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 फरवरी,  2008

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भारत विकास संगम 2008

राजनीति को हम केवल नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ सकते

सुरेन्द्र श्रीवास्तव (लोकसत्ता मूवमेंट)

हम शक्ति के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं। राजनीतिक दलों को भी लोकतांत्रिक बनाए जाने की जरूरत है। यह तब ही हो सकता है जब इसके लिए कानून बनाया जाए। कई देशों में इस तरह के कानून हैं। जब चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जाता है तो दल के सामान्य सदस्यों की राय नहीं ली जाती है। कुछ लोग मिलकर यह फैसला कर लेते हैं। इस व्यवस्था को बदलने की दिशा में भी लोकसत्ता काम कर रही है।

देश में राजनीतिक और प्रशासनिक सुधार के लिए लोकसत्ता मूवमेंट पिछले 10 वर्षों से सक्रिय है। इसकी स्थापना डा. जयप्रकाश ने की। वे आंन्धा प्रदेश में 16 वर्षों तक आई.ए.एस. रहे। एन.टी. रामाराव की सरकार में वे मुख्यमंत्री के प्राइवेट सेक्रटरी रहे। इस रूप में वे आंन्धा प्रदेश में प्रशासनिक मामलों में सर्वेसर्वा थे। मुख्यमंत्री ने उन्हें खुली छूट दे रखी थी। लेकिन उन्हें धीरे-धीरे महसूस हुआ कि वे वर्तमान व्यवस्था में बहुत कुछ नहीं कर सकते। इस एहसास के साथ 38 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी आई.ए.एस. की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और लोकसत्ता मूवमेंट की शुरूआत की। 10 वर्षों तक उन्होंने और उनके साथियों ने चुपचाप काम किया। राजनीति और प्रशासन से जुड़े विभिन्न विषयों पर गहन शो किए गए।

आज लोक सत्ता मूवमेंट से कई संगठन जुड़े हैं। फाउंडेशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्मस नामक संस्था लोकतंत्र के संबं में जो कुछ विश्व में घटित हो रहा है, उस पर नजर रखती है। इसी तरह फाउंडेशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्मस इन इंडिया नामक संस्था अमेरिका में रजिस्टर्ड है। अमेरिका में रहने वाले जो भारतीय वर्तमान व्यवस्था में सुार और परिवर्तन की इच्छा रखते हैं, वे इससे जुड़े हैं। हमारी एक सहयोगी संस्था महिला सत्ता के नाम से काम कर रही है। आं्र प्रदेश में यह विशेष रूप से सक्रिय है। इसकी ओर से आं्र में चलाई जा रही शराब विरोी मुहिम लोगों का ध्यान खींच रही है। युवाओं को जोड़ने के लिए हमसे संबंधित कुछ युवाओं ने युवासत्ता के नाम से काम शुरू किया है। इसमें 35 साल से कम उम्र के युवाओं को शामिल किया जाता है।

देश का जो नेतृत्व है, वह लोकसत्ता अभियान से भलीभांति परिचित है। एक समय ऐसा आया था कि देश के शीर्ष के  50 नेता हमारी बातों से सहमत हो गए थे। लेकिन एक जगह हम अटक गए और काम होते-होते रह गया। इसके बाद अक्टूबर 2006 में  आन्धा प्रदेश में लोकसत्ताा पार्टी का गठन किया गया। लोकसत्ता एक पोलिटिकल पार्टी बन गई, लेकिन आंदोलन अभी भी चल रहा है। पोलिटिकल पार्टी शुरू करना इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि ऐसा लगने लगा कि मौजूदा नेतृत्व बदलाव लाने में सक्षम नहीं है? हमने समस्याओं के समाान के लिए बहुत साारण उपाय बताए थे। लेकिन देश का राजनीतिक नेतृत्व हमारी बात से सहमत नहीं हुआ। हमने मिक्स प्रोपोर्शनल रिप्रजेंटेशन का सुझाव दिया था। इसके मुताबिक 50 प्रतिशत सीट पर चुनाव मौजूदा व्यवस्था के तहत ही होगा, जबकि बाकी सीटों का आबंटन संबंधित पार्टी को मिले कुल वोटों के प्रतिशत के आार पर होगा। इस विषय में बहुत चर्चा हो सकती है। नाम से एक वेबसाइट है, इस पर आपको हमारे इस सुझाव पर काफी रिसर्च पेपर मिल जाएंगे।

हम शक्ति के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं। राजनीतिक दलों को भी लोकतांत्रिक बनाए जाने की जरूरत है। यह तब ही हो सकता है जब इसके लिए कानून बनाया जाए। कई देशों में इस तरह के कानून हैं। जब चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जाता है तो दल के सामान्य सदस्यों की राय नहीं ली जाती है। कुछ लोग मिलकर यह फैसला कर लेते हैं। इस व्यवस्था को बदलने की दिशा में भी लोकसत्ता काम कर रही है। इसके लिए जर्मनी में बहुत अच्छा कानून है। अगर ये सुार यहां लागू किए जाएंगे तो पूरी व्यवस्था में बदलाव आना तय है। आपको अपनी सारी कांस्टीटुएंसी को अपील करना पडेग़ा, क्योंकि आपको पसर्टेज ऑफ वोट चाहिए। राजनीतिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए तो लोकसत्ता काम कर ही रही है, हमारी एक टीम एग्रीकल्चर पालिसी के उफपर भी काम कर रही है। हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि देश की कृषि नीति कैसी हो जिससे देश के किसान की हालत सुर सके। इससे जुड़ी मार्केटिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी लोकसत्ता काम कर रही है।

भारत को आजाद हुए साठ साल हो गये हैं लेकिन आज भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जी रहा है। आज 33 प्रतिशत जिले भारतीय सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं। उन जिलों में नक्सलियों की या फिर किसी अन्य की समानान्तर सत्ता चल रही है। सरकारी स्कूल जाने वाले 52 प्रतिशत बच्चे अपनी मातृभाषा में एक वाक्य लिख नहीं सकते हैं। 3200 करोड़ रुपये केन्द्र और राज्य सरकारें प्रतिदिन खर्च करती हैं देश चलाने में, इसलिए हम यह भी नहीं कह सकते कि देश में पैसे की कमी है। देश में काम करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है? दरअसल, इस देश में सही व्यवस्था की कमी है। सरकार जो व्यवस्था चला रही है, वह असल में ठीक से नहीं चल रही है।

हमेशा एक समाज में 10 से 20 प्रतिशत अच्छे लोग होते हैं, जो किसी भी आपदा में अपना सिध्दांत नहीं छोड़ते हैं। 10 से 15 प्रतिशत ऐसे लोग होते हैं जो किसी भी हाल में अपनी बुरी आदतें नहीं छोड़ते। समस्या है बीच वालों की। अगर सामाजिक व्यवस्था अच्छे लोगों को प्रोत्साहित करती है तो बीच वाले लोग अच्छे इंसान की तरह व्यवहार करने लगते हैं। यदि व्यवस्था बुरे लोगों को सजा नहीं देती है तो ये बहुसंख्यक लोग बुरे लोगों की तरह ही व्यवहार करने लगते हैं। इसलिए मूल समस्या व्यवस्था की है।

कई संस्थाएं अच्छे इंसान बनाने का काम कर रही हैं। लेकिन ये अच्छे इंसान व्यवस्था की मदद नहीं मिलने के कारण फिर बुरे हो जाते हैं। मैंने नौकरी छोड़ने के बाद तीन साल में दो अध्ययन किया। पहला, अन्ना हजारे जी के गांव का, जहां वे 35 साल से काम कर रहे हैं। वह माडल गांव है, लेकिन देखने की बात यह है कि जब उन्होंने इतना अच्छा काम किया है तो फिर वह पैफला क्यों नहीं? इसका कारण ढूंढने की जरूरत है। दूसरा अध्ययन है डा. अशेले का। वे महाराष्ट्र के हेमानगर जिले के जामखेर में पिछले 30 साल से स्वास्थ्य पर काम कर रहे हैं। लेकिन उनका काम तीन से चार गांव तक ही पहुंचा है। क्यों? एक बात तो तय है कि हजार अन्ना हजारे नहीं पैदा किये जा सकते, लेकिन यदि व्यवस्था को ठीक किया जाए तो अन्ना हजारे के काम को तुरंत पैफलाया जा सकता है। 1947 में हमने अंग्रेजाें को सिर्फ हटाया लेकिन उनकी बनाई व्यवस्था में परिवर्तन नहीं किया गया।

हमने महाराष्ट्र के ग्राम पंचायत का अध्ययन किया है। उससे पता चला कि किसी संस्थान को चलाने के लिए फ, अधिकार और काम करने वालों की जरूरत होती है।

