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अप्रैल,  2008

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गरीब देश के सफेद हाथी

मधु काबरा

आजादी पश्चात राष्ट्रपति भवन में तब्दील हुए वायसराय के विशाल एवं भव्य भवन को गांधीजी ने अस्पताल बनाने का सुझाव दिया था। मगर गरीबी में पैदा हुए देश के नेताओं को भी सरकारी खर्चे की भव्यता अधिक प्रिय लगी। इसलिए गांधीजी केवल फोटो की हद तक याद रहे और देश के कर्णधार जनता का धन पानी की तरह बहाते रहे।

 

गुजराती के एक लेखक एक बार स्वीडन गए। वहां बस में उन्होंने देखा कि एक यात्री के आने पर बस कंडक्टर ने टोपी उतारकर उसका अभिवादन किया। उस लेखक को कौतुक हुआ कि केवल एक यात्री के लिए कंडक्टर ने ऐसा क्यों किया? पूछने पर पता चला कि वह व्यक्ति वहां का राजा था जो इसी तरह बस में यात्र किया करता है। दूसरा उदाहरण उस देश के प्रधानमंत्री को साईकल से पार्लियामेंट जाते देखकर मिल गया। वाकई यह मिसाल प्रेरणादायी है।

आजादी पश्चात राष्ट्रपति भवन में तब्दील हुए वायसराय के विशाल एवं भव्य भवन को गांधीजी ने अस्पताल बनाने का सुझाव दिया था। मगर गरीबी में पैदा हुए देश के नेताओं को भी सरकारी खर्चे की भव्यता अधिक प्रिय लगी। इसलिए गांधीजी केवल फोटो की हद तक याद रहे और देश के कर्णधार जनता का धन पानी की तरह बहाते रहे। एक उत्कृष्ट उदाहरण मुंबई राज्य का है जिसमें तब गुजरात और महाराष्ट्र दोनों शामिल थे। 1936 और 1947 के चुनाव के पश्चात  बी.जी. खैर मुख्यमंत्री बने। वे मुंबई के उपनगर खार में रहते थे। उन्होंने अपना निवास खार में ही रखा और प्रतिदिन लोकल टे्रन द्वारा चर्चगेट जाते थे और वहां से पांच मिनट के पैदल रास्ते पर सचिवालय था। वे सुबह-शाम स्टेशन से मुख्यमंत्री कार्यालय पैदल जाते थे। वे मोटर कार का उपयोग केवल सरकारी काम के लिए किया करते थे। उनकी दृष्टि में सरकारी साधन जनता के टैक्स द्वारा आते हैं, इसलिए जनता का धन अपनी सुविधा या ऐश्वर्य की खातिर बर्बाद नहीं करना चाहिए। ऐसे ही 1977 में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उनके लिए चार्टर्ड विमान हाजिर था परन्तु वे उसका उपयोग कभी-कभी ही किया करते थे, बाकी यात्रएं उन्होंने यात्री विमान से कीं।

हाल में राष्ट्रपति बनी प्रतिभा पाटिल के बारे में तीन खबरें पढ़ने को मिलीं। उनका निजी निवास जो अमरावती में है, उसका सरकारी खर्चे (लाखों में) से नवीनीकरण किया गया। उसमें राष्ट्रपति निवास के अनुरूप सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। प्रश्न यह है कि बतौर राष्ट्रपति तो उन्हें राष्ट्रपति भवन रहने को मिला ही है। फिर यह निजी खर्च जनता के पैसे पर क्यों? दूसरा समाचार यह कि राष्ट्रपति महोदया को अपने शहर अमरावती आने के लिए चार सौ करोड़ रुपए के खर्च से एयरपोर्ट तैयार किया जाएगा। प्रश्न यह है कि ऐसी अधिकृत यात्रएं कितनी होंगी? फिर उसके लिए इतना बड़ा खर्च करना कितना वाजिब है? वैसे उनके परिजन जब भी अमरावती जाएं तो उनके आने-जाने की विशेष सुविधा एवं सुरक्षा आदि सरकारी खर्चे से करने की व्यवस्था पहले ही की गई है।

नीलम संजीवा रेड्डी ने राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात अपने गांव आंध्र प्रदेश के अनंतपुर के निवास को लाखों के सरकारी खर्चे से सुसज्जित कराया। उसमें कुछ समय रहने के बाद उन्होंने आग्रह किया कि मेरा मन यहां नहीं लगता, इसलिए मेरी व्यवस्था बैंगलोर में की जाए और देश की सरकार ने वह व्यवस्था (हमारे-आपके खर्चे से) करवा दी। ऐसा ही देश के  राष्ट्रपति रहे शंकरदयाल शर्मा ने भी किया था। वे भोपाल के रहने वाले थे इसलिए सेवानिवृत्ति के पश्चात वहां का बंगला तो सुशोभित कराया ही परन्तु आग्रह कि मैं रहूंगा दिल्ली में इसलिये वहां अलग से व्यवस्था करवाई। एस. वेंकटरामन, ज्ञानी जैल सिंह, फखरूद्दीन अहमद भी इसी कतार में शामिल हैं। हाल ही में राष्ट्रपति एवं राज्यपालों का वेतन दुगना कर दिया गया है। अब राष्ट्रपति का वेतन एक लाख रुपया प्रतिमाह है और इसके अलावा राष्ट्रपति भवन में करीब 300 शाही ठाट-बाट वाले कमरे हैं। इसी तरह राज्यपाल का पद है, जो वैधाानिक कार्यों के नाम पर पार्टी हितों की रक्षा के लिये ही बना है। गरीब देश की प्रजा के माथे राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद केवल शोभा के हैं जिसका खर्च करोड़ों में है। अन्य देशों में उनका वैधानिक उपयोग होता है पर हमारे यहां तो ये सभी सफेद हाथी की तरह हैं।

