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भारत विकास संगम
2008 |
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बड़े
बांधों में नहीं छोटे-छोटे
चेकडैम में छिपा है उपाय |
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मनसुख भाई
(जलक्रांति
ट्रस्ट) |
गुजरात सरकार
1.5 लाख से लेकर 15
लाख रुपए में सिर्फ एक चेक डैम
बनाती थी। तब हमने कहा कि 15
चेकडैम का खर्चा सिर्फ एक लाख
आएगा। लोग मानने को तैयार नहीं थे कि इतने कम खर्च
में भी चेकडैम तैयार हो सकता है। मैंने कहा कि यह
मेरी जिम्मेदारी
है।
गुजरात में सबसे बड़ी समस्या पानी की
है। पानी की कमी से वहां खेती-बाड़ी बर्बाद हो रही
थी। हालत यह हो गई थी कि परिवार का एक आदमी पानी
जुटाने में लगा रहता था। सरकार के बजट का एक बड़ा
हिस्सा लोगों को पानी देने में खत्म हो जाता था। ऐसी
परिस्थिति
1984 से लेकर 1998
तक रही। गुजरात का पर्याय अकाल
बन गया। सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात की हालत बहुत
खराब हो गयी थी। तब मेरे दिमाग में एक सोच आयी। मुझे
लगा कि पानी के बारे में लोग,
सरकार,
बुध्दिजीवी और इंजीनियर क्या कर
रहे हैं? मेरे बचपन में
हर कुएं में पानी होता था। पहले लोगों को
100-200 फीट जमीन खोद कर पानी
मिल जाता था। लेकिन
धीरे-धीरे
पानी का स्तर गिरते-गिरते
1000 फीट तक चला गया। मैं सोचने
लगा कि क्या हम 2000 फीट
तक जाएंगे, फिर तो यह
धरती
नष्ट हो जाएगी। बिल्कुल पानी खत्म हो जाएगा। पानी के
इस अंधाधुंध
दोहन का पर्यावरण पर भी काफी बुरा
असर पड़ा। गांव के पास आने पर भी नहीं पता चलता था कि
यहां कोई गांव है। सभी वृक्ष सूख गए थे और पक्षी
लुप्तप्राय हो गए थे।
उस स्थिति से निपटने के लिए मुझे लगा
कि हरेक गांव में नदी-नाले के उफपर पक्के या कच्चे
बांध
बनवाने चाहिए। तब सरकार की इस बारे में कोई योजना
नहीं थी। गांव के किसान हर साल लाखों रुपया बोरिंग
और इलेक्ट्रिक मीटर में गंवा देते थे। मैंने महसूस
किया कि एक साल का रुपया अगर पक्के बांध
(चेक डैम)
बनाने में लगाया जाये तो यह समस्या
50
साल के लिए हल हो सकती है। यह
बात मैंने एक हजार की आबादी वाली बस्ती फाला में
रखी। मैंने कहा कि आपके गांव में 15
छोटे-छोटे बांध
बन
सकते हैं। गांव वालों के साथ सर्वे करने पर यह पता
चला था। उसका खर्चा एक लाख रुपया आ रहा था। जबकि
गुजरात सरकार
1.5
लाख से लेकर 15
लाख में सिर्फ एक चेक डैम बनाती
थी। तब हमने कहा कि 15
चेकडैम का खर्चा सिर्फ एक लाख आएगा। वो मानने को
तैयार नहीं थे कि इतने कम खर्च में भी चेकडैम तैयार
हो सकता है। मैंने कहा कि यह मेरी जिम्मेदारी है।
फिर मैंने कहा कि चलो एक बांध
के
खर्च की व्यवस्था मैं खुद करूंगा। मेरे चार-पांच
मित्र थे। मैंने सोचा कि यह हमारा
धर्म
माना जाए,
राष्ट्र सेवा मानी जाए या समाज
