|
भारत विकास संगम
2008 |
|
दवाई खाने की नौबत
ही क्यों आए |
|
उत्तम माहेश्वरी
(आयुर्वेद
विशेषज्ञ) |
आयुर्वेद केवल बीमार को सही करने की
व्यवस्था भर नहीं है। यह एक जीवनशैली का नाम है।
हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में आयुर्वेद के
सिध्दांत समाए हुए हैं। हजारों सालों में इन्हें बड़े
व्यवस्थित तरीके से हमारी परंपरा और जीवन का हिस्सा
बनाया गया है।
आजकल दुनिया में ऐलोपैथी का बहुत जोर
है। आदमी का स्वास्थ्य ठीक रखने की अन्य जितनी भी
विधाएं हैं,
वे
सभी
इससे प्रभावित हो गयी हैं। इसका इतना जबरदस्त प्रभाव
है कि आज का आयुर्वेद भी आयुर्वेद न रहकर हर्बल
थेरेपी का एक तरीका हो गया है। दरअसल,
आयुर्वेद केवल
बीमार को सही करने की व्यवस्था भर नहीं है। यह एक
जीवनशैली का नाम है। हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में
आयुर्वेद के सिध्दांत समाए हुए हैं। हजारों सालों
में इन्हें बड़े व्यवस्थित तरीके से हमारी परंपरा और
जीवन का हिस्सा बनाया गया है। उदाहरण के लिए हमारे
यहां सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की परंपरा है।
आलोचना करने वाले कहते हैं कि देश में एक बड़ी आबादी
को दो वक्त का भोजन नहीं मिल पा रहा है और ये लोग
हजारों लीटर दूध शिव जी पर चढ़ा रहे हैं। आपको भी
लगता होगा कि हां यह तो गलत ही है। इसका कारण यह है
कि हमारे पास एलोपैथिक ज्ञान है। हम आयुर्वेद की
बातें भूल चुके हैं।
आयुर्वेद कहता है कि सावन में दूध
नहीं पीना चाहिए क्योंकि सावन में कच्ची घास होती
है। उस घास में बहुत सारे कीड़े-मकोड़े होते हैं। जब
गाय-भैंस वह घास खाती है तो उसके दूध में बहुत से
रोगों के जीवाणु भी पहुंच जाते हैं। हमारे
ऋषियों
ने यह बात जनता को अपने तरीके से समझायी। उन्होंने
नियम बना दिया कि सावन में शिवजी पर दूध चढ़ाया जाए।
जैसे ही शिवजी पर दूध चढ़ाना शुरू होता है लोग समझ
लेते हैं कि अब दूध नहीं पीना चाहिए। अब जो आयुर्वेद
नहीं जानेगा,
वही शिवजी
पर दूध चढ़ाने की आलोचना करेगा।
एलोपैथी तो बीमार होने के बाद भी कई
बार डायग्नोसिस नहीं कर पाती है। लेकिन आयुर्वेद तो
आने वाली बीमारियों के बारे में भी बता देता है।
इसका बहुत सरल तरीका है। इसके लिए लैब में जाने की
जरूरत नहीं है। हम लोग पंचमहाभूत के बारे में बात
करते हैं। यह पंचमहाभूत क्या है?
