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विविधा |
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समाजवाद का भविष्य |
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भगवतीधर
वाजपेयी |
किसी को यह स्वीकार करने में क्यों संकोच होना चाहिए कि समाजवाद का
उद्देश्य बड़ा पवित्र रहा है। सत्ता और वह भी लोकतांत्रिक सत्ता यदि
कमजोरों का उत्थान नहीं करती तो उस सत्ता का कोई अर्थ ही नहीं
है। लोकतंत्र में तो सारी जनता को ही,
जिसमें गरीब, अमीर,
शिक्षित-अशिक्षित सभी सम्मिलित हैं,
यह अधिकार दिया गया है कि एक निश्चित समयावधि के
बाद सत्ता में बैठे अपने जन-प्रतिनिधियों को वह चुनाव के माध्यम से
परखे।
हमारे देश में समाजवाद के भविष्य पर आज प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है।
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश का संविधान आम आदमी के हितों को धयान
में रख कर ही बनाया गया था। देश के आर्थिक विकास के लिए मिश्रित
अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया गया। यद्यपि सार्वजनिक उद्योगों को अधिक
महत्व दिया गया। उद्देश्य यह था कि देश का धन कुछ खास लोगों की मुट्ठी
में कैद हो कर न रह जाए। पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य भी यही था कि
गरीबी दूर हो,
आम आदमी ऊपर उठे,
बेरोजगारी दूर हो, शिक्षा और चिकित्सा की
सुविधाएं प्रत्येक को सुलभ हों। संविधान की मूल प्रस्तावना में आम आदमी
के हितों का पूरी तरह से धयान रखा गया था फिर भी तत्कालीन प्रधान
मंत्री इंदिरा गांधी के आपातकाल का लाभ उठा कर एक संशोधन के द्वारा
संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवाद'
शब्द जोड़ कर भारतीय गणतंत्र के आर्थिक स्वरूप पर एक
मोहर लगा दी। सामाजिक दृष्टि से भी देश की पंथ निरपेक्षता को असंदिग्ध
बनाने के लिये प्रस्तावना में 'पंथ निरपेक्ष'
(सेक्यूलर) शब्द जोड़ दिया गया।
किसी को यह स्वीकार करने में क्यों संकोच होना चाहिए कि समाजवाद का
उद्देश्य बड़ा पवित्र रहा है। सत्ता और वह भी लोकतांत्रिक सत्ता यदि
कमजोरों का उत्थान नहीं करती तो उस सत्ता का कोई अर्थ ही नहीं है।
गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम के मुंह से यह कहलवाकर कि
'जासु
राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी'
शासकों के लिये एक बड़ी कड़ी कसौटी उपस्थित कर दी है।
लोकतंत्र में तो सारी जनता को ही, जिसमें
गरीब, अमीर,
शिक्षित-अशिक्षित सभी सम्मिलित हैं, यह
अधिकार दिया गया है कि एक निश्चित समयावधि के बाद सत्ता में बैठे अपने
जन-प्रतिनिधियों को वह चुनाव के माधयम से परखे कि वे जन-अपेक्षाओं के
अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं और यदि नहीं,
तो उसको ऐसे जन प्रतिनिधियों को सत्ता से हटाने का
अधिकार है।
इसमें आमतौर पर कोई विवाद नहीं है कि साम्यवाद/समाजवाद के द्वारा मजदूर
वर्ग के हितों का पोषण हुआ है। इसके कारण पूंजीवादियों को भी मजदूरों
के बारे में सोचना पड़ा है। इतना सब होते हुए भी साम्यवाद की एक
जबर्दस्त प्रयोगशाला सोवियत रूस में जन-रोष का ऐसा विस्फोट हुआ कि वह
ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। पूर्वी जर्मनी की साम्यवादी
अर्थव्यवस्था जब वहां की जनता के स्वप्नों को साकार करने में असमर्थ
सिध्द हुई तो एक दिन की क्रान्ति में ही बर्लिन की विभाजनकारी दीवार
तोड़ दी गयी एवं पूर्वी जर्मनी पूंजीवादी पश्चिम जर्मनी में विलीन हो
गया।
1949 की जिस क्रान्ति के बाद चीन में लाल परचम
लहराया गया, उसी चीन में आज पूंजीवादियों का
स्वागत हो रहा है।
अभी कुछ दिनों पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.जी.