सेवा मानी जाए। हमने एक बांध
का
पैसा दिया। फिर लोगों को प्रेरणा मिली और गांववालों
ने बाकी बांधों
को बनवाने के लिए रुपया इकट्ठा कर लिया।
बाद में मैंने कहा कि चेकडैम बनाने
के लिए लोग श्रमदान करें
क्योंकि हमारे पास पैसे की कमी है। चूंकि पानी की
कमी के कारण सभी किसान बेकार बैठे हैं,
इसलिए पूरे गांव के लोग श्रमदान
में आएं। तब सरपंच जो मेरी उम्र का था,
हंसने लगा। उसने कहा कि कोई कभी
चेकडैम में श्रम करने नहीं आएगा। इस पर श्रमदान की
शुरूआत भी मैंने खुद ही की और देखते-देखते पूरा गांव
श्रमदान में लग गया। एक महीना से ज्यादा श्रमदान चला
और 15 नहीं 17
बांध
बना
दिये गये,
वह भी
सिर्फ एक लाख दस हजार रुपए में।
बाद में हमने संकल्प किया कि दो साल
हम देश के लिए दे देंगे। मैंने तय किया कि अपनी गाड़ी
लेकर मैं गांव-गांव जाकर काम कराऊंगा,
क्योंकि यह सौराष्ट्र की
आवश्यकता है या यों कहें पूरे गुजरात की आवश्यकता
है। हमने जो पहला माडल गांव बनाया,
वहां 151
बांध
सिर्फ 10
लाख रूपये में बनाए। गुजरात में
औसतन प्रति व्यक्ति 95
रूपये एक पक्का बांध
बनाने का खर्च था।
20
नवंबर 1999
को 'जलक्रांति
सम्मेलन' बुलाया गया।
इसमें पचास हजार लोग आए। तब तो संस्था भी नहीं थी।
अभी हमारी जलक्रांति ट्रस्ट नामक संस्था है। उस
सम्मेलन में गुजरात सरकार के प्रतिनिधिा भी आए।
हमारे प्रयोगों से प्रेरित होकर गुजरात सरकार ने
सरदार पटेल सौभाग्य जलसंचय योजना बनायी। लोग गुजरात
सरकार के इंजीनियरों से पूछने लगे कि आप लाखों
रुपयों में बांध
बनाते हैं,
जबकि मनसुख भाई गांव-गांव में
5000 से लेकर
50,000 तक में चेक डैम बनाते
हैं। इतना अंतर क्यों?
मैं उनकी निंदा नहीं कर रहा हूं पर दु:ख के साथ
बताना चाहता हूं कि उस वक्त गुजरात के इंजीनियर,
सचिव और सिंचाई मंत्री भी बोलते
थे कि वो चेकडैम तो एक बारिस में गिर जाएंगे। पर आज
तक हमारा एक भी बांध
गिरा नहीं है। मैं बारहवीं तक पढ़ा हूं और मैं
इंजीनियर नहीं हूं। इसके बावजूद तीन सौ गांवो में ना
किसी इंजीनियर की जरूरत पड़ी,
ना कलम की
जरूरत पड़ी और ना ही दूरबीन की जरूरत पड़ी। हमने अपने
पारंपरिक ज्ञान से ही सारा काम किया।
इन बांधों
की वजह से सालाना तीन करोड़ रुपये का कृषि उत्पादन
बढ़ा है। गुजरात बहुत आगे चलने वाला राज्य है,
लेकिन दु:ख की बात है कि हर गांव
का मजदूर सोचता है कि मेरा लड़का गांव में नहीं
रहेगा। जिसके पास 50
एकड़ जमीन है वह
भी सोचता है कि मेरा लड़का गांव में नहीं रहेगा। किसी
को गांव में रहना नहीं है। मैं सब जगह चिल्ला-चिल्ला
कर कहता हूं कि तीस साल के बाद इस देश के किसान जमीन
के मालिक नहीं रहेंगे। उद्योगपति देश की जमीन के
मालिक होंगे। हमारे यहां ऐसा हो रहा है। किसान जमीन
बेच रहा है और उद्योगपति जमीन खरीद रहे हैं।
उत्तार प्रदेश और मध्य प्रदेश के सभी
