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 फरवरी,  2008

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भारत विकास संगम 2008

अब लोग हमारी बात को मजाक में नहीं लेते।

जटाशंकर सिंह (सुरभि शोध संस्थान)

हम लोगों ने जब यहां चुनार में डगमगफर में काम करना शुरू किया तो राह काफी कठिन थी। इस पहाड़ी गांव में सुरभि शो संस्थान शुरू से ही गौ-आारित समग्र विकास की ारणा लेकर काम कर रहा है। पहले बनारस की गौशाला में काम किया गया। उसमें अनेक तरह के प्रयोग हुए। उन प्रयोगों के आार पर यह बात आयी कि हम लोगों को मिर्जाफर जिले में कुछ काम करना चाहिए।

 

जब समाज में हम किसी कठिनाई का निराकरण करना चाहते हैं तो उसमें बहुत सारे लोग जुड़ते हैं। ऐसे लोगों के साथ आने से ही सामाजिक संस्थाएं बनती हैं। संस्था का औपचारिक रूप ग्रहण करना जरूरी नहीं है, लेकिन एक साथ कुछ लोगों का काम में लगना जरूरी होता है। सामाजिक कार्य के भी बहुत से रूप हैं। इसमें रचनात्मक कार्यों का एक अलग ही विधान है। इससे जुड़े कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत जीवन में भी कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। यह कोई सरल कार्य नहीं है।

हम लोगों ने जब यहां चुनार में डगमगफर में काम करना शुरू किया तो राह काफी कठिन थी। इस पहाड़ी गांव में सुरभि शो संस्थान शुरू से ही गौ-आधारित समग्र विकास की ारणा लेकर काम कर रहा है। पहले बनारस की गौशाला में काम किया गया। उसमें अनेक तरह के प्रयोग हुए। उन प्रयोगों के आार पर यह बात आयी कि हम लोगों को मिर्जाफर जिले में कुछ काम करना चाहिए। क्योंकि इस जिले में गो पालन में कमी आई है। एक छोटा जमीन का टुकड़ा पहले सुरभि ग्राम में लिया गया था और यह तय हुआ कि यहां गाय का काम होगा। उस टुकड़े में काम करने जब हम लोग आए तो एक उत्साह था। लेकिन पानी की गंभीर समस्या थी। चार-पांच सौ फीट तक की बोरिंग करायी गयी तब जाकर पानी मिला। इस क्षेत्र के बगल में गंगाजी बहती हैं। गंगा के उस पार प्रयाग से काशी के बीच में जाएंगे तो बताते हैं कि मिट्टी की औसत गहराई 6 कि.मी. है। लेकिन यहां चट्टान शुरू हो जाती है। 10-20 फुट या 30 फुट ही मिट्टी है। आप मध्य प्रदेश होते हुए महाराष्ट्र चले जाएंगे तो वहां भी मिट्टी की यही हालत है।

यहां की समस्याओं को देखते हुए हमें तीन-चार साल यह तय करने में चला गया कि काम को कैसे आगे बढ़ाएं। जल सर्वेक्षण कराया गया। जो भी-संभव हो सकता था, प्रयास किया गया और बाद में पता चला कि इस जगह जमीन लेने का निर्णय गलत था। कुछ चर्चाएं हो रही थीं तो हमने कहा कि जहां वर्षा होती है, वहां हम पानी का रोना क्यों रोते हैं? फिर हमारे संस्थान के वरिष्ठ सदस्य और बुजुर्ग लोगों ने मिलकर कहा कि एक बार और प्रयास होना चाहिए। हम लोग कुछ कार्यकर्ताओं की टीम को लेकर फिर लग गए। अनेक तरह के अनुभव आए। देश में भी हम लोगों ने भ्रमण किया। जहां रचनात्मक कार्य हो रहे हैं, वहां के भी कुछ अनुभव लिए। फिर उसके बाद इस कार्य को शुरू किया। सबसे पहले गंगातीरी गाय पर हम लोगों ने काम करने का विचार किया, जो इस क्षेत्र की है। यहां सौ-पचास के झुंड में लोग गाय चराते हैं। गंगातीरी गायों के बारे में पहले से भी हमें मालूम था। कभी यह गाय 15-20 लीटर तक दू देती थी। बाद में गिरावट आ गयी। ये गाएं बहुत उपेक्षित हो गयी हैं।