आकाश,
वायु, अग्नि,
जल और पृथ्वी। इसका दैनिक जीवन
में बड़ा उपयोग है। वात के अन्दर वायु तत्व की
मुख्यता होती है। अब हमारे शरीर में वात रोग कैसे
फैल रहा है, यह मालूम
करना है तो वायु के गुण को देखिए। वायु के बहुत सारे
गुण हैं। इसमें से पांच गुण ले लीजिए। वायु में गति
है। हमारे शरीर में जितनी भी गति होती है वह वायु के
कारण होती है। आंख का झपकना,
दिल का धड़कना,
हाथ-पैर का हिलना-डुलना यह सब
वात के कारण होता है। इस गति में कहीं पर गड़बड़ी हुई
तो समझ लें की वात रोग बढ़ रहा है। वायु का दूसरा गुण
है सूखापन। होठ फटने लगें,
एड़ियां फटने लगें,
धमनियां कड़क हो जाएं सूखकर तो
डाक्टर कहता है आपका ब्लडप्रेशर बढ़ गया है।
ब्लडप्रेशर तो बाद में बढ़ता है जबकि धमनियां पहले
सूखती हैं और उसके बाद आंतों का सूखना शुरू होता है।
वायु का तीसरा गुण ठंडक का है। यदि आपके शरीर में
दर्द हो रहा है और उस समय आपने पानी पी लिया तो दर्द
और बढ़ जायेगा क्योंकि पानी ठंडा है। यदि उस समय आपने
गर्म पानी पी लिया तो आराम होगा। वायु का चौथा गुण
है घुसपैठ का। आप बोतल से पानी पीते हैं तो बोतल
खाली होती है। बोतल खाली नहीं होती बल्कि उसमें हवा
घुसती है। इस प्रकार हवा लगातार शरीर में घुसती रहती
है, यदि आपने उसे रोका
नहीं। कानों
से हवा बहुत जल्दी घुसती है। हम रात में सोते रहते
हैं और बहुत तेज पंखा चलता रहता है। उससे हवा आपके
कान से होकर अन्दर घुसती रहती है। यह भी रोग का कारण
है। आप खुद भी महसूस करते होंगे कि जब आप पंखे के
नीचे नहीं सोते हैं तो सुबह एकदम प्रेफश महसूस करते
होंगे। लेकिन जब पंखे के नीचे सोते हैं तो सुबह शरीर
अकड़ जाता है। वायु का पांचवा गुण है परिवर्तन। इसलिए
जब कोई मुम्बई से आता है तो कहते हैं इसे मुम्बई की
हवा लग गई है। कोई नहीं कहता है चौपाटी की मिट्टी लग
गई है या पानी लग गया है। परिवर्तन के तुरंत बाद
शरीर में वायु बढ़ जाती है। इसलिए यदि वात के इन पांच
गुणों को हम लोग ध्यान में रखें तो हमें अपने शरीर
में वात के बारे में पता रहेगा। अगर हमको लगता है
कि शरीर में वात बढ़ रहा है तो उस पर पहले से ध्यान
देना होगा, नहीं तो धीरे-धीरे
वह बढ़ेगा और गठिया का रोग या लकवा हो जायेगा।
यह हमने शोध में देखा है कि पंखा
धीरे
करने से डायबिटीज अपने आप कम होने लगती है। इंसुलिन
की जरूरत नहीं पड़ेगी। होठ फटते हैं तो हम लोग वैसलिन
वगैरह लगा लेते हैं। यह वास्तव में सूअर की चर्बी
होती है। सिर्पफ सूअर की चर्बी में ही यह गुण है कि
वह फटी चमड़ी को जोड़ दे। और किसी चर्बी में यह गुण
नहीं है। यदि आपके शरीर में सूखापन आया तो पूरे शरीर
में तेल की मालिश कीजिए। दो दिन आप तेल की मालिश
करेंगे तो आपके होठों का फटना बन्द हो जाएगा। ऐसे ही
कई लोग बोलते हैं कि गैस की समस्या है। इसका मतलब है
आपका भोजन आगे खिसक नहीं रहा है। उसमें गति नहीं हो
रही है। इसलिए वह पित्ता की नहीं सौ फीसदी वात की
बीमारी है। भोजन के बाद गर्म पानी पीने से यह समस्या
दूर हो जायेगी। इसमें एक बात का ध्यान रखना चाहिए।
जब भी गर्म पानी लें तो उसमें ठंडा पानी नहीं
मिलाएं। वह जहर का काम करता है। पानी ज्यादा गर्म हो
जाये तो थोड़ा इंतजार कर लीजिए या बड़े बर्तन में ढंक
दीजिए। जैसे वात का मैंने गुण-दोष बताया वैसे ही
पित्त और कफ के भी लक्षण होते हैं। पित्त में अग्नि
का गुण होता है। कफ में दलदल का गुण होता है। जो वात,
कफ और
पित्त की प्रकृति समझेगा और अपने व्यक्तित्व को समझ
लेगा वह अपने और अपने परिवार को रोग मुक्त कर लेगा।
हमें यह तय करना होगा कि स्वस्थ रहने के लिए दवाइयों
पर निर्भरता समाप्त करेंगे। यदि हमारी जीवन शैली ठीक
रही तो हमें दवाइयों की कम से कम जरूरत पड़ेगी।
(प्रस्तुति
: गुंजन कुमार) |