नदी-नाले खाली पड़े हैं। इन प्रदेशों की दु:ख-गरीबी
का यही कारण है। अगर दस साल सभी जगह पानी रोक लिया
जाए तो ये प्रदेश भी गुजरात जैसे खुशहाल हो जाएंगे।
यहां के एक किसान ने मेरे पास आकर बताया कि उसके पास
5 एकड़ जमीन है,
कोई अन्य व्यवसाय नहीं है। फिर
भी उसके पास 10 लाख रुपया
एफडी में है और पक्का मकान है। यह जानकर मुझे
विश्वास हो गया कि एक किसान भी सुखी जीवन जी सकता
है। लेकिन इसके लिए लोगों
को,
समाज सेवी संस्थानों को और सरकार को
सभी को आगे आना होगा।
हमारी नर्मदा योजना बीस साल से बन
रही है। लेकिन अब तक खेतों में पानी नहीं पहुंचा।
जबकि चेकडैम का परिणाम तुरंत मिलता है। डैम बना,
बारिश हुई और पानी खेतों में
रुकना शुरू हो गया। हमने तो बारिश के मौसम में ही
सैकड़ों
चेकडैम बनाए। जैसे ही डैम बना,
तीन-चार दिनों में बारिश हुई और
पानी उसमें भर गया। तीन दिन में आस-पास के कुओं में
पानी चला गया। चेकडैम के फायदे और भी हैं। जहां
चेकडैम बनाते हैं वहां नीचे जमीन में पानी तीन-तीन
और कहीं-कहीं चार-चार किमी तक फैल गया है। जहां छोटे
पथरीले नाले हैं, वहां
500 से 700
मी. की दूरी पर ऐसे पक्के बांध
बनाए जाने चाहिए। जब पानी की
उपलब्धाता बढ़ेगी तो खेतों में उत्पादन अपने आप
दोगुना हो जाएगा।
मैंने बचपन में देखा है कि जब-जब
अकाल पड़ता था,
लोग
गांवों में अपने गाय-बैल मुफ्रत में छोड़ दिया करते
थे। स्थिति सामान्य होने पर बाद में ढूंढने निकलते
थे। किसान जितना कमाता था वह सब इस चक्कर में चला
जाता था। जहां चेकडैम बने हैं वहां इसके बाद दो अकाल
आ चुके हैं लेकिन एक भी किसान को अपने गाय-बैल को
छोड़ना नहीं पड़ा। सिर्फ गौशाला बनाना गाय के उध्दार
का रास्ता नहीं है। खुद भगवान आकर आपके गांव में
रहें लेकिन यदि पीने का पानी नहीं होगा तो वहां गाय
बचने वाली नहीं है। इसलिए गाय को बचाना है तो गांव
को पहले जल की समस्या से मुक्त करना होगा। तभी वह बच
सकेगी। पर्यावरण को बचाना है तो गांव को पहले जल
समस्या से मुक्त करना चाहिए। तभी पर्यावरण बच सकेगा।
लोग बताते हैं कि रोजगार एक बड़ी
समस्या है। पर गुजरात में तो रोजगार की समस्या है ही
नहीं। आम गुजराती को तो रोजगार मिलता है ही,
साथ ही सौराष्ट्र और आस-पास के
क्षेत्रें
के लाखों आदिवासी परिवारों को भी हमारे यहां रोजगार
मिल रहा है। यह सब चेक डैम की वजह से है। पिछले
10
साल में एक लाख चेक डैम बने हैं।
चेकडैम का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं है। पहले ही
साल से परिणाम मिलता है। उन सभी राज्यों में जहां जल
संकट रहता है, उनके लिए
चेकडैम से बढ़िया कोई और उपाय नहीं हो सकता। हमारे
नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे बड़े बांधों
का मोह छोड़ चेकडैम पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
इसके लाभ ही लाभ हैं।
(प्रस्तुति
: ऋतेश पाठक) |