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कहानी |
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खंडहर की आवाज |
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रामदरश मिश्र |
जब सुना कि पंडितजी सक्रिय राजनीति में कूद पड़े हैं,
तो लगा, किसी परम आत्मीय
ने आत्महत्या कर ली है और उसके खून के छींटे उसके अपने ही बनाए घर की
दीवारों पर फैल गए हैं। मैं आहत सोचता रहा,
उन्हें कैसे मना करूं, क्या लिखूं और जब तक
उन्हें कुछ लिखूं तब तक वे स्कूल छोड़कर राजनीति में पूरी तरह उतर चुके
थे।
बस
वहीं रुकी जहां स्कूल था। उतरते ही स्कूल को देखा तो देखता ही रह गया।
धांय,
धांय जलती दोपहरी,
रह-रहकर उठते
धूल
के बगूले, धूप में तपती हुई दीवारें...यह
खंडहर बनकर फैला हुआ स्कूल अपने समूचे विस्तार के साथ मुझमें पैठ जाना
चाहता था। इतने दिनों बाद गुजरने का अहसास अपने आप में अद्भुत था तिस
पर यह उजाड़...। एक अधगिरी दीवार की छांह में लेटा हुआ एक कुत्ता,
खंडहर के एक कोने में कुछ घास-फूस का ढेर,
जिसमें सरसराते हुए गिरगिट निकल जाते थे। न जाने
मुझे क्यों लगा कि अभी कहीं से कोई सांप निकलेगा और पूरे खंडहर पर एक
लकीर बनाता फिर लौट जाएगा। एक कोयल बोली पेड़ पर से। ओह,
यह तो वही नीम का पेड़ है जिसे मैंने और साथियों ने
लगाया था, इतना बड़ा हो गया है। मन खंडहर से
लौटकर इस पेड़ की छांह में धंस गया, सिर पर
पत्ता-पत्ता कांपने लगा। कोयल डाल पर से खंडहर की और उड़ चली,
पीछे-पीछे कांव-कांव का
स्वर सुनाई पड़ा। मेरी दृष्टि कोयल का पीछा करती हुई फिर खंडहर पर गिर
पड़ी, हवा का एक तेज झोंका आया। डाली-डाली
हहरा उठी। नीम का पेड़ और खंडहर दोनों एक-दूसरे में समाते-समाते समा गए
और लगा कि मैं इन दोनों से बनी एक दीवार मे चुन दिया गया हूं।
दूर से बाजों की आवाज आई,
ओह! मैं कब से यहां पागल-सा खड़ा हूं। मुझे होश आया
कि मैं खंडहर देखने नहीं, बारात करने आया
हूं। थोड़ी ही देर में बारात में पहुंच गया। एक अधेड़ उम्र की रंडी नाच
रही थी कूल्हे मटका-मटकाकर, आंखें
नचा-नचाकर। वियोग का कोई करुण गीत गा रही थी...एक और खंडहर...
'इस
गांव को पहचानते हैं?'
मैंने घूमकर सवाल करने वाले की ओर देखा,
वह मुस्करा रहा था।
'क्यों,
ऐसा
क्यों पूछा आपने?'
'वैसे
ही।'
वह
मुस्कराए जा रहा था। मैं उसकी ओर अजनबी सी निगाह से देखे जा रहा था।
'मेरा
नाम मन्नन है,
जब आप
यहां पढ़ते थे तब मैं सात-आठ साल का था। आपको याद होगा,
जब आप
लोग वालीबाल खेलते थे तो मुन्नू नाम का एक लड़का आकर गेंद यहां से वहां
किया करता था।'
वह अब
भी मुस्करा रहा था...'अरे
हां,
याद
आया,
तुम,
अरे
नहीं आप इतने बड़े हो गए।'
वह
मुस्करा रहा था,
और
कितना समय गुजर गया...कितना बड़ा अंतराल! लेकिन मुझे तो लगता है जैसे सब
कुछ कल ही घटा हो।
'आप
भूल गए न।'
'ओह,
नहीं-नहीं,
मैं
क्यों भूल गया। सच तो यह है कि यह सब कुछ मुझमें पहले जैसा अटा पड़ा है।'
उसकी
ओर केवल देखता रहा। आखिर मैं उसे अपनी यादों का क्या सबूत देता?
'इस
स्कूल से आप जैसे कितने लायक लोग निकले,
लेकिन
किसी ने फिर खोज-खबर नहीं ली।'
सचमुच ही किसी ने कुछ खोज-खबर नहीं ली,
मैं क्या उत्तर देता। मन भारी से भारी होता चला
गया। यह स्कूल कितनी बार मेरी यादों के भीतर उतरा है,
लेकिन मैंने क्या किया इसके लिए?...
कर भी क्या सकता था?
खानाबदोश की सी जिंदगी लिये नौकरी के साथ इस शहर से उस शहर घूमता रहा।
महानगरों ने इस स्कूल की स्मृति को सोख नहीं लिया,
यही क्या कम है?...हां,
मैं कर भी क्या सकता था।
वह
मेरी ओर उसी तरह मुस्कराता हुआ देखता रहा। मैं भीतर-भीतर खीज
गया...कमबख्त केवल मुस्कराता है। फिर कहा,
'भाई, हम लोग तो ठहरे
परदेशी, आप लोगों ने इस स्कूल को बनाया है,
इस जवार के बड़े आदमी हैं। इसे क्यों उजड़ जाने दिया?'
'नहीं,
उजड़
नहीं जाने दिया,
छप्पर
डालकर इसपर मिडिल स्कूल चला रहे हैं,
लेकिन
क्या कहा जाए उस आंधी को,
सब
उजाड़ गई।'
तो
वह स्कूल का खंडहर है,
मैं समझ रहा था कोई वहां घास-फूस रख गया है- तो एक
और खंडहर...
मन्नन एकाएक उठ गया। माफ करेंगे डाक्टर साहब,
बारात के खाने का वक्त हो गया है,
कुछ इंतजाम संभालूं...। रंडी थककर बैठ गई थी,
बार-बार पसीना पोंछ रही थी जैसे हवा में आवाज देकर
एक खंडहर चुप हो गया हो।
शाम हो गई। मैं धीरे-धीरे फिर खंडहर की और सरक गया। गर्म हवा खाली
खेतों और पेड़ों पर दिन भर सिर पटक-पटककर थक गई थी। चांदनी के प्रकाश
में खंडहर का एक-एक टुकड़ा तड़प रहा था। हवा उन्हें धीरे-धीरे छेड़ती बह
रही थी,
कभी-कभी कोई अंग झरझराता उठता था जैसे राख से ढकी
चिनगारी हवा से सिहर उठती है। एक-एक जगह मुझे अपने में बांधकर
स्मृतियां खेल रही थीं। सरपत खरका, चौंककर
देखा एक सांप चांदनी में चमकता निकल गया। ठीक यहीं पंडितजी का खाट
बिछता था, जिस पर वे बकैयां लेटे हुए हम
लोगों को पढ़ाने के लिए दो-दो बजे रात तक पुस्तक पढ़ते रहते थे।
पंडितजी...हवा का एक-एक तेज झोंका झहरा,
जैसे सारा खंडहर चिल्ला उठा हो-पंडितजी ई ई...ई...।
पंडितजी ने ही यह स्कूल स्थापित किया था। हम लोग यहां हिंदी विशेष
योग्यता की पढ़ाई करने आए थे। यह स्कूल नहीं था,
पंडितजी के सपने का रूप था। पंडितजी के व्यक्तित्व
से अलग इस स्कूल की कल्पना कभी मन में उभरी ही नहीं... आज भी नहीं उभर
रही है। स्कूल की गिरी ये दीवारें, यह फैला
हुआ मलबा, यह टूटा हुआ कुआं,
यह उजड़ा बगीचा, कोई भी
तो अकेला नहीं आता, सबके बीच में उभरते हैं
पंडितजी।
हां,
यह वही जगह है जहां पंडितजी का पलंग बिछा होता था,
जिस पर यहां-वहां अनेक पुस्तकें बिखरी होती थीं,
उनके बीच पंडितजी जागते रहते। तभी तो महज विशेष
योग्यता पास कर विशेष योग्यता की तैयारी कराते थे।
स्कूल हास्टल भी था,
दूर से आने वाले विद्यार्थी यहीं रहते थे। पंडितजी
एक गंभीर अध्यापक ही नहीं थे, गंभीर अभिभावक
भी थे। उनके वात्सल्य, उनकी प्रबंध-कुशलता,
उनकी न्यायप्रियता ने उन्हें पच्चीस वर्ष की अवस्था
में ही बहुत उत्तरदायी बना दिया था। पंडितजी का एक अलग रंग था,
जो मुझे फिर कहीं दिखाई नहीं पड़ता। यह रंग देहात की
जमीन से फूटकर उसी में समाहित हो रहा था। वह रंग समय की यात्र के साथ
मुझमें धीरे-धीरे घुलता गया। यही कारण है कि जब मैंने इतने वर्षों बाद
इस स्कूल को इस अवस्था में देखा तो मेरे भीतर का वह रंग लहराकर उभर उठा
और पूरे खंडहर में फैलकर तड़पने लगा।
हां,
शायद यही वह कमरा है जो सुबह-शाम चूल्हों के धुओं
से भर जाता था। सुबहें...शामें...कितने धुएं...कितने आंसू,
सुलगती गीली लकड़ियां और सबके बीच हाथ की बनाई
मोटी-मोटी सिंकती रोटियों की गंध, इन सबके
बीच पंडितजी। कोई अलसा गया या आपस में हाराहूंसी हो गई या आटा नहीं रहा,
चूल्हा उदास हो गया। बस पंडितजी चूल्हा सुलगाने बैठ
गए, कोई चूल्हा कभी उदास होने नहीं पया,
पंडितजी की आंच उसमें लपलपाती ही रही। उस आंच का
अहसास फिर कभी किसी शहर में नहीं हुआ।
शायद कोई चूहा है बिल्ली पीछा कर रही है...म्याऊं...रात के सन्नाटे में
खंडहर थरथरा उठता है... कितने दिनों से इन दोनों को पहचान रहा हूं।
और
यहीं-कहीं वह कमरा था जिसमें बैठकर पंडितजी पढ़ाया करते थे बिहारी के
दोहे,
हिंदी साहित्य का इतिहास,
अलंकार और न जाने क्या-क्या?
बिहारी को पढ़ाते समय पंडितजी बहुत गंभीर रहा करते
थे, किंतु उनकी आंखें रस से छलछला आती थीं।
कुछ बड़े-बड़े लड़के विभत्स ढंग से हंसते थे तो पंडितजी अपनी हलकी पतली
मूछों पर एक मुसकान बिखेरकर उन्हें देखते थे और फिर पास रखे डंडे से
एक-दो-तीन...। मैं सत्रह साल का किशोर समझ नहीं पाता था कि इन दोहों को
पढ़ाते समय ये लड़के क्यों हंसते थे और पंडितजी उन्हें क्यों मारते थे।
आज बिहारी के दोहों के नए-नए भाव-कोण उभरकर
आए हैं; किंतु वह भीतरी माहौल मन से कभी
नहीं गया, जो इस स्कूल से मिला था।
भरभराती बस रुक गई,
न जाने क्यों जी धक्क से हो गया। लगा कि मैं कुछ
