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भारत विकास संगम
2008 |
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गाय
मारने वाले कौन लोग हैं,
यह पता करना बहुत जरूरी है |
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राजेन्द्र जोशी
विनियोग परिवार |
हमारी देशी गाय को खत्म करना एक
अन्तरराष्ट्रीय षडयंत्र है। इस षडयंत्र पर नजर रखने
की जरूरत है। मात्र गोबर,
गोमूत्र से औषधि बनाने से ये काम
नहीं होगा। कृषि पध्दति को बदलने और गोचर भूमि को
बचाने के साथ-साथ गाय को मारने के पीछे कौन हैं,
जब तक हम इसकी पहचान नहीं कर
लेंगे और उसका कोई उपाय नहीं निकाल लेंगे,
तब तक गाय
की रक्षा करना बहुत मुश्किल है।
पांच सौ साल पहले यह दुनिया आज की
तुलना में सुखी और हिंसा रहित थी। लेकिन
1492 में एक ऐसी घटना घटी जिसने
सारे विश्व के प्रवाह को मोड़ दिया। पहले देश-विदेश
से वस्तु के आयात-निर्यात का काम जहाजों से होता था।
ऐसे जहाजों को यूरोप के लुटेरे लूट लेते थे और उसके
बंटवारे को लेकर उनमें विवाद होता था। इन विवादों को
निपटाने के लिए वे अपने
धर्मगुरुओं
की शरण लेते थे,
जो उनके झगड़े निपटाते थे। यूरोप
के
धर्म
गुरु पोप थे,
जो पहले रोम में रहते थे,
परन्तु आजकल उन्होंने
वेटिकन नाम का एक स्वतन्त्र राष्ट्र बना लिया है। उस
राष्ट्र के राजनीतिक प्रमुख होने के साथ-साथ पोप
कैथोलिक क्रिश्चियन समुदाय के
धर्म
गुरु भी हैं।
1493
में
किसी बात पर स्पेन और पुर्तगाल में विवाद हो गया और
पोप ने पूरे विश्व को दो हिस्सों में बांट दिया।
पूर्व का हिस्सा उन्होंने फर्तगाल को और पश्चिम का
हिस्सा स्पेन को दे दिया। इस आदेश के साथ-साथ ये
आदेश भी दिया गया कि आज से विश्व में एक ही धर्म
रहेगा,
ईसाई
धर्म और एक ही प्रजा रहेगी गोरी प्रजा। अन्य जातियों
व धर्मों का नाश होगा। इस उट्टेश्य को लेकर ईसाई देश
संपूर्ण विश्व पर कब्जा करने में लग गये। पोप के
नेतृत्व में उन्होंने भारत में प्रवेश के लिए
100-100
साल के
पांच चरण बनाए। पहला चरण
100
साल का
यह बना कि जिस देश को खत्म करना है,
पहले
उसकी पूरी जानकारी लेनी है। इस दौरान यूरोपियन
पर्यटक हमारे देश के कोने-कोने में घूमे और हमारी
कमजोरियों,
भौगोलिक परिस्थितियों,
कृषि
पध्दति आदि का अध्ययन किया। दूसरे चरण में ईस्ट
इण्डिया कम्पनी के जरिए देश में व्यापार करने की
इजाजत मांगी गई। किसी भी देश को चलाने के लिए चार
आधार होते हैं। राजकीय,
सामाजिक,
आर्थिक
व धार्मिक। अग्रेजों ने पहले यहां की राजसत्ता पर
कब्जा किया,
फिर
हमारे इतिहास को बदल कर राजाओं और व्यापारियांे का
नकारात्मक चित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने
ब्र्राह्मणों और क्षत्रियों को उनके काम से बेदखल
किया। धीरे-धीरे उन्होंने हमारी आर्थिक संरचना को भी
तोड़ डाला। अंतिम चरण में उन्होंने हमारी धार्मिक
संरचना पर प्रहार किया जो अभी भी जारी है। इसके लिए
उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था पर शिकंजा कस लिया
है। हमारी आर्थिक संरचना को नष्ट करने के लिए
उन्होंने गोवंश और उस पर आधारित कृषि को निशाना
बनाया। दरअसल,
इस देश
में गायों की हत्या मुसलमानों ने शुरू नहीं की।
अंग्रेज सैनिकों को मांस देने के लिए यहां गो हत्या
शुरू हुई और बाद में अंग्रेजों ने ही इसे
सांप्रदायिक मामला बनाकर पूरे देश को दो हिस्सो में
बांट दिया। कृषि को नष्ट करने के लिए रासायनिक खाद
को बढ़ावा दिया गया। जनता को भुलावे में डालने के लिए
एक हउआ खड़ा किया गया कि हमारे यहां अनाज का उत्पादन
बहुत कम है। अगर हम इस उत्पादन को नहीं बढ़ाएंगे तो
देश में अकाल पड़ेगा। वास्तव में
1931
का
अकाल मैन मेड अकाल था। अंग्रेजों ने जानबूझ कर यहां
अकाल पैदा किया था। अकाल का डर दिखाकर केमिकल
फर्टिलाइजर के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया। इसका
दुष्परिणाम अब सामने आ रहा है। हमारी जमीन प्रदूषित
है,
हमारा
अनाज प्रदूषित है और यहां तक की पेयजल भी प्रदूषित
है। हमारी देशी गाय को खत्म करना एक अन्तरराष्ट्रीय
षडयंत्र है। इस षडयंत्र पर नजर रखने की जरूरत है।
मात्र गोबर,
गोमूत्र से औषधिा बनाने से ये काम नहीं होगा। कृषि
पध्दति को बदलने और गोचर भूमि को बचाने के साथ-साथ
गाय को मारने के पीछे कौन हैं,
जब तक
हम इसकी पहचान नहीं कर लेंगे और उसका कोई उपाय नहीं
निकाल लेंगे,
तब तक
गाय की रक्षा करना बहुत मुश्किल है।
(प्रस्तुति
: छवि कौशिक)
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