बालकृष्णन,
न्यायमूर्ति आर.वी. रवीन्द्रन एवं न्यायमूर्ति जे.
एम. पांचाल की पीठ ने एक गैर सरकारी संगठन की उस मांग को खारिज कर दिया
जिसमें चाहा गया था कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951
की धारा 29 ए (5)
से समाजवाद के प्रति निष्ठा की अनिवार्यता को
समाप्त कर दिया जाए। न्यायालय ने कहा कि समाजवाद को वामपंथ की सीमित
परिभाषा में रखकर नहीं देखना चाहिए, यह
(समाजवाद) लोकतंत्र का एक पहलू है जो आम लोगों की भलाई से जुड़ा है।
यहां प्रश्न किसी शब्द से प्यार या घृणा करने से नहीं है। प्रश्न है
किसी व्यवस्था से वांछित परिणाम निकल रहे हैं या नहीं। सरकार के माधयम
से कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के संबंध में पूर्व प्रधानमंत्री
राजीव गांधी की यह टिप्पणी याद रखने योग्य है कि जनहित के लिये जो एक
रुपया दिया जाता है उसमें से
15
पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। उन्होंने खुले रूप से
यह तो नहीं कहा कि शेष 85 पैसे बिचौलियों और
भ्रष्टाचारियों के हाथों में जाते हैं। लेकिन इससे यह तो स्पष्ट संकेत
मिलता ही है कि सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत कोई भी कार्य मंहगा और
विलंब से होता है। यह तथ्य बिना किसी विवाद के स्वीकार किया गया है कि
देश की सरकारी विकास योजनाओं के माधयम से अमीर ही अधिक लाभान्वित हुए
हैं और गरीब की गरीबी नहीं मिटी है। मंहगाई बढ़ी है,
बेरोजगारी बढ़ी है। अच्छी शिक्षा इतनी मंहगी हो गयी
है कि अब कभी कृष्ण और सुदामा किसी संदीपन गुरु की पाठशाला में एक साथ
बैठकर नहीं पढ़ सकेंगे क्योंकि अमीरों की पाठशाला ऐसी है जहां फीस बहुत
अधिक है और गरीबों की पाठशाला सरकारी या स्थानीय संस्था द्वारा संचालित
है जहां न योग्य शिक्षक हैं, छात्र-छात्रओं
के बैठने के लिये टाटा-पट्टियां भी नहीं हैं,
जहां वर्षों से भवन की मरम्मत भी न हुई है और ऐसी
स्थिति में वहां पढ़ने वाले सुदामाओं को न हिन्दी की वर्णमाला ठीक से
याद होगी और न वे साधारण से जोड़-बाकी के सवाल भी लगा सकेंगे। इसी
प्रकार अमीरों के अस्पताल अलग हैं और गरीबों के लिए वे सरकारी अस्पताल
हैं जहां दवाइयों का सदा अभाव रहता है और साथ ही अच्छे डाक्टरों की भी
कमी रहती है। देश में अपनाए गए समाजवाद में औद्योगिक प्रगति इतनी मंद
इसलिए थी कि उद्योगों के पैरों में सरकारी लालफीताशाही की मजबूत
बेड़ियां पड़ी हुई थीं। कहने का अर्थ यह है कि समाजवादी व्यवस्था में
जन-कल्याण के लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे थे।
स्थितियों की कड़वी सचाई को समझते हुए राजीव गांधी ने साहस जुटा कर
औद्योगिक विकास के लिये कुछ रिआयतें देना प्रारंभ किया और इसका
पूरा-पूरा लाभ उठाया प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने। उन्होंने
उदारीकरण्ा की ओर जोरदार कदम बढ़ाया।
31-1-1993
के टाइम्स आफ इंडिया के अनुसार श्री राव ने लगभग