 उत्तर प्रदेश के एक राज्यपाल रोमेश भण्डारी पद पर थोड़े समय रहे, परन्तु अपने निवास में स्वीमिंग पूल और टेनिस कोर्ट जैसी सुविधाओं पर कई लाख रुपए खर्च करवा दिए। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल कृष्णकान्त कभी समाजवादी युवा तुर्क कहलाते थे। उन्हें देश का उपराष्ट्रपति बनाया गया। उपराष्ट्रपति का बंगला पूर्णतया सुसज्जित था फिर भी उन्हाेंने करीब एक करोड़ के खर्चे से उसमें नई सजावट करवाई। एक किस्सा 1950 का है। देश के प्रथम गवर्नर जनरल राजाजी जब सेवानिवृत्त हुए तो अखबारों में लेख छपा कि उनके रहने का निवास इतना छोटा है कि उसमें आगंतुकों को बैठाने की व्यवस्था तक नहीं है। उनके लिए उचित फर्नीचर भी नहीं है। पर वे महापुरुष उसी व्यवस्था में रहे। दो साल बाद राजाजी मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री बने तो सचिवालय और विधानसभा तक साईकल या रिक्शा से जाते थे। कार नहीं लेते हुए उन्होंने कहा था कि मुझे रिक्शा की आदत है।

वहीं दूसरी तरफ देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जिस तीनमूर्ति भवन में रहते थे उसका परिसर कई एकड़ में था। वैसे भी वे जब तक रहे, उनके शाही ठाट-बाट  पर रोजाना तीस हजार रुपए (उस जमाने में) का  खर्च होता रहा। स्वर्गवासी हुए तो वह प्रधानमंत्री का अधिकृत निवास स्मारक बना दिया गया और एक गलत मिसाल कायम की गई। उनके बाद लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। पद पर रहते हुए जब वे स्वर्गवासी हुए तो उनकी पत्नी एवं परिवार ने उस बंगले को स्मारक में बदल कर कब्जा बनाए रखा। वही लोग शास्त्रीजी की सादगी और ईमानदारी की मिसालें देते नहीं अघाते। इसके बाद नेहरूजी की पुत्री इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। वे रहती थीं एक बंगले में मगर सुरक्षा की दृष्टि से दूसरा बंगला भी खाली करवाकर उससे जोड़ दिया गया। उनकी मृत्यु के पश्चात दोनो बंगलों को स्मारक बना दिया गया। खुद को पिछड़ी जमात का नेता कहने वाले जगजीवन राम एवं कथित किसान नेता चरण सिंह के परिजनों ने भी उनके निवास को स्मारक में बदल दिया। यहां प्रश्न यह है कि जिस इंग्लैंड की लोकशाही का दंभी अनुकरण हम कर रहे है, वहां के प्रधानमंत्री पदमुक्त होते ही दूसरे दिन सरकारी निवास और तमाम सुविधाओं को छोड़ कर नियमानुसार पेन्शन पर निजी निवास में चले जाते हैं। उनके लिए इससे अधिक की व्यवस्था नहीं होती। तो फिर अपने देश में ऐसा क्यों?

गरीब मास्टर के बेटे और संघ के स्वयंसेवक रहे अटल बिहारी वाजपेयी जब देश के प्रधानमंत्री बने तो उनकी शान-शौकत राजा-महाराजाओं से भी कई गुना अधिक रही। अपने दोनों पैरों के घुटने बदलवाने के लिए उन्होंने अमेरिका से डाक्टर बुलाए और करोड़ों में खर्चा हुआ। बाकी उदाहरणों में ज्ञानी जैल सिंह, नीलम संजीव रेड्डी आदि  भी हैं जो पद पर बैठते ही अपने दिल के इलाज के लिए अमेरिका गए। देश के हर राज्य का अपना विमान है जिसका उपयोग वहां का मुख्यमंत्री मनमाने ढंग से करते हैं।  मायावती ने हाल ही में करोड़ों का बंगला दिल्ली में बनवाया है। उन पर भ्रष्टाचार के केस भी चल रहे हैं मगर इस बार सावधानी रखते हुए उन्होंने कहा है कि मेरी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 10/20 रुपयों का चंदा दिया है और उससे यह महल बना है। जिस पार्टी के सदस्य 10/20 रुपए देनेवाले गरीब हाें उनकी मेहनत की कमाई से करोड़ों का बंगला? क्या उनका इससे बड़ा कोई और शोषण हो सकेगा? बहनजी ने पद प्राप्त करते ही शहराें के नाम बदले? जगह-जगह भीमराव अंबेडकर, कांशीराम या खुद की मूर्तियां खड़ी करवा रही हैं। कोई पूछे कि इससे उन पिछड़े गरीबों को क्या लाभ होगा? देश के हर शहर और गांव में कितनी ही मूर्तियां खड़ी हो चुकी हैं। मायावती जीतेजी स्वयं की मूर्तियां भी लगवा रही हैं। मुख्यमंत्री पद के कारण जगह-जगह रैलियां कर रही हैं। सवाल यह है कि इतना धन कहां से आता है? हाल ही में बहन मायावती ने राज्य के दो विमानों के रहते हुए तीसरा विमान अपने उपयोग हेतु खरीदा। इस तरह गरीब राज्य के करोड़ाें रुपया बरबाद हुए। और तो और मायावती ने अपना 52 वां जन्म दिन पूरे तामझाम के साथ करोड़ों रुपए के सरकारी खर्चे से मनाया। इन नेताओं को देखकर यह नहीं लगता कि देश से राजशाही चली गयी है।

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