सावधान हो गयापंडितजी बस से उतरकर आ रहे हैंलंबी-चौड़ी पहलवानी काया,
खद्दर का सफेद कुरता-पाजामा और टोपी,
पंप शू, हाथ में जड़ाऊ
मुठिया की एक छोटी सी छड़ी, सांवले चेहरे पर
छलकती मुसकान और पतले होठाें में दबा हुआ पान का बीड़ाहां पंडितजी आ रहे
हैं। खंडहर झनझना उठता हैपंडितजी...पंडितजी। आह,
कोई और है। क्या मैं पागल हो गया हूं! क्या मैं
नहीं जानता कि पंडितजी अब इस दुनिया में नहीं रहे। पंडितजी भी ऐसे ही
बस से उतरकर आया करते थे। वे केवल पंडितजी नहीं थे,
अपनी सीमा में अद्भुत शक्तिवाले व्यक्ति थे।
स्वाधीनता आंदोलन में जेल जा चुके थे। बड़े-बड़े नेताओं से उनका परिचय
था। वे प्राय: शहर जाया करते थे राजनीतिक और साहित्यिक समारोहों में
भाग लेने के लिए। कई बड़े-बड़े नेता और साहित्यकार इस छोटे से स्कूल में
आ चुके हैं। देहात के बहुत से अफसर भी पंडितजी के दोस्त थे,
जो प्राय: यहां रात को ठहरते थे और पंडितजी के साथ
बैडमिंटन और वालीबाल खेलते थे। वे नियमित मिलने आया करते थे,
कई बार पंडितजी उनके झगड़ों में पंच बनकर गए थे। मैं
सोचता हूं तो हैरान रह जाता हूं, इस देहाती
सीमा में इतना जागरूक व्यक्तित्व!
ऊ!
शायद कांटा पांव में चुभ गया हैभटकटैया और भड़भाड़ के इतने पौधे,
छोटे-छोटे बबूल के पेड़ भी उग आए हैं यही वह जगह है
जहां हम लोगों ने गुलाब के सैकड़ों पौधे लगा रखे थे। वसंत की हलकी-हलकी
सिहरती भोर में जब महुए के मद में डूबी कोयल किसी दिशा से कूक उठती थी
तब हलके-हलके अंधकार में उभरता यह गुलाबों का वन धीरे-धीरे लाल हो उठता
था। पंडितजी सुबह ही लालटेन को बुझाकर अपने मोटे स्वर में गा उठते
थेबनन में बागन में बगरो वसंत है...। फिर वे नहा-धोकर पूजा पर बैठ
जाते। मेरी डयूटी थी गुलाब के फूल तोड़कर लाने की। ढेर से फूल लाकर मैं
पंडितजी के आगे डाल देता। पंडितजी की आंखों में गुलाबों की छायाएं तैर
जातीं और मैं अपने कांटों की चुभन में गुलाबों की महक पिरोए अपनी
हथेलियां सूंघा करता। वह चुभन भरी महक धीरे-धीरे मेरे भीतर तक पैठ गई,
भिन गई है और यहीं शायद वह अखाड़ा था जहां शाम को
पंडितजी हम लोगों को लड़ाया करते थे। गुलाब की वाटिका और अखाड़ा दोनों
पास ही पास। मुझे हंसी आईअद्भुत संयोग,
लेकिन यह संयोग था दोनों का अपना-अपना रंग था।
एक
हवाई जहाज जा रहा है। लाल-लाल बत्तियां न जाने आकाश को कब तक कहां तक
चीरेंगी?
इलाहाबाद, बनारस,
बंबई, जयपुर,
दिल्ली न जाने कहां-कहां भटका हूं मैं। स्कूल छोड़ने
के बाद दो-तीन वर्षों के भीतर पंडितजी के दो-एक बार और दर्शन हुए थे,
फिर मेरी खानाबदोश जिंदगी लौटकर यहां नहीं आई।
जितना ही नहीं आया उतना ही उन्हें अपने भीतर पाता गया। इसके बाद तो
यहां-वहां से उनके समाचार भर मिलते रहे।
कई
वर्षों बाद जब मैंने सुना कि पंडितजी धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में उतर
रहे हैं तो न जाने कैसा लगा। पंडितजी की राजनीति में दिलचस्पी तो पहले
भी थी,
किंतु तब वह एक बौध्दिक व्यक्ति की राजनीतिक
जागरूकता तक सीमित थी और जागरूकता पंडितजी के प्रति सम्मान जगाती थी।
किंतु जब सुना कि वे सक्रिय राजनीति में कूद पड़े हैं,
तो लगा, किसी परम आत्मीय
ने आत्महत्या कर ली है और उसके खून के छींटे उसके अपने ही बनाए घर की
दीवारों पर फैल गए हैं। मैं आहत सोचता रहा,
उन्हें कैसे मना करूं, क्या लिखूं और जब तक
उन्हें कुछ लिखूं तब तक वे स्कूल छोड़कर राजनीति में पूरी तरह उतर चुके
थे। मुझे कैसा अनुभव हुआ नहीं कह सकता। कैसा लगा होगा जिस दिन पंडितजी
भरे-पूरे अपने ही स्कूल को छोड़कर चले गए होंगे?
ये सारे खड़े-खड़े कमरे,
ये चिरपरिचित दीवारें, ये चूल्हे,
ये फूल, यह प्ले ग्राउंड,
पुस्तकों की आवाजों से गूंजता हाल और बरामदे कैसे
लगे होंगे? चलते-चलते एक शरीर को छोड़कर
प्राण निकल जाए तो कैसा लगेगा?... यह क्या
हो गया प्रभु! क्या पंडितजी के अंतर्तम मे राजनीति की छलना सोई हुई थी
और यह सारा विद्या-व्यसन झूठा था, ऊपरी था।
नहीं, नहीं, मैं
यह नहीं झेल सकता। तो पंडितजी यह सम्मानजनक और उचित जीविका देनेवाला
पेशा छोड़कर राजनीति में क्यों गए? नहीं,
मेरा मन उन्हें क्षमा नहीं करेगा,
नहीं करेगा।
और
जब बहुत दिनों बाद यह सुना कि पंडितजी मजबूर होकर राजनीति में गए तो
मर्माहत रह गया। विशेष योग्यता का मूल्य धीरे-धीरे टूट गया,
लड़कों ने आना बंद कर दिया। यह समाचार पाकर मुझे
कितनी खुशी हुई। पंडितजी के प्रति जो आदर-भाव था,
वह आहत होने से बच गया;
लेकिन एक यातना-बोध से मैं ऐंठ सा गया। क्या इतने बड़े प्रतिभाशाली
व्यक्ति को शिक्षा के क्षेत्र में कोई जगह इसलिए नहीं मिल सकती कि वह
हाई स्कूल पास है। स्वतंत्र भारत में भी नहीं। मेरे सामने कितने ही
एम.ए., पी-एच.डी. की तस्वीरें तैर गई और
पंडितजी...।
थकावट सी महसूस हुई तो कुएं की जगत पर बैठ गया। इसे पंडितजी ने बनवाया
था। इसमें से कितना जल लिया था हम लोगों ने,
कितनी बार झांककर अपने को देखा था। मैंने फिर झांका,
ओह कहीं कुछ नहीं, कूड़ा
भरा हुआ है। कितनी आकृतियां इसके नीचे दबी हैं?
