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भारत विकास संगम
2008 |
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जनादेश के द्वारा हम अवज्ञा को अपना हथियार
बनाएंगे |
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रमेश शर्मा
(एकता
परिषद) |
इस देश में वन संरक्षण कानून से लेकर
केन्द्रीय वन संरक्षण कानून तक बने लेकिन आज भी
आदिवासियों को उनका मालिकाना हक नहीं मिल पाया है।
आश्चर्य की बात है कि इस देश के कानून उसे
अतिक्रमणकर्ता मानते हैं।
एकता परिषद एक संगठन है जो सदस्यता आधारित है।
ग्यारह राज्यों में हमारे लगभग दो लाख सदस्य हैं।
इसमें भूमिहीन सदस्य ही ज्यादातर हैं। हम लोग इन्हीं
के बीच काम करते हैं। चम्बल घाटी में जब बागियों ने
महात्मा गांधी आश्रम में सम्पर्क किया था तब से इसका
कार्य शुरू हुआ था। तभी से हमने भूमिहीनों के लिए
लड़ाई लड़ना शुरू किया।

आज वैश्वीकरण का सबसे बड़ा मकसद है
आपको फ्रलोटिंग पाफलेशन में तब्दील कर देना ताकि
आपको बाजार की जरूरत के मुताबिक इधर से उधर खदेड़ा जा
सके। इसलिए एकता परिषद का मानना है कि देश के गरीब
लोगों को अपने जल,
जंगल और जमीन के अधिकार को किसी
हालत में नहीं छोड़ना चाहिए। यह उनके हाथ से गयी तो
उनके पास कुछ नहीं बचेगा। पिछले दिनों
ग्वालियर से चली पदयात्रा हमारे इसी संघर्ष का
हिस्सा थी। जनादेश के माध्यम से अवज्ञा की घोषणा
करना हमारा मकसद है। यह बहुत ही ताकतवर शब्द है।
इसका अर्थ होता है कि हम उस कानून को नहीं मानेंगे
जो हमारे अधिकारों की रक्षा नहीं करते हैं। गरीब
लोगों को वह अधिकार नही मिल पाता है जो उनका अपना
है। अहिंसात्मक कार्यवाही भी हमारा एक अहम् हथियार
है। इसके जरिए हमारे लगभग दो लाख सदस्यों ने
83 हजार
एकड़ जमीन पर कब्जा किया है। कब्जा की गयी यह जमीन
हमारी है। इसे हम कानूनी तौर पर अपनी मनवा के
रहेंगे। इस देश में वन संरक्षण कानून से लेकर
केन्द्रीय वन संरक्षण कानून तक बने लेकिन आज भी
आदिवासियों को उनका मालिकाना हक नहीं मिल पाया है।
आश्चर्य की बात है कि इस देश के कानून उसे
अतिक्रमणकर्ता मानते हैं।
भारत में
225 राष्ट्रीय पार्क और अभ्यारणय
हैं। इनके कारण 85 लाख
लोग अपनी जमीन से बेदखल हो गये हैं। कानून के अनुसार
संरक्षित वन्य जीवों के आसपास आदमी को नहीं रहने
दिया जायेगा। इसके अलावा औद्योगिक विकास के नाम पर
देश में 447 सेज बनाने की
योजना है। सरकार अगले दस साल में 9
हजार 200
करोड़ रुपये का अनुदान सेज के नाम
पर देने वाली है। पिछले दस साल में तकरीबन एक लाख
किसानों ने आत्महत्या की है और दस हजार कहीं न कहीं
नक्सली हिंसा में मरे हैं। आज देश के 29
फीसदी लोग भूमिहीन हैं। उन्हें
सरकारें महज आंकड़ा मानती हैं। जनादेश यात्रा में
हमने इन्हीं की बात उठायी थी। यह यात्रा सभी के
सहयोग से पूरी हुयी। हमें 380
क्ंविटल अनाज दूसरी संस्थाओं ने
दिया। वहीं भूमिहीन आदिवासियों
ने हमें एक हजार चालीस क्विटल अनाज तीन साल में
इकट्ठा करके दिया। इन लोगों
ने 17 लाख रुपया भी दिया।
आंदोलन में अपना धन लगाया। इस यात्रा के दौरान पूरे
देश में 25000 भूमि
प्रकरण से जुड़े मामलों को इकट्ठा किया गया और
47 हजार पत्र लिखे गये। इन
पत्रेंसे प्रधानमंत्री को हमारी बात सुननी पड़ी।
गोविंदाचार्य जी ने भी हमारे साथ यात्रा की थी।
कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर उमा भारती तक सभी इस
यात्रा में शामिल हुए। अंतिम क्षण में सरकार पर दबाव
बनाने में हम सफल हुए। इस पूरी यात्रा के दौरान
100 सांसदो, 1000
विधायकों
और एक लाख पंचायत प्रतिनिधियों से सीधो संवाद
स्थापित किया गया। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि
जनादेश किसी मांग को लेकर नहीं चली थी। यह आदेश देने
के लिए चली थी और हमने आदेश दिया था कि एक राष्ट्रीय
भूमि आयोग बने और विशेष न्यायालय बने जिससे भूमि
विवादों का जल्द निपटारा हो। एक भूमि नीति बने।
सरकार ने जो वादे किए हैं,
उस पर हम
नजर रखे हुए हैं। यदि आवश्यकता पड़ी तो एकता परिषद के
लोग एक बार फिर आंदोलन की राह पर होंगे।
(प्रस्तुति
: गुंजन कुमार) |