वर्तमान व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए लोकसत्ता की ओर से समय-समय पर सरकार को सुझाव दिए गए हैं। संप्रग सरकार द्वारा जब सूचना के अधिकार के विषय में एक 14 सदस्यीय राष्ट्रीय सलाहकार समिति का गठन किया गया तो उसमें लोकसत्ता को भी शामिल किया गया। हमने अन्य संगठनों के साथ मिलकर सूचना के अधिकार का एक प्रभावी कानून बनवाया। सूचना का अधिकार कानून बनने के बाद इसी तरह हमने लोकल कोर्ट बिल आने के लिए प्रयास किया है। इस कानून के पास हो जाने के बाद हर पचास हजार लोगों के बीच में गांव में एक मोबाइल कोर्ट होगा जो तत्काल न्याय देगा। शहरों में भी एक लाख लोगों के उफपर एक कोर्ट होगा।

हमने मंत्रियों की अनाप-शनाप संख्या को लेकर भी आवाज उठायी। आपने सुना होगा कि मेघालय में एक समय 43 एसेम्बली सदस्य थे। उसमें से 41 मंत्री थे। जो दो बच गए थे उसमें एक स्पीकर था और दूसरा डिप्टी स्पीकर। काफी जद्दोजहद के बाद एक डाउन साइजिंग मिनिस्ट्री बिल लाया गया जिसके परिणाम स्वरूप लेजिस्लेटिव काउन्सिल के 15 प्रतिशत सदस्य ही मंत्रीमंडल में रह सकते हैं। अब पब्लिक डिसक्लोजर कानून लाने की भी कोशिश हो रही है। इसके तहत सरकार को आवश्यक सूचनाएं बिना मांगे देनी होगी।

इस देश में राजनीतिक सुार की आवश्यकता है। हर समस्या जाकर सीधो पालिटिक्स के जिम्मे आ जाती है और उसके आगे कोई रास्ता दिखता नहीं है। काफी रिसर्च करने के बाद लोकसत्ता मूवमेंट में हमारे साथियों ने कुछ समाान निकाले हैं। सभी को पता है कि राजनीति का अपराीकरण बहुत बढ़ रहा है। आज भ्रष्टाचार शिफ्रट हो गया है। यह अब ऐसे क्षेत्रें में पहुंच गया है जहां पर वह बहुत ही खतरनाक दिखता है। क्यों होता है ऐसा, यह सोचने की जरूरत है। मित्रो, बात दरअसल डिमान्ड एण्ड सप्लाई है। जब तक भ्रष्टाचार की डिमान्ड रहेगी सप्लाई कहीं से न कहीं से आती रहेगी। लोकसत्ता मूवमेंट का ऐसा मानना है कि करप्सन बीमारी का लक्षण है, खुद अपने आप में बीमारी नहीं है। बीमारी कुछ और है। भारत में राजनीतिक फडिंग दो तरह की है। एक तो पार्टी चलाने के लिए चाहिए और दूसरा पैसा इसलिए चाहिए कि वोट खरीदा जा सके। हम अगर एक जनहितकारी व्यवस्था चाहते हैं तो दूसरे प्रकार की फंडिंग को रोकना होगा। एक प्रयोग के तहत हमने नागरिकों के सहयोग से मुंबई नगर पालिका की एक सीट पर चुनाव लड़ा और मात्र कुछ हजार रुपए खर्च करके हमने उस सीट पर जीत हासिल की।

ऐसा नहीं है कि वर्तमान व्यवस्था से आम आदमी ही पीड़ित है। सरकार में बैठे बड़े-बड़े अधिकारी भी कई बार इस व्यवस्था के सामने बेबस हो जाते हैं। जे.जे. सिंह मुंबई सेशन कोर्ट के जज थे। मुंबई में उन्होंने पांच लाख रुपए किसी को कर्ज दिया था। उस कर्ज को वे वापस लेना चाहते थे। उन्होंने सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के तहत उसे वापस लेना चाहा पर वे सफल नहीं हो पाए। अंत में हारकर  उन्होंने इसके लिए गुंडों की सेवाएं ली। इसी तरह अहमदाबाद में एक मजिस्टेट 50,000 रुपए लेकर राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के नाम पर एक वारंट जारी कर दिया। अगर उन्हें कुछ और पैसा मिलता तो जार्ज बुश के नाम पर भी वारंट जारी हो जाता। ये अपने यहां की व्यवस्था है।

मुंबई को पढ़े-लिखे लोगों का शहर माना जाता है। वहां पर एक अरुण गवली हैं। वे विायक बन गए। उन पर कई आपराधिक मामले हैं। इसके बावजूद वे चुनाव जीत गए। अब प्रश्न यह उठता है कि ये जो अपराी हैं, वे भला चुनाव कैसे जीत जाते हैं। पब्लिक उनको वोट क्यों देती है? राजनीतिक दल ऐसे लोगों को टिकट क्यों देते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर ढूढ़ने की जरूरत है। बात यह है कि राजनीति में जो अपराी हैं, वे स्थानीय स्तर पर राबिनहुड की तरह हीरो हैं। वे स्थानीय स्तर पर एक हद तक व्यवस्था कायम करते हैं, क्योंकि सरकारी व्यवस्था बिल्कुल काम नहीं करती है। आपने किसी को पैसे दिए हैं और उसे वापस लेना है तो कोई कोर्ट में जाने की सलाह नहीं देगा। कोई आपका अच्छा मित्र होगा, अगर आप उससे सलाह लेंगे कि भाई मैंने इसको 50,000 दिए हैं, मैं क्या करूं? कोर्ट में जाउंफ क्या? तो वो बोलेगा, भईया मत जाना। बीस-पच्चीस साल मालूम नहीं कब मिलें, न मिलें। इसलिए किसी गुंडे को पांच हजार रुपए दे दो और रिकवर करा लो। लोग समझते हैं कि उनका तो काम निकल रहा है, फिर न्यायिक व्यवस्था की सिरदर्दी कौन पाले। एक सवाल यह भी है कि ऐसे अपराी राजनीति में क्यों आ रहे हैं? इसका सीा सा कारण है कि राजनीति में आने के बाद उनके पीछे पड़ने वाली फलिस उनकी गुलाम हो जाती है। यह अपराधियों को राजनीति में आने के लिए प्रोत्साहित करता है। राजनीतिक दल उन्हें टिकट इसलिए देते हैं क्योंकि कोई दूसरा वहां से जीत नहीं सकता है। लोकसत्ता इन विषयों पर काम कर रही है। ऐसे अपराी जीत कर कानून बनाने का काम करते हैं लेकिन ये तो अपने ढंग से कानून तोड़ने के अभ्यस्त होते हैं तो ये कैसा कानून बनाएंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है? वे अपना स्वार्थ साने के लिए ही काम करते हैं। उन्हें यह अच्छी तरह पता होता होता है कि सत्ताारी पार्टी में रहने पर मंत्री बनना तय है। अगर विपक्ष में रहे तब भी इतनी ताकत तो होती ही है कि अपना काम करा सकें और चुनावी खर्चे से कई गुना अधिक कमा सकें।

देश की मौजूदा व्यवस्था ब्रिटेन से उार ली गई है, जिसमें चार-पांच प्रत्याशी खड़े हो जाते हैं। इसमें बीस से तीस फीसद वोट पाने वाले भी जीत जाते हैं? यानी ज्यादातर वोट बर्बाद हो जाता है। हमें ऐसी व्यवस्था कायम करनी होगी कि हर वोट का महत्व रहे। हमारे वोट तकरीबन हर बार सत्ता परिवर्तन कर देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कुछ बदलता नहीं है। मतदान प्रतिशत घटता जा रहा है। वैसे लोगों की बड़ी संख्या है जिन्हें लगता है कि वोट मैं सही आदमी को देता हूं, लेकिन मेरे लिए कुछ होता नहीं है। इसलिए जिस दिन मैं वोट देता हूं उस दिन जो मुझे कुछ दे सकता है उसको मैं वोट दे दूंगा। इस तरह वह शराब के लिए, पैसे के लिए वोट बेच देता है। नेता सोचता है कि मुझे सब लोगों पर आश्रित रहने की क्या जरूरत है। 50 प्रतिशत तो वोट ही नहीं देते। 5 प्रतिशत यादव हैं, 2 प्रतिशत मुस्लिम हैं, 3 प्रतिशत मेरी जाति वाले हैं। इसलिए किसी भी तरह अगर 35 प्रतिशत वोट मिल जाएं तो काम बन जाएगा।  नेताओं ने देश को बर्बाद करने की नहीं ठानी है बल्कि उन्होंने यह तय कर लिया है कि उन्हें किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है। आज जरूरत इस बात की है कि इस व्यवस्था को धवस्त किया जाए और जन आधारित व्यवस्था कायम हो सके। यह काम हम राजनीतिक पार्टियों के भरोसे नहीं छोड़ सकते।

(प्रस्तुति: नवलेश कुमार)

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन