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अप्रैल,  2008

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तूफानों में प्रज्ज्वलित एक ज्योति

कृष्ण कुमार भारतीय

तेजस्विनी उन तेज बह रही आंधियों और तूफानों में प्रज्ज्वलित वह ज्योति है, जिनके सामने एक जलते दीपक का कोई अस्तित्व नहीं होता। लेकिन इतनी कठिन व प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी तेजस्विनी ने न केवल उनका डटकर मुकाबला किया बल्कि स्वयं को प्रज्ज्वलित रखकर उनको हराया भी। मानसिक व शारीरिक रूप से चुनौती झेल रही तेजस्विनी आज संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कर चुकी है।

 

कुदरत और किस्मत ने बेशक तेजस्विनी से बहुत कुछ छीना लेकिन मां सरस्वती की अपार कृपा उस पर है। कहते हैं, लगन और मेहनत असंभव को भी संभव बना देती है, ठीक तेजस्विनी ने भी वही कर दिखाया है। तेजस्विनी उन तेज बह रही आंधियों और तूफानों में प्रजवलित एक ज्योति है, जिनके सामने एक जलते दीपक का कोई अस्तित्व नहीं होता। लेकिन कठिन व प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी तेजस्विनी ने न केवल उनका डटकर मुकाबला किया बल्कि स्वयं को प्रजवलित रखकर उनको हराया भी। मानसिक व शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को झेल रही तेजस्विनी आज संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कर चुकी है। उसका सपना एक सफल गायिका के रूप मे स्वयं को स्थापित करने का है।

21 वर्षीय तेजस्विनी का जन्म सेक्टर 16, पंचकूला (हरियाणा) में हुआ। पिता सुनील शर्मा व माता हर्षबाला की खुशी का ठिकाना नहीं था, जब उन्होंने अपनी तेजस्वी पुत्री की प्रथम मुस्कुराहट को देखा था। पर शायद यह विधि की विडंबना ही थी कि मात्र सात दिन की तेजस्विनी के पेट पर शल्य चिकित्सा की गई। शल्य चिकित्सा के दौरान हुई कुछ चिकित्सकीय गलती का उसके दिमाग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। परिणामवश तेजस्विनी कई वर्ष तक बिस्तर पर ही रहने को विवश हो गई।

जिस उम्र में बच्चे अपने मां-बाप से खिलौनों की जिद्द करते हैं, उन दिनों तेजस्विनी की इच्छा संगीत सुनने, गुनगुनाने तथा संगीत के वाद्ययंत्रें को देखने की थी। तेजस्विनी पर यह मां सरस्वती की अनुकंपा ही थी कि तेजस्विनी ने अपनी जिंदगी के पहले शब्दों को भी संगीत से शुरू किया। उसकी माता हर्षबाला ने बताया, 'तेजस्विनी सारा-सारा दिन बिस्तर पर पड़ी रहती थी, न हंसती थी, न बोलती थी सिर्फ संगीत सुनती थी। तेजस्विनी ने जन्म से ही कुछ नहीं बोला था। हमसे उसकी यह हालत नहीं देखी जाती थी। यहां तक कि डाक्टरों द्वारा तेजस्विनी को दो बार मृत भी घोषित किया जा चुका था। मैं इसे गाड़ी में घुमाने ले जाती थी। एक दिन जब गाड़ी में चल रही आडियो कैसेट किसी कारणवश रुक गई तो चल रहे गीत की अगली पंक्तियों को तेजस्विनी ने स्वर दिया। मैं मारे खुशी के हैरान थी और मेरी आंखों से जैसे खुशी के आंसू छलक पडे थे। यह उसकी जिंदगी के पहले शब्द थे, जो उसने अपने कंठ से उच्चारित किए थे। मेरे बार-बार जोर देने पर भी जब तेजस्विनी ने दोबारा नहीं गाया तो मैंने हमारे परिचित डा. अरविंद शर्मा से इस बारे में बातचीत की।' इसके बाद डा. शर्मा द्वारा संचालित गंधर्व महाविद्यालय, पंचकूला में तेजस्विनी को नियमित रूप से भेजा जाने लगा। फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। गंधर्व महाविद्यालय के संचालक और पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में संगीत विभागाधयक्ष अरविंद शर्मा के मार्गदर्शन में तेजस्विनी ने संगीत पर जबरदस्त पकड़ हासिल कर ली। श्री शर्मा ने बताया, 'हमारे महाविद्यालय में बहुत से विद्यार्थी संगीत शिक्षा प्राप्त करने आते हैं लेकिन जितनी तीव्रता व सहजता से तेजस्विनी सुरों के उतार-चढ़ाव को ग्रहण व आत्मसात करती है वह अन्य विद्यार्थियों के लिए आश्चर्यजनक एवं कठिन है। तेजस्विनी विलक्षण प्रतिभा की धनी है।'      

गंधर्व महाविद्यालय के संगीत कक्षा से अपनी गायन कला का आगाज करने वाली तेजस्विनी का स्थानीय गायन व संगीत आयोजनों से लेकर प्रान्तीय व राष्ट्रीय स्तर के मंचों तक का सफर बेहद संघर्षपूर्ण एवं काबिले तारिफ रहा है। स्थानीय 'सुर संगम' नाम की संगीत संस्था से उसका संपर्क अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा। संस्कार भारती ने भी तेजस्विनी की काफी मदद की। टेलीविजन पर 'हीरो होंडा सारेगामागायन प्रतियोगिता में चण्डीगढ़ चैप्टर से लगातार दो बार प्रथम स्थान पाने वाली तेजस्विनी ने स्थानीय व प्रान्तीय स्तर की अनेकों गायन प्रतियोगिताओं में बाजी मार कर अपनी गायन कला की उत्कृष्टता का परिचय दिया। वर्ष 2000 में हैदराबाद में आयोजित अखिल भारतीय गायन प्रतियोगिता में अनुराधा पौडवाल व अल्का याग्निक जैसी दिग्गज गायिकाओं के सामने गायन में प्रथम स्थान प्राप्त कर उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वह अपने इस आगाज से लेकर अंजाम तक के सफर के दौरान आए पड़ावों को स्मरण करती हुई बताती है कि  इस दौरान सभी संघर्षों पर विजय संगीत के प्रति निष्ठा, लगन एवं रुचि के कारण ही संभव हो पाई है।

तेजस्विनी या तो एक से बीस तक गिनती लिखना जानती है या फिर अपने घर का नाम 'सोनू'। उसकी शैक्षणिक योग्यता चाहे जो हो लेकिन उसे बहुत सारे भजन व गीत कंठस्थ हैं। वह मंदबुध्दि बच्चों के लिए आयोजित ओलम्पिक खेलों में दो स्वर्ण व एक कांस्य पदक जीत चुकी है। उत्तर क्षेत्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट व उत्तर क्षेत्रीय योग व सांस्कृतिक प्रतियोगिता में वह मेरिट तथा प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी है। वह जब वाद्ययंत्रें को बजाती हुई गाती है, 'पायो जी मैंने रामरतन धन पायो' तो मानो संगीत रूपी रामरतन की प्राप्ति का विश्वास और संतोष उसके मुखमंडल पर झलक उठता है। तेजस्विनी लता मंगेशकर की प्रशंसक है तथा उनसे मिलना चाहती है और उनके साथ गाना चाहती है। जब उससे पूछा गया कि आप लता मंगेशकर की ही फैन क्यों हैं? मासूमियत के साथ वह कहती है, 'क्योंकि लता मंगेशकर मेरी फैन हैं।' माता हर्षबाला ने बताया कि तेजस्विनी द्वारा लता मंगेशकर से फोन पर बात कराए जाने की जिद्द करने पर वे स्वयं दूसरे कमरे में जाकर तेजस्विनी से लता मंगेशकर बनकर टेलीफोन पर बातें करती हैं। इस प्रकार तेजस्विनी को संगीत के क्षेत्र में लता मंगेशकर का अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन महसूस होता है।

तेजस्विनी की संगीत के प्रति रुचि के प्रश्न पर गंधर्व महाविद्यालय के संचालक डा. अरविंद शर्मा बतातें हैं कि तेजस्विनी लगातार तीन घंटे यहां और दो-तीन घंटे घर पर रियाज करती है। सामान्य विद्यार्थियों की तरह तेजस्विनी किसी अपरिचित अथवा भीड़ के सामने गाते वक्त संकोच नहीं करती। अपनी प्रस्तुति के दौरान जिस आत्मीयता से वह स्वरों को लयबध्द करती है, वह देखते ही बनता है। संगीत के मामले में किसी प्रकार का कोई समझौता उसे सहन नहीं है। माता हर्षबाला ने बताया कि दिल्ली में आयोजित एक संगीत प्रतियोगिता के दौरान जब संचालकों ने माइक को इस प्रकार से सैट करवा दिया कि तेजस्विनी को आवाज का स्तर अपने गायन के अनुकूल नहीं लगा तो उसने मंच से ही यह कहकर गायन बंद कर दिया कि आपने सुरों को नीचे सैट कर दिया है जबकि मुझे ऊंचे सुर में गाना है। तेजस्विनी स्वाभिमानी एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण है और उसे अपनी प्रतिभा पर पूरा भरोसा है।        

संपर्क: विनायक भवन, अनाज मण्डी कलायत, जिला कैथल, हरियाणा-136117  

 

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