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भारत विकास संगम |
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चुनार की चर्चा को आगे बढ़ाएं |
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विमल कुमार सिंह |
विकास एक ऐसा
शब्द है जिसके बारे में सहमति और असहमति के दोनों
धुर्व साथ चलते रहते हैं। एक ओर जहां संपूर्ण मानव
समाज विकास करने को आतुर है,
वहीं विकास के मायने क्या हैं,
इसके बारे में घोर असहमति भी है।
भौतिक सुख-सुविधाओं
में वृध्दि क़ो विकास का प्रत्यक्ष उदाहरण माना जाता
है। कोई देश या समाज कितना विकसित है,
इसका निर्धारण प्राय: उसके पास
मौजूद भौतिक संसाधनों
से ही किया जाता है। लेकिन,
वास्तव में विकास का यह सीमित
अर्थ है। वास्तविक विकास भौतिक संसाधनों
से कहीं आगे की चीज है। यदि भौतिक संसाधनों
के कारण संपूर्ण मानव समाज में सुख शांति का प्रसार
हो रहा है तभी उसकी सार्थकता है। अन्यथा उन्हें
निरर्थक ही कहा जाएगा। किसी खास वर्ग की प्रभुता और
उसके वैभव के वाहक बन चुके भौतिक संसाधनों
को विकास का नहीं बल्कि विनास का द्योतक माना जाना
चाहिए।
पिछले दिनों टाटा की
नई कार नैनो की बड़ी धूम रही। देश-विदेश की मीडिया
उसके गुणगान में लगी रही। जनता के साथ-साथ नेता और
अभिनेता भी उसकी झलक पाने को बेचैन दिखे। तथाकथित
रूप से एक लाख रुपए की इस कार को इस तरह से पेश किया
गया जैसे इसके आते ही देश में विकास की गंगा बह
निकलेगी। इसी दौरान गंगा एक्सप्रेस हाईवे की भी खूब
चर्चा चली। नाले में तब्दील होती जा रही गंगा को
बचाने और पहले से ही मौजूद खस्ताहाल सड़कों को
दुरुस्त करने की बजाय इस नए हाईवे पर हजारों करोड़
रुपए खर्च करने की गर्वीली घोषणाएं हुईं। ऐसा लग रहा
है जैसे हमारी सरकारें और हमारे उद्योगपति पूरे देश
को कार पर बिठाने और उसके लिए हाइवे बनाने को ही
विकास का एकमात्र पैमाना मान चुके हैं।
हमारी सरकारें और हमारे उद्योगपति
विकास के जिस माडल को देश पर लादने की कोशिश कर रहे
हैं,
उसके बारे में कितना भी ढोल पीटा
जाए, लेकिन सभी लोग उससे
सहमत नहीं हैं। मीडिया को नजर आए या न आए लेकिन देश
में ऐसे ढेर सारे लोग हैं जो वर्तमान में अधिकाधिक
सुख-साधन
के उपकरण जुटाने को ही विकास नहीं मानते। वे विकास
को अतीत की जानकारी,
वर्तमान की समझ और भविष्य की
संभावनाओं से जोड़ कर देखते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों का
जमावड़ा पिछले दिनों वाराणसी के पास चुनार में हुआ।
के.एन. गोविन्दाचार्य के आह्वान पर भारत विकास संगम
के दूसरे सम्मेलन में भाग लेने आए इन लोगों के पास न
तो सरकार की ताकत थी और न ही उद्योगपतियों की पूंजी,
लेकिन उनके पास विकास की एक ऐसी
दृष्टि जरूर दिखाई दी,
जिसमें मानव समाज
की अक्षय सुख-शांति के कारगर उपाय छिपे हैं।
विकास के जिस माडल की चर्चा चुनार
में हुई,
उसमें किसी एक व्यक्ति या कंपनी
द्वारा हजारों-लाखों करोड़ रुपए कमाने की संभावना
नहीं है। उसमें अंबानी जैसे
धनकुबेर
पैदा नहीं हो सकते। लेकिन यह भी सच है कि उस माडल
में भुखमरी की डर से किसान के सामने आत्महत्या करने
की मजबूरी भी नहीं होगी। चुनार में आयोजित तीन दिन
का भारत विकास संगम वास्तव में विचारों और कार्यों
दोनों का संगम था। वहां
'होना
चाहिए' की बजाए 'हुआ
है' पर अधिक जोर था। मंच
से जो लोग बोले, उनकी
वाणी के पीछे सफल प्रयोगों का तेज था। संगम का एक
रूप औपचारिक सत्रे में दिखा तो दूसरा रूप उसके बाहर
भोजन करते, चाय पीते और
रात को सोते समय दिखा, जब
लोग अपने-अपने प्रयोगों की आपस में चर्चा करते और
एक-दूसरे के अनुभवों से कुछ नया जानने-सीखने में लगे
रहते। भारतीय पक्ष के इस अंक के माध्यम से हम चुनार
में हुई चर्चाओं की एक झांकी अपने पाठकों के लिए भी
प्रस्तुत कर रहे हैं,
इस आशा के साथ कि
ये चर्चाएं उनके माध्यम से भारत के कोने-कोने में और
जन-जन में धीरे-धीरे ही सही लेकिन जरूर पहुंचेंगी। |