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परिदृश्य |
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नफरत
का
कारोबार
चले |
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प्रमोद
द्विवेदी |
यह
नफरत
ही
है
जो
बीच-बीच
में
पाकिस्तानियों
को
उकसाती
है
कि
लाहौर
में
बसंत
मनाने
पर
पाबंदी
लगे
क्योंकि
यह
हिंदुओं
यानी
काफिरों
की
परंपरा
है।
कभी
वे
नंगा
पर्वत
का
नाम
बदलने
की
मांग
करते
हैं
तो
कभी
उन
कूचों
का
जिनके
नाम
हिंदुवाने
लगते
हैं।
कुछ
साल
पहले
दिल्ली
में
एक
अफवाह
उड़ाई
गई
कि
सरकार
ने
बिहारियों
को
वापस
भेजने
के
लिए
स्पेशल
ट्रेनें
चलाई
हैं
और
इसका
कोई
टिकट
नहीं
होगा।
अफवाह
का
असर
यह
हुआ
कि
सचमुच
रोजाना
कई
लोग
स्टेशन
पहुंचने
लगे।
बाद
में
रेल
मंत्रलय
को
साफ
करना
पड़ा
कि
ऐसी
कोई
ट्रेन
नहीं
चली
है।
यह
सुर्रा
राजधानी
के
शरारती
लोगों
की
ओर
से
छेड़ा
गया
है।
खैर,
अफवाह
की
भी
एक
खात्मा-मियाद
यानी
एक्सपायरी
डेट
होती
है।
वह
खत्म
हो
गई
और
बिहारी
भी
भूल
गए
कि
यह
अफवाह
क्यों
उड़ी,
किसने
उड़ाई
और
इसके
पीछे
मंशा
क्या
थी?
लेकिन
समाज
की
रग-रग
पहचानने
वाले
विद्वजन
उस
सामाजिक
शरारत
और
उसके
जनकों
को
पहचानते
हैं।
दिल्ली
के
जिस
तबके
ने
मजे-मजे
में
यह
अफवाह
उड़ाई
थी
वह
किसी
से
छिपा
नहीं
है।
उनकी
चिंतित
भावनाओं
के
प्रतिनिधि
बीच-बीच
में
देश
को
बताते
रहते
हैं
कि
किनकी
वजह
से
सबेरे-सबेरे
राजधानी
की
सड़कों
से
गुजरने
पर
नागवार
मंजर
दिखता
है।
ये
बहिरागत
तो
श्वान-पुच्छ
की
तरह
कभी
न
सीधे
होने
वाले
जीव
हैं
और
वे
अपने
राज्यों
की
काहिली
की
सजा
देश
के
आला
शहर
को
देना
चाहते
हैं।
जाहिर
है,
अर्से
से
विलगाव
की
चौतरफा
मार
झेल
रहे
अपने
लोकतांत्रिक
देश
में
यह
गेस्टापो-शैली
का
अधुनातन
इलाकावाद
है।
क्षेत्रवादी
किसी
बाहरी
समुदाय
को
खदेड़ने
के
लिए
यदा-कदा
अपने
अफवाह-तंत्र
का
ऐसे
ही
इस्तेमाल
करते
आए
हैं।
जर्मनी
से
लेकर
युगांडा
तक
और
असम
से
लेकर
महाराष्ट्र
तक
इस
अफवाह-तंत्र
को
आजमाया
जा
चुका
है।
नाकाम
बुध्दिविलासियों
में
यह
बहस
कई
बार
उठती
है
कि
सांप्रदायिकता,
नस्लवाद,
जातिवाद,
भाषावाद,
क्षेत्रवाद
में
कौन
ज्यादा
मारक,
खतरनाक
या
प्रभावी
है।
इनमें
से
कौन
देशतोड़क
है?
कौन
इंसानियत
को
शर्मसार
करता
है?
एक
आम
मत
है
कि
राष्ट्रवादी
सोच
इन
रोगों
की
दवा
है।
कामरेड
मानते
हैं
कि
बाबा
माक्र्स
की
बूटी
इन
ओछे
वादों
को
उड़न-छू
कर
देती
है।
इनसे
भी
ऊपर
मानववाद
के
प्रवर्तक
कहते
हैं
कि
कोई
भी
मत
नफरत
का
प्रेत
नहीं
भगा
सकता।
इलाज
तो
हमारे
पास
है।
धर्म
के
ताजा
अवतारी
कहते
हैं
कि
हमारी
शरण
में
आ
जाओ,
सारा
बैर
मिट
जाएगा।
पर
क्या
वास्तव
में
कोई
यह
दावा
कर
सकता
है
कि
भारत
जैसे
जटिल
संरचनाओं
वाले
देश
में
घृणा
का
कारोबार
रोका
जा
सकता
है।
खासतौर
पर
ऐसे
दौर
में
जहां
घृणा
के
बिना
राजनैतिक
ताकत
नहीं
मिलती।
नफरत
के
सहारे
ही
मुस्लिम
लीग
से
लेकर
महाराष्ट्र
नवनिर्माण
सेना
की
बेल
फैलती
है।
क्यों
न
कहें
कि
घृणा
ही
किसी
समाज
को
दूसरे
के
खिलाफ
जगाने
की
अलार्म
घड़ी
है।
सर्वेश्वर
दयाल
सक्सेना
के
शब्दों
में-किसी
के
घर
की
आग
किसी
की
रोशनी
होती
है...तो
घृणा
की
यह
आग
ही
कई
सियासतबाजों
को
पुररोशन
करती
है।
यह
घृणा
ही
है
जो
भिंडरावाले,
मौलाना
अजहर
से
लेकर
किसी
राज
ठाकरे
को
जन्म
देती
है।
यह
घृणा
न
होती
तो
न
हिटलर
होता,
न
इदी
अमीन।
हम
युग
निर्माण
योजना
छाप
सूक्तियां
पढ़कर
घृणा
से
परहेज
करने
की
सोच
लें,
पर
घाघ
राजनेता
और
बेपीर
सत्ताधीश
जानते
हैं
कि
नफरत
के
कारोबार
के
बिना
नैय्या
कहां
पार
होती
है!
सद्भावना
से
सियासत
की
जाए
तो
देश
में
समस्याएं
ही
कहां
रह
जाएंगी।
फिर
सोमनाथ
से
लेकर
बाबरी
तक
को
कौन
याद
रखेगा।
भोजशाला
और
हुबली
की
लड़ाई
किस
काम
की
रह
जाएगी।
अज्ञेय
ने
लिखा
था,
वेदना
में
एक
शक्ति
है
जो
दृष्टि
देती
है।
मगर
सियासत
के
आखेटकों
के
लिए
यह
बात
यों
बदल
जाती
है:
घृणा
में
एक
शक्ति
है
जो
सत्ता
देती
है।
विचार
में
यह
नकार
भाव
आदर्शवादियों
को
नहीं
सुहाएगा।
पर
हकीकत
से
मुंह
कैसे
मोड़ा
जा
सकता
है।
सद्भावना
और
प्रगति
की
सियासत
की
बात
चले
तो
तुर्की
के
कमाल
आतातुर्क
को
कौन
नहीं
याद
करना
चाहेगा।
खबरें
बताती
हैं
कि
आज
एक
दकियानूसी
प्रकरण
के
कारण
तुर्की
में
उबाल
आया
है।
मगर
कमाल
के
जमाने
में
मुल्लाकट
दाढ़ी
पर
पाबंदी
लग
गई
पर
उनकी
कुर्सी
को
कुछ
नहीं
हुआ।
कमाल
नफरत
का
कारोबार
करने
वालों
के
खिलाफ
थे।
उन्होंने
सत्ता
के
लिए
ऐसे
लोगों
से
कोई
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