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अप्रैल,  2008

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राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें

भूख से मुक्ति अधिकार अभियान       

रोजगार गारंटी कानून का बुनियादी विचार क्या है?

इस कानून के पीछे जो बुनियादी सोच है, वह यह है कि जो कोई भी व्यक्ति मान्य न्यूनतम मजदूरी

दर पर अनियमित मजदूरी करने को तैयार हो, उसे रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाए। इस कानून के

तहत जो भी वयस्क काम पाने का आवेदन दे उसे पंद्रह दिन की अवधि में सार्वजनिक कार्यों पर काम

 पाने की हकदारी है। इस प्रकार रोजगार गारंटी कानून बुनियादी रोजगार का सार्वजनिक कानून द्वारा

 लागू किया जा सकने वाला अधिकार देता है। सम्मान के साथ जीने के बुनियादी अधिकार को कानून

द्वारा लागू करने की दिशा में यह एक कदम है।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून 2005, इन उद्देश्यों को किस हद तक हासिल करता है?

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून 2005 आधे मन से बनाया गया रोजगार गारंटी कानून है। इसके तहत कोई भी वयस्क जो काम का आवेदन करे, उसे आवेदन के बाद 15 दिन की अवधि में किसी सार्वजनिक कार्य पर काम पाने की हकदारी प्राप्त हुई है। परन्तु यह हकदारी सीमित है। उदाहरण के लिए काम की यह गारंटी केवल ग्रामीण इलाकों के लिए है और वहां भी 100 दिवस प्रति परिवार, प्रतिवर्ष तक सीमित की गई है। साथ ही 2005 में पारित कानून सजग नागरिकों द्वारा अगस्त 2004 में बनाए गए प्रारूप की तुलना में कई अर्थों में कमजोर है। पर कहने का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून बेकार है। यह सामाजिक सुरक्षा की दिशा में बढ़ने के लिए एक संभावित सीढ़ी भी है।

रोजगार गारंटी 'योजना' की जगह, रोजगार गारंटी 'कानून' का होना ही क्यों जरूरी है?

एक अधिनियम रोजगार की कानूनी गारंटी देता है। इससे राज्य पर अदालत द्वारा लागू किए जा सकने वाला दायित्व डाला गया है और मजदूरों को मोलतोल कर पाने की ताकत भी मिली है। दरअसल एक कानून राज्य को जवाबदेह बनाता है। इसके विपरीत योजना में कोई कानूनी हकदारी नहीं मिलती और मजदूर सरकारी अफसरों की दया पर निर्भर रह जाते हैं। इसके पूर्व भी रोजगार संबंधी तमाम योजनाएं बनी थीं- आश्वासित रोजगार योजना (इएएस), राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (एनआरईपी), जवाहर रोजगार योजना (जेआरवाय) संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (एसजीआरवाय), ऐसी ही योजनाओं में से कुछ है। ये सभी योजनाएं लोगों के जीवन में सुरक्षा की भावना पैदा करने में असफल रही। अक्सर लोगों को इन योजनाओं की कोई जानकारी तक नहीं होती है। एक योजना और एक कानून में एक और महत्वपूर्ण अंतर भी होता है। योजनाएं तो आती-जाती रहती हैं, पर कानून ज्यादा टिकाऊ होते हैं। अफसर योजनाओं में काट-छांट कर सकते हैं, चाहें तो उसे निरस्त भी कर सकते हैं, पर कानून बदलना हो तो संसद में संशोधन प्रस्ताव लाना पड़ता है। अत: जाहिर है कि रोजगार गारंटी कानून से मजदूरों को एक टिकाऊ कानूनी हकदारी मिलेगी। संभव है कि समय के साथ वे अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक होंगे और अपना हक पाने के लिए दावा करना भी सीखेंगे।

रोजगार गारंटी कानून के तहत काम पाने का हक किसे है?

गारंटी शब्द सभी वयस्कों को रोजगार पाने का हक देता है, अर्थात् यह सार्वजनिक है, सब पर लागू होता है। यह कानून आत्म-चयन के सिध्दान्त पर आधारित है: जो कोई न्यूनतम मजदूरी की दर पर अकुशल काम करने को तैयार हो, उसके लिए यह मान लिया जाएगा कि उसे दरअसल सार्वभौमिक सहयोग की जरूरत है और उसे मांगने पर रोजगार दिलवाया जाएगा। अगर कोई आपको यह कहे कि रोजगार गारंटी सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले परिवारों अर्थात बी.पी.एल. कार्डधारी परिवारों के लिए ही है तो उसका विश्वास करें।

किसी एक वर्ष के दौरान व्यक्ति को कितने दिनों का गारंटीशुदा काम मिलेगा क्या इसकी कोई सीमा है?

रोजगार की गारंटी '100 दिवस प्रति परिवार प्रति वर्ष' तक सीमित है। धयान दें कि यहां वर्ष का अर्थ है वित्तीय वर्ष। दूसरे शब्दों में कहें तो एक अप्रैल से हर एक परिवार का 100 दिनों का नया 'कोटा' शुरू होता है, जो आगामी 12 महीनों के लिए है। ध्यान दें कि 100 दिन के इस कोटे को परिवार के सभी वयस्क सदस्यों के बीच बांटा जा सकता है: मतलब अलग-अलग लोग, अलग-अलग दिन या एक साथ भी काम पर जा सकते हैं, बशर्ते कुल रोजगार एक वित्तीय वर्ष में