यहां गाय पालने से पहले पानी का इंतजाम करना था। जिस जगह पर हमने काम शुरू किया था उस जगह के बगल से एक नाला जाता था। पहाड़ पर पानी बरसता था और सब बाहर चला जाता था। उसको हम लोगों ने साफ किया और गहरा किया। छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर करीब एक किलोमीटर में पानी रोका। फिर हमारी ऊंची-नीची जमीन थी, कंकरीली-पथरीली, उसमें से पत्थर वगैरह निकाल कर खेत बनाना शुरू किया। पत्थर तो सड़क बनाने के काम आ गए। जहां मिट्टी थी वहां से खींचकर मिट्टी को पत्थर पर चढ़ाया गया। इस तरीके से कहीं एक-दो फुट मिट्टी का इंतजाम हो पाया तो कहीं 10-15 फुट मिट्टी का। जिस डगमगफर में आप हरियाली देख कर आए हैं, वहां कभी ऐसी हालत थी। फिर हमलोगों ने मेड़बंदी किया, क्योंकि हमें हर हाल में पानी को जमीन में रोकना था। हमने ये आंकड़ा इकठ्ठा किया कि इस जिले में कितनी वर्षा होती है। एक दिन में अधिकतम वर्षा कितनी है। तय हुआ कि एक दिन में जितनी वर्षा होती है, उतना पानी हमारी मेड़ों के भीतर रुकना चाहिए। उस हिसाब से खेतों की मेड़ तैयार की गई। इसके बाद पानी खेत से आगे निकले तो उसे भी रोकने की व्यवस्था की गई। कई जगह वाटर हारवेस्टिंग प्लांट लगाये गये। हमलोगों ने निर्णय लिया कि खेतों में कहीं भी रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं करेंगे। कोई कीटनाशक नहीं प्रयोग किया जाएगा। आखिर यह देखना है कि खेती सस्ती कैसे होती है। पहले तो गायें हमारे पास नहीं थीं, फिर थोड़ी सी हुईं। जब थोड़ी गायें हुईं तो खरपतवार, कूड़ा-करकट से हमलोगों ने खाद बनाना शुरू किया। हमने खादों पर भी एक अध्ययन किया कि अलग-अलग जगहों पर कितने प्रकार की व कैसी खाद बन रही है। उस हिसाब से हमने कुछ खाद तैयार की। फिर बाद में गोबर गैस संयंत्र से गोबर गैस भी बनने लगी। फिर गोमूत्र के रूप में एक अच्छी औषधि मिल गयी, जिससे जमीन को सुारने में बड़ी मदद मिली। इसी तरह बढ़ते हुए हम खाद आदि के मामले में आत्मनिर्भर हुए।

खाद पर जब कुछ काम हो गया तो गायों पर विशेष ध्यान दिया गया। गांवो से हमने कुछ और गायें खरीदीं, जो देखने में ठीक-ठाक थीं। एक सांड़ बनारस गौशाला से ले आए। यहां पर काम शुरू हुआ। इसमें ध्यान रखा कि गाय को हरा चारा नियमित मिल जाए, थोड़ा घूमने को मिल जाए और साफ पानी मिल जाए। इससे ीरे-ीरे दूसरी संतति जो आयी, वो पहले से ठीक थी। अब सुरभि ग्राम में जितनी गायें हैं, वे 10 लीटर से ऊपर दूध देती हैं। फैट प्रतिशत भी उनका 4 से 6 के बीच में है। इस तरीके से हमने गंगातीरी गाय पर सार्थक काम किया। लखनउफ के राष्ट्रीय पशु प्रदर्शनी में हमारी गायें गई थीं। वहां गौवंश के लिए 18 फरस्कार थे, जिसमें से 14 हमारे यहां की गायों को दिए गए। हमारी गायों ने उस ारणा को भी तोड़ दिया कि गंगातीरी गायें सिर्पफ गोबर देने वाली गायें हैं।

अब हमारे पास बड़ा सवाल यह था कि इन कामों की जानकारी लोगों तक कैसे पहुंचाई जाए? अभी तक प्रशिक्षण कक्षाओं में सब कुछ हो जाता था, लेकिन और कहीं प्रयोग नहीं होता था। हमने कहा कि हम जो कुछ करेंगे वही लोगों को दिखाएंगे। हमारी कक्षा जमीन ही रहेगी। जो प्रयोग हम लोग करते थे, उसे गांवों में ले जाते थे लोगों के पास कि ये देखिए हमने यह किया है। ये प्रयोग सफल हैं, आप लोग चाहें तो अपना सकते हैं। फराने समय से जो परंपरा चली आ रही थी, उसमें खेती, बागवानी और गोपालन तीनों चीजें किसानों के लिए जरूरी होती थीं। इसे आजकल जैव विविता का नाम भी दिया जाता है। इस पर हम लोगों ने ध्यान दिया।

हमने अपने खेतों में उपजायी जाने वाली फसलों में विविता का समावेश किया। इस कारण ीरे-ीरे हमारी मिट्टी में सुार हाने लगा। पहले हम लोगों ने जांच करायी तो मिट्टी बहुत कमजोर थी। उसमें पानी सोखने की क्षमता नहीं थी। आज हमारी मिट्टी में खूब केंचुए भी होते हैं और उसमें पानी सोखने की क्षमता भी बढ़ गयी है।

