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भारतगाथा |
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कृष्ण: क्या था
उनके जीवन का उद्देश्य |
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सूर्यकांत बाली |
सवाल है कि कृष्ण के जीवन का क्या लक्ष्य था?
ऐसा कौन सा उद्देश्य था जिसको पाने के लिए कृष्ण
आजीवन इतने सारे काम करते रहे? वे क्या पाना
चाहते थे? इतने सारे कामों के जरिए वे क्या
करना चाहते थे?
कृष्ण को समझ पाना खुद में एक विकट समस्या है। पौराणिकों द्वारा विष्णु
के दस या चौबीस जितने भी अवतार माने गए हैं उनमें किसी को कलावतार तो
कुछ को अंशावतार माना गया है। यहां तक कि राम को विष्णु का तीन चौथाई
माना गया है। यानी विष्णु की सोलह कलाएं मानी गई हैं तो राम को बारह
कलाओं का स्वामी माना गया है। वाल्मीकि तो राम को विष्णु का अर्धांश ही
मानते हैं- विष्णोरर्ध महाभाग:। पर कृष्ण को पूण्र्ाावतार माना गया है।
उनकी सोलह कलाएं मानी गई हैं। परम्परा उन्हें स्वयं भगवान मानती
है-कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। नाम पर जाइए तो आपको कृष्ण के जितने नाम
मिलेंगे,
उतने शायद ही किसी अवतार के मिलें। राम को मां
कौसल्या, पिता दशरथ और वंश रघुकुल आदि के
कारण मिले नामों को अलग कर दें तो उनका स्वतंत्र प्रसिध्द नाम बस एक ही
मिलेगा-पुरुषोत्तम या मर्यादापुरुषोत्तम। पर कृष्ण के पास नामों का
अंबार लगा है। गिरिधर, गोपाल,
गोविन्द, मुरारी,
केशी, केशव,
नटवर, योगेश्वर और न
जाने कितने। संस्कृत के एक कवि को तो कृष्ण के इतने सारे नामों ने इतना
मोह लिया कि एक वस्तु या व्यक्ति के अनेक नामों को रूपायित करने वाले
उल्लेख अलंकार के उदाहरण के लिए एक श्लोक में कृष्ण के नामों की झड़ी
लगा दी। सहस्रनाम शिव का भी है और कोई कवि जोर आजमाइश पर उतर ही आए तो
राम जैसे महागंभीर नायक का भी सहस्रनाम पूरा कर देगा। पर जो विविधता,
खूबसूरती और संगीतात्मकता कृष्ण के सहस्रनाम में है
वह कहीं और कहां? उसे भक्तों ने सीधे-सीधे
विष्णुसहस्रनाम ही कह डाला है। रोज जप करेंगे तो (भौतिक) फायदे मिलेंगे,
यह लालच भी दे दिया है। क्यों?
कृष्ण को खुद भगवान जो मान लिया गया है।
नामों की ऐसी विविधता क्यों?
जाहिर है इसलिए कि कृष्ण ने इतने सारे चमत्कारी काम
कर दिए कि उनमें से हरेक काम कृष्ण को नया नाम दे गया। काम तो राम ने
भी किए। ताड़का का वध कर दिया। अहिल्या की पाषाणमूर्ति में जान डाल दी।
शिव का धनुष तोड़ दिया। इसके बाद राम के जीवन में एक चमत्कार तब घटा जब
उन्होंने अकेले ही खर-दूषण समेत बारह हजार सैनिक मार डाले। पर जब इसकी
तुलना इस तथ्य से करें कि महाभारत युध्द में अकेले भीष्म रोज दस हजार
सैनिकों का वध दस दिन तक करते रहे तो राम के चमत्कार को नमस्कार करने
को फिर मन नहीं करता। युध्द में लक्ष्मण को जिलाने का श्रेय राम को
नहीं, हनुमान को है। अगर विभीषण अमृत कुम्भ
का रहस्य न खोलता तो पता नहीं रावण का वध कब होता,
होता या न होता, या
अचानक पेट में बाण लग जाने से हो ही जाता। पर राम ने जितने भी चमत्कार
किए, रहीम के इस दोहे के हिसाब से किए कि
'देनहार कोई और है, भेजत
है दिन रैन, लोग भरम हम पे करें,
तातें नीचे नैन।' यानी
राम ने हर काम इतनी गंभीरता से किया कि मानो कह रहे हों कि अरे,
इसमें मेरा क्या बड़प्पन है। वजनी शिव धनुष हाथोंहाथ
उठा कर साध लिया तो इस अन्दाज में कि बूढ़ा,
पुराना, जीण्र्[1]ा
धनुष था, उठा लिया तो कौन सा अजब कर डाला?
पर
कृष्ण के जन्म से लेकर निर्वाण तक न जाने कितने कामों का चमत्कारी
सम्पादन हुआ है। काम भी कितने अलग तरह के और हर काम कितने रंग-बिरंगे
तरीके से,
मानो कह रहे हों कि देखा,
यह कर डाला है मैंने। एक नाटकीयकता,
एक चुस्ती, एक चित्रकर्म
हर काम के साथ जुड़ा है। तय कर लिया कि आज शिशुपाल को मारना है तो कहा
कि शिशुपाल, अपने हिस्से के माफीशुदा अपराध
पूरे कर लो, निकाल लो गालियां,
कर लो मेरा अपमान। पर जैसे ही अपराधों की संख्या
पूरी हुई, अपने सुदर्शन चक्र से उसका काम
तमाम कर दिया।
कृष्ण के हर चमत्कार का छबीलापन लाजवाब है। जन्म हुआ तो कारागार में।
पता नहीं कैसे अचूक योजना बना रखी थी राजा नंद और उनके यादवों ने कि
जेल में पैदा लड़के को निकाल गोकुल गांव तक पहुंचाना और वहां यशोदा की
सद्योजाता कन्या को जेल में जच्चा देवकी के पास पहुंचा देना- हर काम
फुलप्रूफ तरीके से हो गया। इसके बाद आती है नाटकीयता से भरे चमत्कारों
की झड़ी। पूतना को मारा। उसके स्तनों पर पुते जहर को चूस कर। जहर क्या
चूसा,
उसकी सारी ऊर्जा चूस ली और निष्प्राण कर डाला। मां
ने ऊखल से बांधा तो ऊखल समेत घिसटते-घिसटते दो पेड़ों में उसे फंसा कर
पेड़ ही जड़ से उखाड़ डाले। बकासुर को उसके बगुले के रूप में चीरकर मार
डाला तो अघासुर को उसके अजगर आकार में खुद को गले में फंसा कर निर्जीव
कर दिया। गधे के रूप में आए धेनुकासुर को उसकी दुलत्ती से आसमान में
उछालकर मारा और कालिय नाग के फणों पर अपनी बांसुरी की धुन पर
नाचते-नाचते उसे नियंत्रित कर लिया। कृष्ण के बाल्यकाल का सबसे अद्भुत
काम गोवर्धन धारण करना रहा जिसके बहाने उन्होंने इन्द्र की पूजा बंद
करवा कर पहाड़ को अपनाने को पाठ पढ़ाया।
यहां थोड़ा रुकना जरूरी है। हम पर आरोप लग सकता है कि हम लोगों की
भावनाओं का लाभ उठा कर कृष्ण के बाल्य चमत्कारों का वर्णन कर रहे हैं।
पर यह कैसे हो सकता है?
अगर कृष्ण का विश्लेषण करना है तो उनके उसी जीवन पर
नजर डालनी होगी जो हमें किताबों में मिलता है। कृष्ण हुए या नहीं हुए,
वे इतिहासनायक हैं या हमारी कल्पना के स्वामी,
ये सारे सवाल व्यर्थ के हैं। वे इतिहासपुरुष थे और
जाहिर है कि वे हमारी कल्पना के सभी पोरों में मूर्ति बन कर पिघल चुके
हैं। पोर-पोर भर चुका है। इसलिए जैसी तस्वीर कृष्ण की मिलती है उसी को
उलटफेर कर टटोलना-पहचानना होगा। कहां है दूसरा ऐसा नायक जो कृष्ण का
पासंग भी ठहरता हो? इसलिए कुरेदने के अलावा
दूसरा कोई चारा नहीं है।
किशोर कृष्ण के जीवन में दो चीजें घटीं। दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं।
एक रास,
दूसरा कंस वध। रास में एक कृष्ण गोपियों के साथ खेल
रहे हैं। कामक्रीड़ा और रास लीला में जो महान फर्क है,
हो सकता है उसी बिना पर गोपियों के साथ कृष्ण के
संबंधों की व्याख्या हो सकती हो। रास में अनेक गोपियों के साथ एक ही
कृष्ण है। पर महारास में एक-एक गोपी के साथ एक-एक कृष्ण हैं। इसके
दर्शनिक भागवत विवेचन में डूबने की यहां हमारी कोई मंशा नहीं है। पर
संबंधों की तीव्रता और घनता की ये अलग-अलग कोटियां या स्तर हैं। राधा
के साथ उनके रिश्तों का आयाम ही अलग है। ठीक इसी रास-महारास को बीच में
छोड़ कृष्ण मथुरा जाकर कंस का वध करते हैं। बाधा दौड़ जीतने के अंदाज में
वे पहले चाणूर और मुष्टिक नामक दो पहलवानों को ठिकाने लगाकर फिर कंस को
बालों से खींच कर सिंहासन से गिराकर भरी सभा में उसका वध कर देते हैं।
महाभारत वाले कृष्ण से परिचय से पहले द्वापर के हमारे ये महानायक कई
शादियां रचाते हैं। जरासन्ध के डर के मारे मथुरा छोड़ द्वारिका पलायन
करने के आसपास कृष्ण रुक्मिणी, सत्यभामा,
जांबवंती, कालिन्दी,
मित्रविन्दा, सत्या,
भद्रा और लक्ष्मण्ा से शादियां रचाते नजर आते हैं।
बाद के आलोचकों को कृष्ण के गोपी व रासप्रसंगों और इन आठ शादियों पर
इतना मजा आया कि उन्हाेंने उनकी सोलह हजार पत्नियों की कहानियां सुनानी
शुरू कर दीं। पर उनकी विशिष्ट पत्नियां दो ही रहीं-रुक्मिणी और
सत्यभामा। इनमें से भी रुक्मिणी का स्थान सर्वोपरि है।
अब
शुरू होती है महाभारत की स्पर्धा। जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों कृष्ण
से युध्द में सहायता लेने के लिए आए तो कृष्ण ने अपनी पूरी नाटकीयता के
साथ अर्जुन को चुनने का पहला मौका इसलिए दिया कि वह उनके पैरों की और
बैठा था और नींद खुलते ही कृष्ण ने पहले उसे देखा था। पर इससे पहले
जरासन्ध वध,
शिशुपाल वध, चीरहरण के
समय के प्रसंग घट चुके थे। जब लगा कि युध्द लगभग अनिवार्य है तो कृष्ण
ने एक आखिरी कोशिश दुर्योधन को समझाने की की। पर दुर्योधन ने कृष्ण को
गिरफ्तार कर लेना चाहा तो कृष्ण ने उसे अपनी शक्ति दिखा दी और साफ बच
निकले। युध्द में कृष्ण ने हथियार न उठाने और सिर्फ अर्जुन का
सारथिकर्म करने की प्रतिज्ञा की थी। पर जब लगा कि अर्जुन भीष्म को
मारने में हिचकिचा रहा है तो फिर वे खुद टूटे रथ का पहिया उठाकर भीष्म
को मारने दौड़े। अर्जुन उनके पांव पड़ उन्हें लौटा लाए। फिर कृष्ण ने ही
पाण्डवों को सलाह दी कि खुद भीष्म से उनके मरने का तरीका पूछा जाए।
वैसा हुआ और शिखण्डी की मदद से भीष्म को मार दिया गया। द्रोण को मारने
के लिए कृष्ण ने ही युधिष्ठिर जैसे गौछाप आदमी से 'नरो
व कुंजरों वा' कहलवाया। जयद्रथ को अर्जुन के
हाथों मरवाने के लिए कृष्ण ने ही सूर्यास्त का नाटक करवाया। रथ के धंसे
पहिए को निकालने में व्यस्त कर्ण को मारने में अर्जुन कुछ संकोच कर रहा
था। उसे कृष्ण ने ही निस्संकोच किया और कर्ण का सिर धड़ से अलग करवाया।
इससे पहले घटोत्कच पर कर्ण की शक्ति चलवा कर कर्ण को कमजोर कर अर्जुन
को बचाने की नीति कृष्ण ने रची। दुर्योधन की जांघ पर गदा मार कर अपनी
प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए कृष्ण ने ही भीम को उकसाया।
ये
सब काम कृष्ण ने किए। अब हमारा सवाल वहां जा खड़ा होता है जहां पहुंचने
के लिए हम इतनी देर से कृष्ण के पंचरंगी और सप्तलयी जीवन का खाका खींचे
चले जा रहे हैं। सवाल है कि कृष्ण के जीवन का क्या लक्ष्य था?
ऐसा कौन सा उद्देश्य था जिसको पाने के लिए कृष्ण
आजीवन इतने सारे काम करते रहे? वे क्या पाना
चाहते थे? इतने सारे कामों के जरिए वे क्या
कर दिखाना चाहते थे?
सवाल इसलिए उठता है कि जितने भी देवरूप हैं,
जो विष्णु के अवतार कहे गए हैं,
सबके साथ कोई न कोई स्पष्ट लक्ष्य जुड़ा है। ब्रह्मा,
विष्णु और शिव को क्रमश: जन्म,
विकास और विनाश का दायित्व हमारे मिथककारों ने सौंप
रखा है। वराहावतार का उद्देश्य रसातल में डूबी पृथ्वी का उध्दार करना
था। कच्छपावतार ने समुद्र मन्थन का दायित्व निभाया। परशुराम दुष्ट
क्षत्रियों को मारते घूमते रहे। राम के जीवन को पढ़ जाएं तो संबंधों और
राजकाज का आदर्श रूप उनके कामों के माध्यम
से स्थापित होता नजर आता है। महात्मा बुध्द ने वैदिक यज्ञों में बढ़ती
हिंसा की समाप्ति की। शंकर ने बौध्द धर्म से उत्पन्न आलस्य और
नैर्ष्कम्य को फिर से अद्वैत के आदर्श से स्थानापन्न कर जीवन में
यथार्थ की दार्शनिक प्रतिष्ठा की। पर कृष्ण क्या करना चाह रहे थे?
कृष्ण राजा नहीं बने। उन्होंने राज्य नहीं जीता।
कोई बड़ी लड़ाई उन्होंने नहीं जीती। कोई बड़ा साम्राज्य उन्होंने खड़ा नहीं
किया। पाण्डवों को राज्य दिलाना उनके जीवन का चरम लक्ष्य नजर नहीं आता।
जितने राजा और राक्षसों का उन्होंने वध किया या करवाया,
उनमें से किसी से उनकी व्यक्तिगत शत्रुता नहीं थी।
किसी वध का कोई लाभ उन्हें नहीं मिला। वे सारा जीवन सारा भारत,
विशेषकर पश्चिमोत्तर भारत घूमते रहे। हमेशा कुछ
करते रहे। पूरे परिदृश्य पर वे छाए रहे। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में
उनकी अग्रपूजा हुई, यानी अपने युग के
सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति माने गए। वे जहां गए,
अपनी छाप छोड़ आए। पर इन सबसे उनका कौन सा लक्ष्य सधा,
उन्हें क्या मिला? वे
अकेले, जंगल में पेड़ की छाया में उसके तने
से पीठ टिका कर चुपचाप बैठे थे और एक शिकारी के बाण से उनकी मृत्यु हो
गई। यानी अंत समय उनके पास न राज्य था, न
परिवार, न कोई छोटी-बड़ी वस्तु। फिर किसलिए,
क्या पाने के लिए वे ताजिन्दगी चलते-करते रहे?
वे लक्ष्यहीन नहीं थे। क्या कोई लक्ष्यहीन व्यक्ति
इतना सक्रिय होता है, इतना लोकप्रिय और
प्रभावशाली होता है? यहां तक कि सारे देश
में, योध्दाओं और सम्राटों से भरे तब के
भारतवर्ष में सिर्फ उन्हें अग्रपूजा के लायक माना गया। क्या लक्ष्यहीन
व्यक्ति इतना सम्मान पा सकता है? पूर्णावतार
माना जा सकता है? यानी वे लक्ष्यहीन नहीं थे,
तो क्या था उद्देश्य।
कृष्ण ने गीता में एक जगह बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। अपने अवतार
का उद्देश्य बताते हुए एक जगह कहते हैं कि जब-जब धर्म की ग्लानि होती
है और अधर्म का अभ्युत्थान होता है,
तब-तब मैं खुद को इस धरती पर प्रकट करता हूं। इसके
मुताबिक तो कृष्ण के जीवन का लक्ष्य धर्म की स्थापना करना होना चाहिए।
इसलिए सवाल है कि किस तरह के या कौन से धर्म की स्थापना कृष्ण ने अपने
जीवन में की? इस पर विचार अगले अंक में। |