भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 फरवरी,  2008

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भारत विकास संगम 2008

इक्कीसवीं सदी के विनोबा हम ही होंगे

शरद कुमार साधक (जय जगत सेवा संस्थान)

हम एक भी चीज बाहर से खरीदकर नहीं खाते। नमक और चीनी के अलावा कोई भी चीज हमें बाहर से नहीं खरीदनी पड़ती है। हम यहां खादी के कपड़े बनाने का भी प्रशिक्षण देते हैं। आप सब भी अपने जिले में इसी तरह का प्रयोग करवा सकते हैं। इस स्थान पर बना हुआ 1600 मी. कपड़ा हमने बाहर भेजा है। जिनको खादी का संकल्प नहीं है, उन्हें भी हमने अपना कपड़ा दिया।

 

किसी भी काम को करने के पहले उसकी योजना बनानी जरूरी होती है। योजना बनाते समय अपने काम का लक्ष्य भी तय करना चाहिए। काम अच्छे से करना है लेकिन किसके लिए करना है और क्यों करना है, यह स्पष्ट होना चाहिए। अगर इसका उत्तार आपके पास है तो फिर दूसरा प्रश्न होगा कि किस साधन से करना है। इसके बाद बात आती है कि साधन सिध्दि का ख्याल रखना है या नहीं रखना है। इन सब बातों के आधार पर ही आपके काम का स्वरूप बन कर सामने आता है। जब हमने यहां काम शुरू किया तो हमारे पास एक स्पष्ट कदम था कि कत्ल के लिए जाने वाली गायों और बैल आदि पशुओं को बचाया जाए। गाय को बचा लिया तो दूसरा प्रश्न खड़ा हुआ कि उसको खिलाने के लिए क्या करें? तब हम लोगों ने गौशाला वालों को कहा कि आपकी जमीन पर हम यह गाय खड़ी कर रहे हैं। फिर हम लोगों ने उन्हें समझाया कि आपकी जमीन किसके लिए है? घास पैदा करने के लिए। आप घास पैदा करें। फिर यह सवाल आया घास पैदा करने में उनकी मदद कैसे की जाये? हमने उन्हें बताया कि गोबर का उपयोग करने से शायद काम हो जाए। हमने जहां अपनी गौशाला शुरू की, वहां की जमीन पथरीली है। हमने सोचा कि क्या इस जमीन को हम उपजाउफ बना सकते हैं? उपजाउफ बनायें तो वहां किस चीज का उत्पादन करेंगे? हम वैसा विकास नहीं चाहते कि कोई गौशाला की जमीन पर तम्बाकू उपजाए, गांजा उपजाए। इसलिए हम लोगों ने कहा पहले यहां घास पैदा करेंगे, जिसे गाय खा सके। इसके बाद दूसरा कदम सब्जी पैदा करने का, तीसरा कदम अनाज पैदा करने का और चौथा कदम हमने फल पैदा करने के रूप में आगे बढ़ाया। इसके बाद हमने कल्पना की कि सभी को फल, अनाज, दूध सब आा-आधा किलो मिलना चाहिए।

विनोबा जी के साथ जब मैं काम कर रहा था, उस समय लगता था कि एक परिवार के पास पांच एकड़ जमीन होनी चाहिए। वह समय पचास साल पीछे छूट गया। आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। इसलिए हम लोगों ने तय किया इक्कीसवीं सदी के विनोबा हम ही होंगे। तब हमने एक नया संकल्प लिया। जिस आदमी के साथ नई कल्पनाएं नहीं होतीं वह देश का निर्माण नहीं कर सकता। हम यह तो चाहते थे कि हर व्यक्ति को आधा किलो दूध, सब्जी, अनाज और फल मिले, पर यह होगा कैसे? हमने एक प्रयोग किया कि क्या यह सब एक एकड़ जमीन में हो सकता है। कुछ ही दिनों में हम लोगों ने ऐसा कर दिखाया और जब राष्ट्रपति ने हमें बुलाया तो हमने कहा कि हम उन साधनों का उपयोग करते हैं जिसमें राष्ट्रीय उफर्जा की खपत कम से कम हो। इसमें बजरंग मुनि हमारे काम आये। क्योंकि इन्होंने अपनी पहली रिसर्च हमारे साथ ही की थी। इन्होंने कहा था कि जितनी इस देश की आबादी है उससे दस गुना लोगों को हम अपने संसाधनों से खिला सकते हैं।

हमने साक्षरता की बजाए सार्थकता पर जोर दिया। इसलिए हमारा नारा बना कि कर्मभूमि को कर्मभूमि बनने दो, र्मभूमि बना सको तो धन्य होगे और नहीं तो उसे भोगभूमि तो मत बनाओ। इन प्रयासों का फल यह मिला कि पांच साल में इतना बड़ा प्रकल्प खड़ा हो गया। हम जब यह ठान लें कि हमने जो उपजाया है वही खाएंगे, हमने जो बुना है वही पहनेंगे, तब सारी समस्या दूर हो जायेगी। हमें देश की मिट्टी, देश के पानी को अपनाना होगा। हम पैकेट बंद दूध को अपना नहीं मानते हैं। जब तक बाहर का हम खायेंगे, तब तक अपने जिले को अपने गांव को विकसित नहीं कर सकते हैं।

हमें अपना काम इतने बढ़िया ढंग से करना होगा कि ग्राम सभा प्रतिनिधि, नगर प्रतिनिधि, विधान सभा में जाने वाले प्रतिनिधि और संसद मे जाने वाले प्रतिनिधि सभी हमारे बिना चुनाव न जीत सकें। हम जिस दिन उन्हें अस्वीकार कर दें, वह जीत ही नहीं सकें। इस भूमिका में आप जिस दिन आ गये उस दिन हमारी जीत होगी। गांव के उद्योगों को उजड़ने से बचाना होगा। यदि आपका दर्शन सही नहीं है तो आप का ज्ञान कभी शुध्द नहीं हो सकता है। इसलिए अन्य चीजों के साथ-साथ चरित्र निर्माण पर भी बल दिए जाने की जरूरत है।

जिस देश में व्यवस्था नहीं होती है वहां व्यवस्था स्थापित करने के लिए कहां से शुरूआत की जाए, यह तय करना आसान नहीं होता है। पर शुरूआत तो करनी ही होगी। इस कड़ी में प्रशिक्षण का पहला सूत्र यह है कि हम प्रत्यक्ष तौर पर रती से जुड़ें। हमारे यहां कदम-कदम पर ज्ञान का भंडार है। आज इसे समझने की जरूरत है और इनसे सबक लेकर अपने-अपने जगह पर कुछ न कुछ करने की जरूरत है। हमने अपने अनुभवों से जो ज्ञान हासिल किया है, वह हम सिखाने को तैयार हैं। हम उस भारत का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें जन आधारित अर्थव्यवस्था हो। आज लोगों को हिंद स्वराज पढ़ने की जरूरत है। वही हमारा स्रोत है जिससे प्रेरणा लेकर सौ साल के बाद भी हम नया कदम उठा पा रहे हैं। हिन्द स्वराज ने हमको सिखाया कि अगर सिंगर मशीन एक आदमी बना सकता है तो आप भी ऐसा कर सकते हैं। वही हम यहां कर रहे हैं। यहां आपको जानकारी दे दूं कि हम एक भी चीज बाहर से खरीदकर नहीं खाते। नमक और चीनी के अलावा कोई भी चीज हमें बाहर से नहीं खरीदनी पड़ती है। हम यहां खादी के कपड़े बनाने का भी प्रशिक्षण देते हैं। आप सब भी अपने जिले में इसी तरह का प्रयोग करवा सकते हैं। इस स्थान पर बना हुआ 1600 मी. कपड़ा हमने बाहर भेजा है। जिनको खादी का संकल्प नहीं है, उन्हें भी हमने अपना कपड़ा दिया। हम लोगों से कहते हैं कि हम आपकी व्यवस्था के विकल्प में नहीं जा रहे हैं बल्कि हम तो नई व्यवस्था दे रहे हैं। हम निषे में अपनी शक्ति नहीं लगाना चाहते हैं। हम सत्य में सहकार चाहते हैं। आज चिंतन और चित्त की से सहकार की जरूरत है। जिसका चिंतन स्पष् नहीं होगा, जिसका चित्त स्पष् नहीं होगा, उसका चरित्र भी स्पष् नहीं हो सकता है। हम विचार नहीं सिखाते हैं बल्कि किसी को विचार करने की प्रेरणा देते हैं। विचार की प्रेरणा का बीज बोकर हम कार्य पैदा करते हैं। फिर हमारे विचार से कार्य का बीज स्वभाव पैदा करता है। अगर आपके स्वभाव में निष्ठा नहीं आई तो ये सारे कारखाने बेकार हैं। यहां के विद्यालय में पढ़ने वालों में हम विद्या की निष्ठा पैदा करते हैं। इस देश में श्रम करने वालों की बहुत बड़ी संख्या है पर श्रम के प्रति निष्ठा नहीं है। यहां पर हम लोगों में श्रम के प्रति निष्ठा पैदा कर रहे हैं। श्रमनिष्ठ आदमी समाज की दिशा बदलने के साथ-साथ अपने जीवन की भी दिशा बदल सकता है। इसलिए हम कर्म करने वाले को महत्व नहीं देते कर्मयोगी को महत्व देते हैं। हमारे पास उद्योग ऐसा होना चाहिए, जिससे हमारा पड़ोसी सुरक्षित रहे। न्याय व्यवस्था को भी सुधारे जाने की जरूरत है। इस देश की अदालतों में लाखों मुकद्दमें सालों से लटके हुए हैं। ऐसे में अहम सवाल यह है कि ऐसी न्याय व्यवस्था आखिर किस काम की है। संविान की विायें जितनी ज्यादा होंगी उतना ही ज्यादा आदमी उलझेगा। इस उलझन का परिणाम हम सब अच्छी तरह जानते हैं। आचार्य कुल का मानना है कि सबसे ज्यादा खोट न्याय व्यवस्था में है। जहां सबसे ज्यादा वेतन लेने वाले लोग हों और अगर वहां सबसे ज्यादा मुकद्दमें बिना किसी फैसले के पड़े रहें तो यह तय है कि वह व्यवस्था असफल है।

आचार्यकुल, सुरभि शोध संस्थान और जय जगत सेवा संस्थान का मकसद भोग भूमि बन चुके भारत को कर्म भूमि बनाना है। और फिर इस कर्म भूमि को र्म भूमि बनाना है। इस दिशा में हम परिवर्तन करते हैं तो हमारा अर्थशास्त्र बदलेगा, समाज शास्त्र बदलेगा, राजनीति शास्त्र बदलेगा और संस्कृति शास्त्र बदलेगा। अगर इस देश को एक रखना है तो संसाधनों का सही उपयोग करना होगा। अगर हमने संसाधनों का बिना सोचे-समझे उपयोग जारी रखा तो समस्याओं का विकराल रूप धारण करना तय है। पानी के संरक्षण के लिए गंभीरता के साथ हमें प्रयत्न करना होगा। यह एक बहुत बड़ा काम है और इसे जन-जन की भागीदारी से ही अंजाम दिया जा सकता है। देश में जमीन की समस्या भी गहराती जा रही है। हम तो उस आंदोलन के आदमी हैं जो मानते हैं कि रती पर कब्जा करने वाले और पानी पर कब्जा करने वाले देशद्रोही हैं। इन समस्याओं को हल करना होगा क्योंकि यह दिशा बदलने का प्रश्न है। नई पीढ़ी के सामने यह एक चुनौती है कि वे आपसी सहकार से इन समस्याओं का समाान ढूंढने में अपनी भूमिका निभाएं।

(प्रस्तुति : गुंजन कुमार, नवलेश कुमार)

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन