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अप्रैल,  2008

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परिदृश्य

लालू का धोखा

अरुण कुमार सिंह

पिछले चार साल से भी अधिक समय से यानि जब से लालू प्रसाद रेल मंत्री बने हैं तब से यह कहा जा रहा है कि रेल विभाग भारी मुनाफा कमा रहा है। अखबारों एवं टी.वी. चैनलों में भी बड़े-बड़े विज्ञापन देकर लालू प्रसाद को 'प्रबंधन गुरु' घोषित किया जा रहा है और यह भी कहा जा रहा है कि लालू के कुशल प्रबंधन से ही घाटे में चल रही रेल लाभ कमाने लगी है। एक विज्ञापन कम्पनी के माधयम से देश-विदेश में यह ढिंढोरा पीटा गया। इन विज्ञापनों से रेल विभाग को कितना लाभ हुआ, यह तो मंत्रलय ही बताएगा पर व्यक्तिगत रूप से लालू प्रसाद को कितना लाभ हुआ, यह हम सब जानते हैं।

भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद ने उन्हें अपने छात्रें को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित किया। यही नहीं अनेक देशों में प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले छात्रें को भी लालू जी ने नई दिल्ली बुलाया और उन्हें अपने तथाकथित 'प्रबंधन' से अवगत कराया। लालू के प्रबंधन की प्रशंसा सुन-सुनकर हम भी कई बार आश्चर्यचकित हुए। कई बार मेरे मन में प्रश्न उठा कि आखिर क्या कारण है कि लालू जी के रेल मंत्री बनते ही रेल लाभ की पटरी पर दौड़ने लगी? जिन लोगों ने बिहार में लालू-राबड़ी के शासन को देखा है उनके मन में ऐसा प्रश्न उठना स्वाभाविक था। यही लालू हैं जिनके शासन में बिहार सालों पीछे जा चुका है। मार्च, 1990 में लालू पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उस समय बिहार में सड़कों की स्थिति अच्छी थी, सरकारी कर्मचारियों, अधयापकों आदि नौकरी-पेशा लोगों को समय पर वेतन मिलता था। उच्च शिक्षा एवं शोध के लिए पर्याप्त राशि सरकार उपलब्ध कराती थी। किन्तु लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन काल में कर्मचारियों को साल-साल भर वेतन नहीं मिलता था। एकाध साल बाद मिलता भी था तो किश्तों में। सड़कों की हालत ऐसी हुई कि खेत और सड़क में कोई अन्तर ही नहीं रह गया। विश्वविद्यालयों में शोध कार्य ठप हो गया कानून-व्यवस्था का आलम यह था कि राजधानी पटना में भी शाम सात बजे के बाद सन्नाटा पसर जाता था। लालू-राबड़ी शासन से बिहार मुक्त हुआ और अब वहां बहुत कुछ बदल चुका है। कर्मचारियों को समय पर वेतन मिल रहा है, तीव्र गति से सड़कें बन रही हैं और उच्च शिक्षण संस्थानों में रौनक लौट आई है।

जिस लालू के नेतृत्व में बिहार अराजकता का नमूना बन गया था उन्हीं लालू के मंत्रित्व काल में रेल मुनाफा कैसे कमाने लगी? पिछले दिनों लालू जी ने रेल बजट प्रस्तुत करते हुए जिस प्रकार की घोषणाएं एवं दावे किए हैं, उनसे उपरोक्त सवाल पर फिर बहस छिड़ी हुई है। लालू प्रसाद द्वारा प्रस्तुत रेल बजट को धयान से पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यह बजट लालू का धोखा है, छलावा है, मायाजाल है, आंकड़ों की बाजीगरी है। रेल मंत्री बार-बार कह रहे हैं कि उन्होंने आम आदमी का ख्याल रखते हुए किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की है बल्कि कुछ घटाया ही है। पर असलियत यह है कि लालू के राज में रेल किराए में सबसे अधिक वृध्दि हुई है। यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने यात्रियों की जेबें काटी हैं। लालू से पहले जितने भी रेल मंत्री हुए उन लोगों ने आम आदमी का धयान रखते हुए किराए में मामूली वृध्दि अवश्य की। यह वृध्दि प्रति टिकट एक से तीन रुपए के बीच होती थी। किन्तु लालू जी ने सन् 2006 में एक साथ 20 रु. प्रति टिकट किराया बढ़ाया था। लगभग 200 रेल गाड़ियों को 'सुपर फास्ट' का दर्जा देकर प्रति टिकट 20 रु. 'सुपर फास्ट चार्ज' वसूला जा रहा है। उदाहरणस्वरूप मान लीजिए 2006 के आरंभ में दिल्ली से कोलकाता का किराया शयनयान श्रेणी में 500 रु. था। उस साल रेल बजट लागू होने के बाद वही किराया 520 रु. हो गया। एक ओर बजट प्रस्तुत करते समय यह घोषणा की गई कि किराया एक रुपए भी नहीं बढ़ाया, दूसरी ओर 'सुपर फास्ट चार्ज' के नाम पर यात्रियों को अचानक 20 रु. का भार दिया गया। लालू किस मुंह से आम आदमी को राहत देने की बात कर रहे हैं, वह समझ नहीं आती।

अब तत्काल सेवा को ही देख लीजिए इसका क्या हाल किया उन्होंने। इस सेवा का उद्देश्य था ऐसे लोगों को आरक्षण उपलब्ध कराना जिन्हें तत्काल कहीं जाना पड़े। इसलिए इसे 'तत्काल सेवा' नाम दिया गया है। पहले यह सेवा गाड़ी छूटने से 24 घंटे पहले प्रारंभ होती थी। सामान्य