कोई पंछी पेड़ पर गाता-गाता पंख फड़फड़ाकर उड़ चला,
वह जा रहा है, अब नहीं
दिखता, दिशा में खो गया है,
उसके छूटे हुए गीत को थामे ऊपर का आकाश थरथरा रहा
है। मैं अब भी उसी ओर देख रहा हूं। पंडितजी भी अपने घर इधर को ही जाया
करते थे।
फिर कई वर्षों तक मैं घर की ओर नहीं आया। किसी की चिट्ठी आई थी कि
पंडितजी पूरी तरह राजनीति में उतर पड़े हैं समाजवादी दल ज्वाइन किया है।
पहले स्कूल क्षेत्र को केंद्र बनाकर स्थानीय चुनावों में उतरे। मोल्हू
से उनकी काफी गंदी प्रतिस्पध्र्दा चल रही है और स्वरूप कांग्रेसी उनका
कट्टर विरोधी हो गया है। चिट्ठी में अधिक कुछ नहीं था,
लेकिन मेरे अनुभव के लिए इतना काफी था। मेरे भीतर
एक चित्र उभरता चला गया
मोल्हू मुसहर पंडितजी के यहां आकर ज्ञान की बात सीखा करता था। उनका चरण
दबाया करता था। वह कांग्रेसी है,
राजनीति में पंडितजी का कट्टर प्रतियोगी बनकर उनका
विरोध कर रहा है। स्वरूप को पंडितजी ने पढ़ाया था,
वह भी कांग्रेसी नेता है,
पंडितजी का विरोध कर रहा है। ये दोनोें भरी सभाओं
में उन्हें ललकारते हैं, उनके विरुध्द
गंदी-गंदी बाते बकते फिरते हैं। मुझे लगा कि वे सारे अनपढ़ लोग,
जो पंडितजी के इर्दगिर्द चक्कर काटते थे,
अब उनके भाग्य विधायक बनकर उन पर शासन कर रहे हैं,
उनके दोष निकाल रहे हैं। मुझे अपने गांव का एक
दृश्य याद आया। संस्कृत के एक विद्वान (जो संस्कृत विद्यालय के
सम्मानित आचार्य भी थे) राजनीति में कूद पड़े। जो लोग उनका पांव छूते थे,
अब उनको ललकारने लगे। एक अपढ़ कांग्रेसी खाट पर लेटा
हुआ है और आचार्यजी घंटों उसके पैताने खड़े उससे सिफारिश कर रहे हैं कि
वह उनके पक्ष में अपना नाम वापस ले ले। आचार्यजी के चले जाने के बाद वह
मूर्ख झंडाबरदार और तरकारी वसूलनेवाला कांग्रेसी रिमार्क कसता
हैक़ैसे-कैसे मूर्ख लोग राजनीति में आ गए हैं?
ये क्या जानते हैं राजनीति में?
मैं इनके लिए चुनाव के मैदान से हट जाऊंगा?
एक
दिन मेरे एक सहपाठी मिल गए। उन्होने बताया कि पंडितजी ने कुछ रुपए
मांगे हैं। पहले तो विश्वास नहीं हुआ,
किंतु जब उन्होंने पत्र दिखाया तो मानना ही पड़ा।
मालूम हुआ कि पंडितजी पूर्णरूप से पराजित होकर स्कूल छोड़ गांव लौट गए
हैं। तो पंडितजी ने रुपए मांगे हैं। कोई बहुत बड़ी मजबूरी पंडितजी को
निगल रही है, नहीं तो क्या वह स्वाभिमानी
व्यक्तित्व अपने विद्यार्थियों से पैसे मांगता?
लेकिन पंडितजी ने मुझे क्यों नहीं लिखा?
क्या उन्हें मेरा पता नहीं मालूम?
नहीं जरूर मालूम होगा। तो मैं चिंता में डूब गया।
हां, पंडितजी मुझे नहीं लिख सकते थे। मैं
उनके इतना निकट था कि मुझसे पैसे की बात नहीं कर सकते थे ऌस संकट में
भी इतना स्वाभिमान। मुझे एक राहत की अनुभूति हुई। पंडितजी स्कूल से टूट
चुके हैं, राजनीति में हारकर अपनी थोड़ी सी
पुश्तैनी जमीन पर लौट चुके हैं, मौज-मस्ती
से रहनेवाले इस सशक्त व्यक्तित्व के ललाट पर कछार की जमीन की दरारें,
आंधी-पानी, सर्दी-गरमी
की रेखाएं उभर रही हैं, आंखों में एक
गहरी-गहरी काली परत बिछने लगी है, सिर पर
टूटे उदास मकान की छायाएं जमा होने लगी हैं। पंडितजी का वेश बदल चुका
है-एक मैली फटी धोती, कुर्ता तथा चमरौधा
जूता पहने, हाथ में लाठी लिए खेतों की
रखवाली कर रहे हैं, घास उखाड़ रहे हैं,
छांटी छांट रहे हैं,
दंवरी हांक रहे हैं, सिर पर बोझा ढो रहे हैं,
फिर आधा पेट खाकर सो जा रहे हैं।
गांव गया तो सुना कि पंडितजी कांग्रेसी हो गए हैं। जब मैंने पंडितजी की
अवस्था पर दु:ख व्यक्त किया तो एक सज्जन (जो पंडितजी के गांव के संबंधी
होने के कारण वहां जाया करते थे) बोले,
'अरे वाह रे तुम्हारे पंडितजी,
अरे अब तो उनकी चांदी-ही चांदी है,
कांग्रेसी बन गए हैं, अब
क्या? दुकान का कोटा मिल गया है,
गांव पटौती का ठेका भी। दोनों में रुपए झाड़ लिए हैं
तुम्हारे पंडितजी ने।' तो पंडितजी कांग्रेसी
हो ही गए। बहुत से समाजवादी ठोकरें खा-खाकर कांग्रेसी हो गए,
आखिर कहां तक टूटते?
कहां तक आदर्श को खाते-पीते? और कांग्रेस का
रास्ता तो पैसे की ओर जाता ही है। सो पंडितजी ने दुकान का कोटा पा लिया,
गांव की पटौती शुरू की। अब वे इंजीनियर के दरबार
में हाजिर होते होंगे, उससे सौदा करते होंगे,
दोस्तों के खेत पाटे जाते होंगे और गरीबों के घर
बाढ़ से बचाने के लिए मिट्टी मांगते होंगे,
नहीं पाते होंगे और बाढ़ अब भी उन्हें निगल जाती होगी। ओह,
मिट्टी का सौदा! नहीं,
पंडितजी ऐसा नहीं करते होंगे। मगर यह पैसा...नहीं-नहीं पैसा मिट्टी का
सौदा किए बिना नहीं आ सकता, अपने गांव में
यही दृश्य तो देखा है।
मैं गिरते-गिरते बचा। एक गडे हुए पत्थर के टुकड़े से टकरा गया था।
नहीं-नहीं,
उस पत्थर ने मुझे पकड़ लिया था। यही वह पत्थर है जिस
पर बैठकर कई दिन तक रमेश रोता रहा। पंडितजी ने उससे बोलना छोड़ दिया था।
रमेश मेरा मित्र था, इसलिए मैं भी बहुत
दु:खी था। एक दिन रमेश अपना बोरिया-बिस्तर संभाले पंडितजी के सामने आकर
खड़ा हो गया । पंडितजी ने उसे देखा, कुछ देर
देखते रहे और फिर भर्राए गले से बोले, 'तो
तुम जा रहे हो? ठीक है,
जाओ, सुखी रहो।'
पंडितजी ने आंखें फेर लीं,
शायद भर आई थीं। मुझे बुलाया,
मैं तो वहीं आस-पास खड़ा था-'जी
पंडितजी!' पंडितजी ने मुझे देखा। आंसुओं को
पी जाने के कारण्ा आंखें लाल हो गई थीं। बोले, 'तुम
भी मुझे गलत समझते हो, तुमने भी कभी नहीें
पूछा कि मैं तुम्हारे मित्र से क्यों नहीं बोलता।'
मैं जिज्ञासा से पंडितजी की ओर मात्र देख रहा था।
'सुनो', वे बोले,
'यह रमू है न, एक दिन
जगनी से छेड़खानी कर रहा था, मैं तब तक गांव
से आ गया...। मैंने मुड़कर देखा तो रमेश वहां से सरक गया था। यह बरतन
मांजनेवाली नौकरानी से छेड़खानी कर रहा था,
है कुछ-कुछ बिगड़ैल तबियत का। इच्छा हुई लौटकर रमेश के बच्चे को
थप्पड़-ही-थप्पड़ जड़ दूं। उससे कह दो |