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भारत विकास संगम
2008 |
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विश्वग्राम
से ग्रामविश्व की ओर |
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संजय
तिवारी |
हमें यह समझना होगा कि अगर बाजार का भूमंडलीकरण एक
बड़ा खतरा है तो विरोध का भूमंडलीकरण उससे भी बड़ा
खतरा है। देश में विरोध को सेफ्रटी वाल्व की तरह
इस्तेमाल करने के लिए विदेशी फडिंग एजेंसियां सक्रिय
हैं। ऐसे में भारत विकास संगम का छोटा सा आयोजन बड़ी
राहत देता है। यह हमें विश्वास दिलाता है कि विरोध
की हमारी अपनी कूबत मरी नहीं है। हम अभी भी इतने
क्षमतावान हैं कि भूमंडलीकरण का देशी तरीके से विरोध
कर सकते हैं और अपने परिवार-समाज के बारे में मुक्त
होकर सोच भी सकते हैं।
हमारे सामने भूमंडलीकरण का संकट तो
है ही,
लेकिन विरोध का भी भूमंडलीकरण हो जाए तब क्या करना
चाहिए?
देश में विरोध को सेफ्रटी वाल्व की तरह इस्तेमाल
करने के लिए विदेशी फंडिंग एजेंसियां सक्रिय हैं।
ऐसे में भारत विकास संगम का छोटा सा आयोजन बड़ी राहत
देता है। यह हमें विश्वास दिलाता है कि विरोध की
हमारी अपनी कूबत मरी नहीं है। हम अभी भी इतने
क्षमतावान हैं कि भूमंडलीकरण का देशी तरीके से विरोध
कर सकते हैं और अपने परिवार-समाज के बारे में मुक्त
होकर सोच भी सकते हैं। हम न केवल नकारना जानते हैं
बल्कि हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या
चाहिए,
इसका सटीक फैसला भी कर सकते हैं।
हमें अपने विरोध के लिए किसी
डब्ल्यू. एस.एफ. जैसी पताका की जरूरत नहीं है। भारत
में पहले वर्ल्ड सोशल फोरम का आयोजन
2004 में मुंबई में हुआ था। उसके
बाद उसका लघु रूप दिल्ली आया। दोनों ही आयोजन भव्य
थे। अगर इन दो आयोजनों में से किसी एक में भी आप गए
हों तो आपको यही अनुभव हुआ होगा कि इनके विरोध का
निहितार्थ यह देश नहीं है। हमें यह समझना होगा कि
अगर बाजार का भूमंडलीकरण एक बड़ा खतरा है तो विरोध का
भूमंडलीकरण उससे भी बड़ा खतरा है। अगर विरोध का
भूमंडलीकरण हुआ तो स्वाभाविक है कि इसमें फंडिंग की
व्यवस्था भी विश्वस्तर पर होगी। जब विरोध के काम में
कई विदेशी फंडिंग एजेंसियां शामिल हो जाएं तो शक और
बढ़ जाता है कि यह विरोध आखिरकार किसको मदद करेगा?
क्या विरोध का यह आयोजन एक
सेफ्रटीवाल्व का काम कर रहा है ताकि लोग फुस्स से
अपनी नाराजगी जाहिर कर दें और उसके बाद कंपनियों का
दिग्विजयी घोड़ा फन: सरपट दौड़ने लगे?
जो लोग सोशल फोरम के साथ नजदीक से
जुड़े रहे हैं,
वे इस बात को महसूस करते हैं।
असल में इस तरह के आयोजन फौरी तौर पर आपको यह संतोष
तो देते हैं कि आप विरोध कर रहे हैं लेकिन ऐसे
दो-चार विरोधी उत्सवों में शामिल होने के बाद एक तरह
से आप कंपनियों को नैतिक मान्यता दे देते हैं। आप
उनके बताये रास्तों पर चलने लगते हैं और उसी विदेशी
पैसे पर निर्भर हो जाते हैं जिसके कारण समस्याओं का
जन्म हुआ है। इन विश्वस्तरीय विरोध उत्सवों में
शामिल होने के लिए आपको धन और संसाधन मुहैया कराये
जाते हैं, फिर आपको नारा
सिखाया जाता है और एक धोख के टट्टू की तरह आपका
इस्तेमाल कर लिया जाता है। बहुत बाद में आपको पता
चलता है कि इस पूरे आयोजन का खर्च किसी कासा,
स्विस एड या फोर्ड फाउण्डेशन
जैसी किसी संस्था ने उठाया था,
जिसका जन्म सज्जन
तरीकों से दुनिया पर शासन करने के लिए ही हुआ है।
ऐसे में भारत विकास संगम की पहल
ज्यादा मायने रखती है। इसमें विरोध के साथ-साथ
विकल्प की भी बात की गई। इसकी शुरूआत
2004 में बनारस में ही हुई जब
गोविन्दाचार्य अपने अधययन अवकाश से लौटने के बाद पहल
करने का कोई बिन्दु तलाश रहे थे। उसी दौरान यह बात
आयी कि क्यों न उन लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए
जो भूमंडलीकरण के खिलाफ अपने-अपने स्तर पर लड़ाई लड़
रहे हैं। इस तरह भारत विकास संगम के पहले आयोजन में
ही साफ हो गया कि विकल्प की बैठकों से विकल्प के
बारे में कुछ खास पता नहीं चलता। जरूरत तो विकल्प तक
जाकर उसे देखने और समझने की है। तीन साल बाद दूसरा
आयोजन भी बनारस के पास ही चुनार में हुआ,
एक ऐसी संस्था के प्रांगण में जो
पत्थर के पेट पर सोना उगाने में माहिर हो चली है।
सुरभि शोध संस्थान, जिसका
चुनार में खेती-बाड़ी का प्रयोग है,
वह किसी विदेशी संस्था की मदद से
नहीं खड़ा हुआ है। वहां अपने ही देश के लोग हैं जो
मदद कर रहे हैं और अपने ही देश के लोग हैं जो मदद पा
रहे हैं। जरूरत एक कड़ी की थी जो शरद कुमार साधक जैसे
गांधीवादी बन गये और खड़ा हो गया एक प्रकल्प जो कह
रहा है कि अपनी ही जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी
विदेशी की ओर क्यों ताकते हो?
क्या तुम इतने गैरत वाले नहीं कि
अपने बच्चे के लिए भरपेट भोजन और तनभर कपड़ा पैदा
नहीं कर सकते?
भूमंडलीकरण के विरोध की विश्वस्तरीय
राजनीति इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि वह हमें अपनी
जड़ों से काट देती है। हम स्वाभिमान से अपने लिए कुछ
पैदा करने की मानसिकता खो देते हैं। दान और दया के
सहारे कोई समाज लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। हर
आदमी अपने हिस्से का काम करे और अपनी जरूरतें खुद
पूरी करे,
तब न तो सरकार की बहुत जरूरत
होती है और न ही किसी दानदाता संस्था की। शायद ऐसे
ही लोगों के कारण देश आंतरिक रूप से ताकतवर बनता है।
लेकिन अब जो कुछ हो रहा है उसका तरीका यह है कि आम
आदमी पहले अपने संसाधन बड़ी कंपनियों के हवाले कर दे,
फिर उन कंपनियों के चंदे से जो
सामाजिक संस्थाएं काम करती हैं,
उनकी दया पर जीवन जीने लगे। ऐसे
माहौल में भारत विकास संगम का यह दूसरा आयोजन विरोध
का विशुध्द भारतीय नजरिया पेश करता है और साथ ही
विकल्प का एक खाका भी खींचता है।
निस्संदेह
भारत विकास का यह संगम विदेशी धन के भरोसे लगने वाले
एनजीओवादी मेले से मीलों आगे है। कम से कम हम अपनी
जमीन पर तो खड़े हैं। विरोध में भी विश्वग्राम का
सपना दिखाने वाले लोगों को इस ग्रामविश्व की अवधारणा
के बारे में एक बार जरूर सोचना चाहिए।
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