400 वरिष्ठ नौकरशाहों को संबोधित करते हुए
कहा कि अब समाजवादी नारों का ढोंग समाप्त होना चाहिए क्योंकि इन नारों
की आड़ में साधन-सम्पन्न लोग ही अधिक धनी हुए हैं और समाज में विषमता की
खाई और चौड़ी हुई है। राव साहब के कार्यकाल में वर्तमान प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह ही केन्द्र में वित्तमंत्री थे। दोनों ने मिलकर देश के लिए
उदारीकरण पर आधारित जो औद्योगिक नीति बनायी वही आज भी प्रभावशील है। अब
विदेशी कंपनियां भारत में पूंजी लगाने आ रही हैं। यही नहीं,
भारतीय उद्योगपति अब विदेशों के उद्योगों का
अधिग्रहण करने का साहस जुटा रहे हैं। भारत अब विश्व अर्थव्यवस्था के
अन्तर्गत एक आर्थिक शक्ति बन रहा है। लेकिन दुख की बात यह है कि इस
आर्थिक चकाचौंध में गरीबों की बात करने वाला कोई नहीं। सभी को पूंजी
चाहिए, विकास चाहिए चाहे वह किसी भी कीमत पर
हो। पूंजी के स्वरूप को लेकर भारत के वामपंथी खेमे में भी खलबली मची
है। केरल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन ने बुध्ददेव
भट्टाचार्य और ज्योति बसु के पूंजीवाद के पोषक विचारों से असहमत होते
हुए बड़ी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और कार्ल माक्र्स की इस घोषण को
दोहराया है कि मेहनतकश मजदूरों के संघर्ष से पूंजीवाद का अंत होगा और
समाजवाद का झंडा गगन में लहराएगा। वाममोर्चे के घटक भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी के सचिव डी. राजा भी भड़के हुए हैं और पूंजीवाद को अपना शत्रु
मानते हैं। मोर्चे का अन्य घटक रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी भी
बुध्ददेव और ज्योति दा के वक्तव्यों को दुर्भाग्यपूर्ण मानता है। इस
पार्टी के नेता मानते हैं कि औद्योगिक विकास के लिए पूंजीवाद जरूरी
नहीं है।
स्वयं अपनी पार्टी और वाममोर्चे के वैचारिक अंतर्द्वंद को देखते हुए
माक्र्सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने अपनी प्रारंभिक चुप्पी
तोड़ते हुए ज्योति दा और बंगाल सरकार का बचाव यह कहते हुए किया है कि
राज्य सरकार की नीतियों के आलोचक यह गलत समझ रहे है कि हमने समाजवाद को
छोड़कर पूंजीवाद को गले लगा लिया है। करात के अनुसार भारत का संविधान
जैसा है उसमें हमारे अधिकार सीमित हैं। फिर भी हम मेहनतकश मजदूरों के
हितों की रक्षा कर रहे हैं। इसमें दो मत नहीं है कि पिछली शताब्दी में
लगभग 75
वर्षों तक (रूस की जारशाही के अंत से लेकर सोवियत
संघ के विघटन तक) समाजवादी/साम्यवादी विचारधारा ने संसार के उन तमाम
शोषितों को, जिनमें किसान और मजदूर प्रमुख
हैं, सम्मान के साथ जीने के अधिकार के लिए
लड़ने और सच का साथ देने की प्रेरणा और शक्ति दी। सच तो यह है कि
पूंजीवादी ताकतों ने आर्थिक विकास की जो चकाचौंध पैदा की वह समाजवाद और
साम्यवाद पर बहुत भारी पड़ी है। बदली हुयी परिस्थितियों में समाजवाद की
अवधारणा कैसे जीवित रहती है, यह एक पहेली
है। |