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अप्रैल,  2008

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गंगा-संस्कृति प्रवाह यात्र

सेवा, साधाना, संवाद और संघर्ष के संकल्प के साथ पूरा हुआ पहला चरण

 भारतीय पक्ष ब्यूरो

 

गंगासागर से एक फरवरी को शुरू हुई गंगा संस्कृति प्रवाह यात्र गंगा के तट पर स्थित विभिन्न नगरों में जनजागरण करती हुई दो मार्च को हरिद्वार पहुंची। अविरल गंगा निर्मल गंगा का अलख जगाते हुए यह यात्र जहां कहीं से गुजरी, वहां के लोगों को गंगा की रक्षा के बारे में एक नयी दृष्टि देती हुई गयी। यात्र में इस बात को बार-बार रेखांकित किया गया कि गंगा को बचाने का काम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। पिछले सालों में करोड़ों-अरबों रुपए फूंकने के बाद भी सरकार गंगा को प्रदूषण मुक्त करने में असफल रही है। साथ ही उसने विकास के नाम पर बांधों की एक आत्मघाती शृंखला तैयार कर दी है जिसने गंगा के संकट को और बढ़ा दिया है। सरकार की किलता कोई नई बात नहीं है। यह सभी को पहले से ही मालूम है। लेकिन इसका समाधान क्या है, इसे लेकर जनता में भ्रम की स्थिति है। गंगा संस्कृति प्रवाह यात्र ने इस भ्रम को दूर करने की कोशिश की है। यात्र के दौरान लोगों को बताया गया कि गंगा रक्षा के लिए जनता को सेवा, साधना, संवाद और संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा। सेवा अर्थात गंगा के तटीय नगरों एवं ग्रामों के लोग अपने-अपने क्षेत्र में गंगा के प्रदूषण को दूर करने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर श्रमदान करें। साधना अर्थात गंगा को केवल जल का श्रोत न मानकर उसे धर्म-संस्कृति की साक्षात देवी मानने की जो मान्यता है, उसे पुनर्स्थापित किया जाए, खासकर समाज के संभ्रांत एवं 'प्रबुध्द' वर्ग में। गंगा रक्षा का तीसरा सूत्र संवाद बताया गया। आज भी देश का एक बड़ा वर्ग गंगा से जुड़े विभिन्न तथ्यों से अनभिज्ञ है। उसे गंगा की वर्तमान स्थिति, महत्व, सरकारी भूमिका के साथ-साथ उसके अपने दायित्व के बारे में भी लगातार तथ्यपरक बात बताने की जरूरत है। गंगा को बचाने का अंतिम पर अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है संघर्ष का। यह संघर्ष जनता को सरकार एवं उन सभी तत्वों से करना होगा जो गंगा रक्षा के पुनीत कार्य में जाने-अनजाने अवरोध बनकर खड़े हो गए हैं।

गंगा महासभा की मूल योजना के अनुसार गंगा-संस्कृति प्रवाह यात्र का पहला चरण 6 मार्च को उत्तरकाशी में पूरा होना था। लेकिन  बाद में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि यात्र को दो हिस्सों में बांट दिया जाए। पहले चरण में मैदानी भूभाग को रखा गया  जिसका आखिरी पड़ाव हरिद्वार को तय किया गया। दूसरे चरण में पहाड़ी इलाके को रखा गया है। इस हिस्से की यात्र  मई माह में प्रारंभ होगी जो देवप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी होते हुए गंगोत्री में पूरी होगी।

गंगा संस्कृति प्रवाह यात्र के दौरान रास्ते में पड़ने वाले प्रत्येक नगर में अन्य कार्यक्रमों के साथ-साथ गंगा आरती और जनसभा का आयोजन किया जाता था। दो मार्च को हरिद्वार में भी ऐसा ही किया गया।  दिव्य प्रेम सेवा मिशन के चंडीघाट स्थित परिसर में आयोजित जनसभा में संख्या में स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया। जनसभा को संबोधित करने एवं यात्रियों को आशीर्वाद देने के लिए पूज्य माधवाचार्य विश्वेशतीर्थ जी महाराज विशेष रूप से हरिद्वार आए थे। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति पंचगकारों- गंगा, गौ, गायत्री, गीता और गोविंद पर आधारित है। इन सभी में गंगा का विशेष महत्व है। इसके रक्षण का ईमानदारी से प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने उपस्थित जनसमूह का आह्वान करते हए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ही राजा है। अत: आज भगीरथ की भूमिका उसे ही निभानी होगी।

श्री के.एन. गोविन्दाचार्य ने अपनी बात रखते हुए कहा कि गंगा ज्ञान की, यमुना कर्म की और नर्मदा वैराग्य की साधना स्थली रही है। इसी तरह सभी छोटी-बड़ी नदियों का अपना-अपना स्वभाव होता है। जब सरकारें इन्हें केवल पानी मुहैया कराने वाली 'वाटरबाडीज' मानकर नीतियां बनाती हैं तो समस्या पैदा होती है। गंगा की आज जो दुर्गति हो रही है, उसके लिए उन्होंने सभी सरकारों को दोषी बताया। टिहरी बांध का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सभी सरकारों ने 'विकास' के लिए बहुत जरूरी बताते हुए इसकी वकालत की जबकि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इसके पक्ष में नहीं थे। आज हकीकत यह है कि तीन साल बाद भी न तो टिहरी जलाशय भरा है और न ही उससे अपेक्षित बिजली पैदा हो रही है। टिहरी बांध की किलता 'विकास' की वर्तमान अवधारणा के सामने बहुत बड़ा सवाल है। श्री गोविन्दाचार्य ने उपस्थित जनसमूह का आह्वान करते हुए कहा कि गंगा को बचाने की जिम्मेदारी अब जनता को अपने हाथों में लेनी होगी। सेवा, साधना, संवाद और संघर्ष के सहारे जनता ही गंगा को बचा सकती है।

जनसभा को गंगा महासभा के महामंत्री आचार्य जितेंद्र और यात्र के संयोजक श्री गोविंद शर्मा के साथ-साथ उत्तराखंड के तीर्थाटन, पर्यटन एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री प्रकाश पंत तथा दिव्य प्रेम सेवा मिशन के श्री आशीष गौतम सहित कई गणमान्य लोगों ने भी संबोधित किया। मंत्री महोदय ने अप्रत्यक्ष रूप से बड़े-बड़े बांधों की निरर्थकता को स्वीकार किया और कहा कि उनकी सरकार अब किसी नए बड़े बांध को मंजूरी नहीं दे रही है। जो बड़े बांध बन चुके हैं और जो अभी भी बन रहे हैं, उनके बारे में उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की। कार्यक्रम के अंत में प्रख्यात कलाकार श्री सत्यनारायण बाबा मौर्य ने लोगों के सामने बड़े सशक्त ढंग से गंगा रक्षा और राष्ट्रभक्ति से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात रखी। उनकी प्रस्तुति पूरी यात्र में जनजागरण का सबसे प्रभावी माध्यम रही। हरिद्वार की जनता भी उनकी कला के जादू से बच न सकी। देर रात तक लोग उनकी बात सुनते रहे। चित्रकला, भाषण और संगीत में अद्भुत तालमेल स्थापित करते हुए उन्होंने अपनी टीम के साथ जो कार्यक्रम प्रस्तुत किया वह हरिद्वार की जनता के लिए अविस्मरणीय रहा।

 

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन