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इस
समय सबसे ज्वलंत प्रश्न यही है कि क्या मनमोहन सरकार गिर
जाएगी? और गिर गई तो देश की राजनीति किधर जाएगी?
परमाणु-समझौते का क्या होगा? भारत की विदेश नीति पर उसका
क्या असर पड़ेगा? भारतीय विदेश नीति के इतिहास में शायद यह
पहला मौका है जब संसद साफ-साफ दो हिस्सों में बंट गई है। यह
मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री
अब हमारे राजदूत भी मैदान में कूद पड़े हैं।
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कांग्रेस पार्टी को सरकार भंग होने की उतनी चिंता नहीं
है, जितनी समझौता भंग होने की है। संसद का विश्वास खो
देने को वह तैयार है, लेकिन वह बुश प्रशासन का विश्वास
खोने को तैयार नहीं है। |
अपने
वाव्फ-संयम और राजनयिक मर्यादा के लिए विख्यात वाशिंगटन
स्थित हमारे राजदूत रोनैन सेन ने भी भारतीय राजनेताओं पर
अपनी बेलगाम टिप्पणी से सरकार की स्थिति बहुत विकट बना दी
है। लगता है कि परमाणु समझौते के मुद्दे पर सरकार अंदर से
हिल गई है। सरकार के गिरने का अंदेशा इसलिए बढ़ गया है कि
वामपंथियों द्वारा निकाला गया मधयम मार्ग भी सरकार के गले
नहीं उतर रहा है। हाल ही में अनेक टीवी चैनलों ने प्रचार कर
दिया था कि अमेरिका के साथ हो रहे परमाणु-समझौते पर विचार
करने के लिए सरकार एक कमेटी बैठा रही है। कमेटी का मतलब भी
होता है, टालू मिक्शचर। किसी भी मसले को टालना हो तो उसे
कमेटी के हवाले कर दीजिए। आप जब चाहें और जैसा चाहें, वैसा
फैसला कमेटी कर देगी, लेकिन कांग्रेस पार्टी इस पर राजी नहीं
दिखाई पड़ती। कहा जा रहा है कि हमारी इस चालाकी को अमेरिकी
समझ जाएंगे और समझौता भंग हो जाएगा। भारत सरकार की
विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी। यानी कांग्रेस पार्टी को
सरकार भंग होने की उतनी चिंता नहीं है, जितनी समझौता भंग
होने की है। संसद का विश्वास खो देने को वह तैयार है, लेकिन
वह बुश प्रशासन का विश्वास खोने को तैयार नहीं है।
क्या
ऐसा इसलिए है कि हमारे कम्युनिस्टों को कांग्रेस केवल कागजी
शेर समझती है? उन्हें क्या उसने जबानी जमा-खर्च वाला
दुकानदार मान रखा है? यदि हां तो ऐसा लगता है कि इस बार
कांग्रेस पार्टी धोखा खा जाएगी। कम्युनिस्ट इतने आगे बढ़ गए
हैं कि अब वे पीछे नहीं लौट सकते। अगर लौटेंगे तो खाई में
गिरेंगे। अब तक भारतीय कम्युनिस्ट गाहे-ब-गाहे नेहरू और
इंदिरा के हाथ के खिलौने बनते रहे, लेकिन वे मनमोहन सिंह को
इतनी छूट नहीं देंगे। यहां सवाल उनके जानी दुश्मन का है।
अमेरिका का है। अमेरिका ने कार्ल माक्र्स को दफना दिया।
सोवियत संघ को भंग करवा दिया। चीन को पूंजीवाद का पथिक बना
दिया और दुनिया के कम्युनिस्टों की कमर तोड़ने के लिए बड़ी से
बड़ी तिकड़में कीं। ऐसे अमेरिका के साथ, उस सरकार को वे कोई
समझौता क्यों करने देंगे जो उनके सहारे पर टिकी हुई है। इस
समझौते में अनेक छेद हैं। अगर नहीं होते तो भी कम्युनिस्ट
इसका विरोध जरूर करते।
फिर
भी मानना पड़ेगा कि इस सारे मामले में भारत के कम्युनिस्ट
काफी संजीदा ढंग से काम कर रहे हैं। मनमोहन सिंह की उत्तोजक
टिप्पणी के बावजूद उन्होंने बीच का रास्ता निकाला है। यह
कहना गलत है कि भारत-अमेरिकी परमाणु समझौता या तो तुरंत
संपन्न होगा या वह भंग हो जाएगा। यह जरूरी नहीं कि
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण की सितंबर में होने वाली
बैठक में भारत-वेंफद्रित विशेष प्रोटोकाल पर दस्तखत होने ही
चाहिए। क्यों होने चाहिए? भारत सरकार ने क्या लिखित में ऐेसा
कोई वायदा किया है? क्या समझौते के मूलपाठ में ऐसी कोई शर्त
है? नहीं है। आईएईए के साथ प्रोटोकाल की यह बात चाहे जितनी
देर बाद शुरू की जा सकती है और चाहे जितनी लंबी खिंची जा
सकती है। इसी प्रकार 'परमाणु सप्लायर्स क्लब' के 46 सदस्यों
का अधिवेशन मई 2008 में होगा। भारत के लिए वे जल्दबाजी क्यों
करेंगे और भारत उन्हें जल्दबाजी के लिए क्यों ठेले? भारत अगर
चाहे तो वह उसे मई 2008 के आगे भी खिसका सकता है। इन दो
शर्तों के पूरा हुए बिना इस समझौते पर दस्तखत नहीं होंगे। इन
दोनों शर्तों को पूरा करवाने की प्रक्रिया इतनी लंबी खिंच
सकती है कि भारत अमेरिका, दोनों देशों में चुनाव का समय आ
जाए। तब तक सरकार बनी रहे और समझौता भी अधर में लटका रहे।
इस
बीच यह भी संभव है कि अमेरिका की सीनेट ही इस समझौते को रद्द
कर दे। भारत सरकार के सुयोग्य अफसरों ने पिछले दो वर्षों में
एड़ी-चोटी का जोर लगाकर ऐसे-ऐसे शब्द इस समझौते में घुसवा दिए
हैं जिनसे अमेरिकी संसद (कांग्रेस)के कानूनों का स्पष्ट
उल्लंघन होता है। कांग्रेस अपने राष्ट्रपति का यों तो काफी
सम्मान करती है, लेकिन कई बार राष्ट्रपति की ही पार्टी का
बहुमत होने के बावजूद वह राष्ट्रपति द्वारा की गई संधियों को
रद्द कर देती है। राष्ट्रपति रूजवेल्ट राष्ट्रसंघ के मामले
में और राष्ट्रपति क्लिंटन सीटीबीटी के मामले में पहले ही
मात खा चुके हैं। बुश के मात खाने की संभावना अब इसलिए भी
ज्यादा हो गई है क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों
में विरोधी दल (डेमोव्रेफटिक पार्टी) का बहुमत हो गया है।
इसके अलावा दिसंबर 2006 में अमेरिकी कांग्रेस ने 'हाइड एक्ट'
इसलिए पास किया था कि कहीं भारत के तेज-तर्रार अफसर
बुश-प्रशासन को बुध्दू न बना जाएं। भारत के प्रधानमंत्री के
लिए 'हाटड एक्ट' सबसे सुरक्षित गली है। उस गली में फंसते ही
यह समझौता अपने आप दम तोड़ देगा। वे बड़बोले बनकर अपनी सरकार
क्यों गिरवाना चाहते हैं?
यदि
सरकार गिर गई तो कांग्रेस और वामपंथियों को बराबरी का नुकसान
होगा। दोनों एक-दूसरे को देशद्रोही सिद्ध
करेंगे। वामपंथी लोगों को बताएंगे कि मनमोहन सिंह कैसे भारत
की संप्रभुता को अमेरिका के हाथों गिरवी रख रहे थे और
कांग्रेसी गड़े मुर्दे उखाड़ेंगे और बताएंगे कि कम्युनिस्टों
की नीति ही है, भारत का विरोध करना और रूस और चीन के हितों
के लिए लड़ मरना। इस गृहयुद्ध
का लाभ भाजपा और तीसरे मोर्चे को मिलेगा। कांग्रेस-गठबंधन की
पार्टियां रस्सा तुड़ाकर भागेंगी। वे या तो तीसरे मोर्चे में
जाएंगी या भाजपा से हाथ मिलाएंगी। आम जनता को यह समझना असंभव
होगा कि कांग्रेस ने अपनी सरकार क्यों गिराई? पता नहीं
कांग्रेस पर कौन-सा भूत सवार हो गया है? वह बैठे-ठाले
आत्महत्या को निमंत्रण क्यों दे रही है? वह चाहे तो अमेरिकी
कांग्रेस की तरह भारतीय संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों और
समझौतों की पुष्टि का अधिकार भी दिलवा सकती है। इस संवैधानिक
संशोधन के लिए सभी दल तैयार हो जाएंगे। इस संशोधन के तहत अगर
यह समझौता रद्द हो जाता है तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी
नहीं टूटेगी। जैसे रूजवेल्ट और क्लिंटन को इस्तीफा नहीं देना
पड़ा, वैसे ही मनमोहन सरकार भी बच जाएगी।
यदि
गुस्से में आकर डा. मनमोहन सिंह खुद इस्तीफा दे दें तो उससे
भी कोई हल निकलने वाला नहीं है। सोनिया गांधी को मनमोहन सिंह
जी की तरह भरोसेमंद आदमी ढूंढना मुश्किल हो जाएगा। अब वे
प्रतिभा पाटिल को भी प्रधानमंत्री नहीं बना सकतीं। जो भी नया
प्रधानमंत्री बनेगा, वह 'लंगड़ी बत्ताख' ही माना जाएगा।
अमेरिका के साथ किया जा रहा यह समझौता क्या इतना फायदेमंद है
कि इसके लिए सरकार गिरा दी जानी चाहिए? इस समझौते के न होने
पर कुछ फायदों से भारत वंचित जरूर हो जाएगा, लेकिन इसके होने
पर भारत का कितना नुकसान होगा, इसकी कल्पना कांग्रेस-नेतृत्व
को अवश्य करनी चाहिए।
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