराधना के साथ
जलसंरक्षण के उपाय को ही कहते हैं। वे हमारी बात से
सहमत हो गए और फिर सभी चयनित गांवों में शिव जटायें
बनाने का काम शुरू हो गया। इसके तहत हमने प्रत्येक
गांव में पहले एक शिव मंदिर की स्थापना की। पहले साल
हमने 131 शिवलिंग दिए। ये
131 शिवलिंग प्रत्येक
गांव के शिवमंदिर में स्थापित किये गए। हमने उन्हें
शिव आराधना
करने की विधि सिखायी। गांव के लोगों को इकट्ठा किया
और उसके बाद शिवजी की जटा बनाने का काम शुरू किया।
शिवजी की जटा के रूप में हमने गांव वालों के साथ
मिलकर बोरी बांध बनाये,
पहाड़ी पर टेंरच खोदी,
तालाब खोदे,
चेक डैम बनाए,
कुओं को रिचार्ज
किया और खेतों
की मेड़ बनाने जैसे काम किए। हमने उन्हें समझाया कि
यही शिव जी की जटायें हैं।
यहां मैं बताना चाहता हूं कि केवल
प्रेरणा देने से काम नहीं होने वाला था। इसलिए
टेक्नीकल प्रशिक्षण देने की भी व्यवस्था की गई। गांव
से ही आठवीं-दसवीं पास लड़कों का चयन करके उन्हें
इंदौर में प्रशिक्षण दिलवाया गया।
7वीं-8वीं
पास लड़के हमारे पास आते हैं तो उनको अपने गांव का
नक्शा बनाने को कहा जाता है। हम उनसे कहते हैं कि
ध्यान रखना की कहां से सड़क जा रही है,
कहां पर कुंआ है,
कौन सा मुख्य रास्ता है,
फलिया कहां पर है,
कहां पहाड़ है और कैसे गांव मे
जाएंगे, ये सब मानचित्र
में आना चाहिए। फिर अगली बार कहते हैं कि चित्र में
बरसात के बाद पानी के बहाव को उकेरो। 131
गांवों मे
हमने दो वर्ष पहले काम शुरू किया था।
अब तक यहां
26 तालाबों का निर्माण व
31 तालाबों की मरम्मत करवायी जा
चुकी है। पिछले वर्ष हमने 1100
शिवलिंग और स्थापित किये हैं।
अभी वनांचल सशक्तिकरण योजना के तहत झाबुआ जिले के
1231
गांवों में प्रशिक्षण देने का काम
जारी है। शिवरात्रि के दिन हम प्रत्येक गांव के शिव
मंदिर में शिव संकल्प का कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
इसमें गांव के सारे लोग इकट्ठे होते हैं।
गांवाें में शिव जटा निर्माण का काम
गांव के लोग ही करते हैं। झाबुआ के लोगों के बारे
में एक
धारणा
यह है कि वे आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
पर आंकड़े बताते हैं कि पिछले
10
वर्षों के
धार्मिक
जागरण के कारण झाबुआ जिले में अपराध कम हुए हैं।
10
साल पहले झाबुआ जिले में हम जिस
घर में जाते थे वहां शाम के 6
बजते ही लोग कहते थे कि रात में
अब मत जाओ क्योंकि मोटर साईकिल छीनी जा सकती है। पर
अब स्थिति ऐसी नहीं रह गयी। जब 10
साल पहले हमने काम करना शुरु
किया था तो उस समय वहां लूटपाट की घटनाएं अक्सर
सुनायी देती थीं। व्यापारी वहां से जा रहे थे।
कर्मचारी अपना ट्रांसफर कराने का प्रयास कर रहे थे।
इस प्रकार की स्थिति थी। पर जैसे-जैसे काम बढ़ा,
गणेश उत्सव शुरू हुए कांवड़
यात्रा शुरू हुई, फर्क
पड़ने लगा। कांवड़ यात्रा शुरू हुई तो बीच में दो दिन
का प्रवास रहता था। इस प्रवास में करना क्या है तो
हमने एक प्रयोग शुरू किया। वो यह कि कांवड़ यात्रा उन
जगहों से निकलेगी जहां कर्मचारी और व्यापारी रहते
हैं। उन जगहों पर ये लोग वनवासी यात्रियों का स्वागत
करेंगे। इसके जरिए लोगों में मेलजोल बढ़ा। इससे
वनवासियों को यह एहसास हुआ कि ये तो हमको घर में
बिठाकर भोजन कराते हैं,
तिलक लगाते हैं और हमें कोई भेंट भी देते हैं। इसका
मतलब है ये हमारे ही भाई हैं तब इनको हम क्यों लूटते
हैं? इस वजह से परिवर्तन
आया। अभी जब आप झाबुआ के किसी गांव में जाएंगे तो
लोग मिलने पर राम-राम कहेंगे। पर राम के बारे में
उसको कुछ नहीं पता। यह पता चलना चाहिए। इसलिए बड़े
प्रोजेक्टर पर गांव-गांव जाकर हमने रामायण दिखाना
शुरू किया। जब रामायण दिखायी तो वे बोले अच्छा
हनुमान जी इतने ताकतवर हैं। लेकिन ईसाई मिशनरी तो
प्रचार कर रहे थे कि हनुमान जी मामूली बंदर थे।
रामायण के कारण लोगों की श्रध्दा बढ़ी और
धर्मांतरण
पर अंकुश लग सका और समरसता भी बढ़ी।
वहां के लोग जब अपना खेत पहली बार
जोतते हैं तो
'जय
बाबा गणेश की' बोलते हैं।
गणेश जी की स्थापना करते हैं। पर गणेश जी कौन से
होते हैं, कैसे होते हैं,
ये उन्हें नहीं पता। जब
1996 मे पहली बार हम लोग उनकी
मूर्ति को लेकर गये तो लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।
बोले ये तो हाथी जैसे दिखते हैं। इनके सूंड़ है,
बड़े-बड़े कान हैं। वहां के लोगों
ने पहली बार गणेश जी की मूर्ति देखी थी। अब ये
स्थिति है कि प्रत्येक गांव में गणेश उत्सव होता है।
शिव गंगा के माध्यम से 1300-1400
जगहों पर गणेश जी
की पूजा की व्यवस्था की जाती है। विभिन्न वर्गों के
बीच जो खाई बनी थी वह मिटने लगी है। लोगों का
आजीविका कमाने के लिए बाहर जाना कम हुआ है। हमारी
योजना है कि आने वाले दिनों में झाबुआ के सभी गांवों
को भी शिव गंगा अभियान में शामिल कर लें।
प्रस्तुति : नवलेश
कुमार)
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