मैं मानता हूं कि अभी भी हमने बहुत कुछ नहीं किया है। लेकिन इतना जरूर हुआ है कि पहले जहां हमारी बात को लोग मजाक में ले लेते थे, उसे अब गंभीरता से लेने लगे हैं। इस क्षेत्र में नहर के पास का पहाड़ी हिस्सा सूखा पड़ा हुआ था, उसमें खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया गया। इसके लिए हमने किसानों को प्रशिक्षण दिया। इस जमीन में लोग अरहर डाल जाते थे। एक क्विटंल भी एक एकड़ में मिल जाए तो प्रसन्न होते थे। लेकिन बीएचयू के वैज्ञानिकों ने इसमें रुचि ली तो एक प्रोजेक्ट शुरू हुआ। किसानों को प्रशिक्षण के साथ-साथ अच्छा बीज भी उपलब्धा कराया गया। अब यहां सवा छह क्विंटल प्रति एकड़ अरहर की उपज होती है। इसके बाद वहां सेमिनार भी किए गए। बाहर से कंपनी वाले आए। उस समय अरहर की कीमत 15 रुपया प्रति किलो थी, लेकिन कंपनी वाले 25 रुपये किलो सभी अरहर खलिहानों से बीज के लिए ले गए। उन्होंने कहा कि शुध्द आर्गेनिक बीज नहीं मिलते। यह महाराष्ट्र और कर्नाटक के लिए बहुत आवश्यक है। इस कारण किसानों की सारी उपज हाथों-हाथ बिक गयी। इससे उनकी आमदनी बढ़ी।

इस प्रकार हमारा काम बढ़ता गया। हमने उसमें ग्रामोद्योग को भी जोड़ा। उसके बाद विद्यालय के माध्यम से कोशिश की गयी कि हर घर में पेड़ लग जाएं। फिर हमने देखा कि गांव में कुपोषण है। इसलिए कहा कि हर घर में एक छोटी स्वास्थ्य वाटिका होनी चाहिए। गांव में घर के आस-पास थोड़ी जमीन रहती है। कोई भी आदमी अपने नहाने-ोने के पानी से भी कुछ कर सकता है। अगर दो-चार पेड़ पपीता, एक पेड़ नीबू, एक पेड़ अमरूद घर के आस-पास लगा दिया जाए तो किसान को बराबर कुछ न कुछ फल खाने को मिलता रहेगा। विद्यालय परिसर में भी हमने ऐसी व्यवस्था की। थोड़ी सी जमीन के बावजूद इसमें पर्याप्त सब्जी उत्पादन होता है। कुछ वनवासी बच्चे छात्रावास में रहते हैं। वे एक घंटे उसमें श्रमदान करते हैं। अपने लिए प्रति छात्र प्रति दिन आा किलो सब्जी के साथ अतिरिक्त सब्जियां भी उगा लेता है। इस तरह से बच्चे यहां शुरू से सीखते हैं। पढ़ाई के साथ वे कृषि, गोपालन, सब्जी उत्पादन सभी सीखते हैं। इनका अभ्यास होने से इन बच्चों में शुरू से ही सामाजिक भावनाएं आ रही हैं।

यहां के छात्रावास में रहने वाले बच्चे विभिन्न आदिवासी क्षेत्रेंसे आये हैं। आज देश में मुख्यत: तीन समस्याएं जोर पकड़ रही हैं-उग्रवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद। कोई भी सरकार इससे निपट नहीं पा रही है। इन समस्याओं के समान की आशा नयी पीढ़ी से ही है। ये बच्चे बेरोजगारों की फौज में न घूमें, इसके लिए हमलोग इन्हें पढ़ाई के साथ कुछ करना भी सिखाते हैं जिससे वे अपनी आजीविका चला सकें। हमारे ये विद्यार्थी जब पढ़ाई पूरी करके ग्रामीण क्षेत्रें में जाएंगे तो उनसे गांवों का माहौल जरूर बदलेगा।

आज गांव सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। नव युवक वहां से भाग रहे हैं। अगर हम सुरक्षित भविष्य चाहते हैं तो उन्हें गांव में ही अवसर मिलने चाहिए। समाज का काम संस्थाएं अकेले नहीं कर सकतीं। जनसहयोग बहुत जरूरी है। बनारस में गोपालन करते हुए हमें यह अहसास हुआ कि गौशालाएं आखिर कितनी गाएं रखेंगी। जब तक लोग नहीं पालेंगे, गाय नहीं बचेंगी। हमारी उन बेरोजगार युवकों से बात हुई, जो गांव छोड़कर जा रहे थे। वे शहरों में हजार रुपए की नौकरी पाने के लिए भटक रहे थे।  हमारे कहने से उन लोगों ने गोपालन अपने गांव में शुरू किया। उनकी शिकायत थी कि गाय के दू की कीमत नहीं मिलती। हमने इसका भी उपाय ढूंढा। उस समय जब 5-6 रूपये प्रति किलो दूध की कीमत मिलनी कठिन थी तो हमने गोरस भंडार समिति बनाकर उनको 12 रुपया मूल्य दिया। आज उनको 15 रूपये लीटर तक गाय के दू की कीमत मिल रही है।

