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विविधा |
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गुलामी
का नया रूप |
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अमान अहमद |
आज देश के अधिकांश लोग खान-पान और जीवन शैली के मामले में उन्हीं
अंग्रेजों की नकल कर रहे हैं जिन्होंने सदियों
तक हमें गुलाम बनाए रखा। देश की कई परंपराएं इसी नकलची मानसिकता के
कारण दम तोड़ रही हैं। ऐसा कहा जाता है कि संस्कृतियों का मिलन अपने साथ
खुशनुमा अहसास लाता है लेकिन हिन्दुस्तान में तो नतीजा इसके उलट ही दिख
रहा है।
भारत को आजाद हुए साठ साल हो गए हैं। इस कालखंड में देश ने कई मामलों
में काफी तरक्की की लेकिन हमारी मानसिकता बहुत ज्यादा नहीं बदली है।
कहने को को तो हम आजाद हैं लेकिन सच यही है कि हम आज भी गुलाम है। आज
देश के अधिकांश लोग खान-पान और जीवन शैली के मामले में उन्हीं
अंग्रेजों की नकल कर रहे हैं जिन्होंने सदियाें तक हमें गुलाम बनाए
रखा। देश की कई परंपराएं इसी नकलची मानसिकता के कारण दम तोड़ रही हैं।
ऐसा कहा जाता है कि संस्कृतियों का मिलन अपने साथ खुशनुमा अहसास लाती
है लेकिन हिन्दुस्तान में तो नतीजा इसके उलट ही दिख रहा है।
पहले जब भारत में बच्चा पैदा होता था तो बचपन में मिट्टी के खिलौनों से
वह खेलता था। पर अब बच्चों को बार्बी डॉल चाहिए। पहले लोग बड़े चाव से
दाल-रोटी,
पराठे, दही आदि खाते थे।
बाहर जाने की हालत में घर वाले हिदायत देते थे कि बाहर का कुछ नहीं
खाना। पर अब तो हम सपरिवार पूरी योजना के साथ मैक्डोनाल्ड में जाकर
पिज्जा-बर्गर तोड़ते हैं। पहले हम पहनते थे कुरता-पैजामा,
पतलून-बुशर्ट या खादी पर अब चाहिए जिंस और वो भी
लिवाइस, ली और किलर जैसे ब्रांडों की। सही
मायने में आज लोगों को कलम से लेकर कमीज और जूते से लेकर चश्में तक सब
विदेशी और ब्रांडेड चाहिए। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह कि जो
जितना अधिक ऐसे चीजों का प्रयोग करता है,
समाज उसे उतना ही ज्यादा रसूखदार मानने लगा है। अब्बा या पिता जी कब
डैड और अम्मी या माता जी मौम बनी, पता ही
नहीं चला। ऐसे में दादा जी भला पीछे क्यों रहें। वे भी ग्रैंड पा और
दादी जी बन गईं ग्रैनी। बड़े भईया बिग बी बन गए। इन बदलावों को एक वर्ग
आधुनिकता मानता है। पहले लोग घर जाते थे शाम को सात बजे और पूरा परिवार
एक साथ बैठकर खाना खाता था। पर आज ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो घर जाते
हैं सुबह के दो या तीन बजे और खाना खाते हैं अपनी गर्लप्रफेंड के साथ
रेस्टोरेंट में।
'वैलेंटाइन
डे'
नाम
के एक भूत ने तो जैसे युवाओं के सोचने और समझने पर ही ताला लगा दिया
है। वैसे तो प्रेम का त्योहार,
भारतीय संस्कृति में कभी अछूता नहीं रहा है। सालों पहले से ही भारत में
प्यार का यह त्योहार वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। पर हम
ठहरे माडर्न लोग पुराने तौर-तरीके कैसे अपना सकते हैं और अगर अपना भी
लें तो पुराने खयालात वाले रूढ़िवादी लोग करार दिए जाने का खतरा है।
इसके अलावा देश में और भी कई
'डे'
बाजार
की ताकत के सहारे लोगों से मनवाए जा रहे हैं। किस डे,
प्रफेंडशिप डे,
रोज
डे,
चाकलेट डे,
मदर्स
डे,
फादर्स डे जैसे सैकड़ों मौके बाजार ने गढ़ लिए हैं। पर वैलेंटाइन डे तो
सारे डे का चचा है। इस दिन,
प्यार
करने वाले प्रेमी युगल एक दूसरे को महंगे तोहफे देते हैं। सच कहें तो
जो जितना महंगा तोहफा देगा वह उतना ही बड़ा प्रेमी। उस दिन गुलाब के फूल
का भाव आसमान छू रहा होता है। इस दिन कार्डों का आदान-प्रदान भी थोक
में होता है। पहले भी भारत में बधाई पत्र या बधाई संदेशों का चलन था।
पर अब चलते हैं ग्रीटिंग कार्ड और वह भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाें के
हिसाब से। दाम कम होने के बावजूद लोग देशी कम्पनियों के कार्ड को कम
ही खरीदते हैं। क्योंकि यह भी ब्रांड का मामला है। हम क्यों नहीं समझते
कि वो चाहे कोई भी दिन हो,
वर्ष
हो,
सप्ताह हो या माह हो,
वह
प्रेम के लिए ही है। किस धर्म में या किस देश के संविधान में लिखा है
कि प्यार करने के लिए कोई एक दिन ही निश्चित किया जाना चाहिए,
इसके
अलावा कोई और दिन प्यार नहीं करेंगे। दरअसल,
अंग्रेज इतने ज्यादा व्यस्त होते हैं कि उनको एक दिन मुकर्रर करना पड़ता
है प्यार करने के लिए। वैसे अग्रेजों को ही सिर्फ दोष क्यों दिया जाए।
हम हिन्दुस्तानी इतने भोले हैं कि अग्रेजों की ढकोसलेबाजी को अब तक
नहीं समझ पाए। पहले अग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से हमें
अपना गुलाम बना लिया था। पर अब युग बदल गया है तो तौर-तरीके भी बदले
हैं। आज एक बार फिर हम गुलाम हैं,
फर्क
बस इतना है कि पहले अंग्रेजों को भारत आना पड़ा था हमें गुलाम बनाने के
लिए पर अब वे बिना आए ही हमें गुलाम
बना
रहे हैं। पहले उनका मूल मंत्र था लड़ाओ और राज करो पर अब उनका मूल मंत्र
है, 'ऐसी
आदत डाल दो कि भारतीय हर चीज के लिए उन पर निर्भर हो जाएं।'
इस
साजिश को समय रहते समझना होगा। कहीं हमें यह न कहना पड़े कि अब पछताए
होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
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