मैं आपके सामने गंगा पार के एक गोपालक का उदाहरण देना चाहता हूं। उनके पास पचास से अधिक गाएं हो गयी थीं। वे अच्छा काम कर रहे थे। पहले वे वकालत करते थे, लेकिन बाद में वकालत पेशा छोड़कर गांव आ गए। उनके पास मैं गया तो वहां गोबर काफी इकट्ठा था। तब डगमगफर में काम हमने शुरू ही किया था। हमें गोबर की आवश्यकता थी। हमने कहा कि आप हमें यह गोबर बेच दीजिए। उन्होंने कहा कि गोबर नहीं बेचेंगे क्योंकि यही हमारी बचत है। हमने कहा क्यों दू में बचत नहीं है? उन्होंने कहा- देखिए, दू तो अलग है। उसका पैसा आता है और खर्च हो जाता है। उसका हिसाब हमारे पास नहीं रहता। लेकिन यह गोबर हमारी वास्तविक बचत है। हमने कहा वो कैसे तो उन्होंने बताया कि गांव की पूरी जमीन घूम आइये। हमारा खेत बिना बताए आप पहचान जाएंगे। बनारस में सबसे पहले 40-45 रुपये किलो बिकने वाली मटर उन्हीं के खेत से आती है। इस तरह से गोबर खाद के कारण उनके खेत सुरे, खेती सुरी और गोपालन तो बढ़ा ही। हमें खासतौर से आनेवाली पीढ़ी पर ध्यान देना चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि कैसे हर व्यक्ति को, हर बच्चे को आा किलो दू, ा किलो हरी सब्जी और आा किलो फल प्राप्त हो। हमारी रती से हमें ये चीजें मिल सकती हैं। लेकिन हम लोगों की गलत मानसिकता हमें उर जाने नहीं दे रही है। रचनात्मक कार्य करने वालों के लिए यह एक चुनौती है कि कैसे गांव-गांव फिर से खुशहाल हों। इसके लिए हर गांव में गांव आारित संसानों के आार पर हम लोगों को चलना पड़ेगा। थोड़ा-बहुत जो बाहर से लेना पड़े, उसे लेने में कोई दिक्कत नहीं है।

सुरभि शो संस्थान में जैसा कि मैंने पहले कहा, गाय को हमने अपनी सभी गतिविधियों का केंद्र बनाया है। क्योंकि गाएं हर जगह हैं। हमें बस उनकी उपयोगिता सिध्द करनी है। हम इस समय गाय की तीन नस्लों पर काम कर रहे हैं। एक तो गंगातीरी हमारा मुख्य है। बड़े पैमाने पर 15-16 गोशालाओं के माध्यम से काम हो रहा है। दूसरा, हमलोग रामगबाग छात्रावास में साहीवाल गाय पर काम कर रहे हैं। एक ही भवन में नीचे गौशाला और उफपर छात्रावास बनाया गया है। उसमें साहीवाल की ब्रीडिंग की जा रही है। साहीवाल का बछड़ा वगैरह मिलना भी काफी कठिन है। मुश्किल से हमने चार-पांच सांड़ इकट्ठे किए हैं। उनकी सहायता से ब्रीडिंग की जाती है। ऐसे ही गोकुल गौशाला में लालसिंी गाय पर काम किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि हम अच्छी नस्ल और स्वस्थ गायों को ही महत्व देते हैं। हम लोगों ने एक और प्रयोग शुरू किया है जिसमें बेकार पशु और बेरोजगार लोगों को लिया तथा अनुपयोगी गोवंश को भी लिया। इनकी मदद से हमने जमीन को ठीक करने का प्रयास किया है।

मेरा मानना है कि रचनात्मक कार्यकर्ता की बड़ी कठिन डगर होती है। उसकी अपनी अनेक परेशानियां रहती हैं, लेकिन इसके बावजूद उसे समाज की परेशानी अपनी परेशानी से बड़ी दिखती है। इसलिए वह अपनी परेशानी भूल जाता है। रचनात्मक कार्यों का अपना एक आनंद भी है जिसे  कार्यकर्ता ही समझ पाता है। यही वह आनंद है जो उसे सदैव काम करने के लिए प्रेरित करता रहता है। 

(प्रस्तुति : ऋतेश पाठक)

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन