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अगस्त 2007

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क्यों हुआ हाल बेहाल

भारतीय पक्ष ब्यूरो

  Sahakarita Andolan

सहकारिता आर्थिक संगठन का एक रूप है। भारत में सदियों से चली आ रही संयुक्त परिवार प्रणाली को भी सहकारिता के सिध्दांतों पर ही आधारित माना जाता है। लेकिन जब देश में पश्चिमी सभ्यता ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिये तो देश में सहकारिता के स्थान पर व्यक्तिवाद का उदय होने लगा। परिणामत: सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा की भावना बलवती होने लगी।  किसानों एवं गरीब लोगों की स्थिति पर भी उसका असर साफ नजर आने लगा। इसके बाद पुराने मूल्यों की ओर लौटना जरूरी हो गया था। इसी को धयान में रखते हुए सहकारिता को आजमाया गया। निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रें की आर्थिक प्रणालियों में पाए जाने वाले दोषों का निवारण् करने का उपाय ही सहकारिता है। सहकारिता इन दोनों के मधय की स्थिति है। जहां एक साधन रहित व्यक्ति अपना विकास सहकारिता के माधयम से कर सकता है।

शुगर कोआपरेटिव सोसायटियों की संरचना कुछ इस तरह से है कि लाभ तो सदस्यों में बांट दिया जाता है, लेकिन हानि का बोझ सरकार पर डाल दिया जाता है। जिसका फायदा मिल मालिक बखूबी उठाते हैं और संस्थान को घाटे में दिखाकर जहां एक ओर सदस्यों को उन्हें मिलने वाले प्रतिफल से वंचित कर दिया जाता है, वहीं सरकार से हानि की भरपाई करने के लिए अनुदान भी मिल जाता है।

सहकारिता के मूल में व्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक प्रबंधन, सदस्यों का आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक उत्थान, स्वावलंबन एवं परस्पर सहयोग की भावना निहित है। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि राजनीति, धर्म एवं जाति के प्रभाव से तटस्थता बनाई जाए। सहकारिता में इन कारकों के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

लेकिन, सहकारिता के वर्तमान स्वरूप पर यदि नजर दौड़ाएं तो क्या यह कहा जा सकता है कि सहकारिता का मूल स्वरूप एवं सिध्दांत आज भी जीवित हैं! जवाब निश्चित तौर पर ना में ही होगा। हाल ही में महाराष्ट्र के जलगांव स्थित प्रतिभा महिला सहकारी बैंक और मुक्ताबाई सहकारी चीनी मिल के प्रकरण ने सहकारिता के कलुषित होते स्वरूप को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। वर्तमान समय में कोआपरेटिव सोसायटियों के कामकाज में राजनीतिक घुसपैठ सहकारिता के मूल स्वरूप पर मंडराते एक बड़े खतरे के रूप में सामने आया है। इस खतरे ने हमें एक बार फिर से चेताया है कि किस तरह से प्रभावशाली लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इन जनसंस्थाओं पर तानाशाही पूर्वक कब्जा कर जनता को उनके अधिकारों से बेदखल करने का काम किया है। महाराष्ट्र में शरद पवार और गोपीनाथ मुंडे जैसे राजनीतिज्ञ चीनी कोआपरेटिव मिलों के जरिए राजनीति चमकाने वालों में जाने जाते हैं। 1973 में स्थापित प्रतिभा महिला सहकारी बैंक में अधयक्ष के सगे संबंधियों को ही पदों की बंदरबांट कर दी गई। यहां तक कि आरक्षित पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों की भी उपेक्षा की गई और धड़ल्ले से संबंधियों एवं करीबी लोगों को ट्टण प्रदान किया गया। 1995 में रिजर्व बैंक ने इस सहकारी बैंक को कमजोर बैंकों की सूची में डाल दिया। लेकिन हद तो तब हो गई जब इसी बैंक के अधयक्ष की पहल पर ही स्थापित मुक्ताबाई कोआपरेटिव चीनी मिल के शेयर खरीदने लिए प्रतिभा महिला सहकारी बैंक से ही ट्टण दिया जाने लगा और अंतत: बैंक दिवालियेपन के कगार पर पहुंच गया। यह वर्तमान सहकारिता के स्वरूप का ही एक हिस्सा है। आखिर उन गरीब महिलाओं का क्या होगा, जो अपनी बेटी की शादी या फिर बुढ़ापे के लिए अपनी गाढ़ी कमाई को इस तरह के सहकारी बैंकों में जमा कराती हैं। क्या अपने सदस्यों के प्रति इन संस्थानों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? ऐसी स्थिति देश के सभी हिस्सों में है।

एक समय था सहकारिता के कारण महाराष्ट्र के किसानों को एक नई दिशा मिली थी और उनके लिए तरक्की की राह प्रशस्त हो सकी थी। लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार के कारण बड़ी जोत वाले किसानों का दबदबा सहकारी मिलों पर बढ़ता चला गया और इस तरह से मिलों के नियंत्रत्मक ढांचे में बदलाव आने लगे। अब आम सदस्य किसानों के अधिकार धूमिल होने लगे थे। शुगर फैक्ट्रियों में गवर्निंग बाडी चुनावों में धन महत्वपूर्ण कारक बनता जा रहा था और धनाढय एवं शक्तिशाली किसान अधयक्ष एवं उपाधयक्ष जैसे पदों को हथियाने लगे थे। जबकि बहुसंख्यक किसान छोटी जोतों वाले गरीब लोग थे। 1996 में महाराष्ट्र स्थित 15 सदस्यों वाली संगमनेर फैक्ट्री के गवर्निंग बाडी चुनावों में एस. तानपुरे ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। फैक्ट्री में करीब 14 हजार सदस्य ऐसे थे जिनकी जोतें बहुत छोटी थी। तानपुरे भी उन्हीं में से एक था। तानपुरे न केवल चुनाव हार गया, बल्कि उसे प्रबंधकों के गुस्से का शिकार भी बनना पड़ा। उसको सबक सिखाने के लिए उसके खेतों से गन्ने को खरीदने से मना कर दिया गया। अगर नियंत्रत्मक ढांचे को कोई सदस्य प्रभावित करने का प्रयास करता है तो उसे इसी तरह से परेशान किया जाता है। पानी एवं बिजली के कनेक्शन कटवा दिये जाते हैं, क्रेडिट रोक दिया जाता है या फिर गन्ने की खरीद में टाल-मटोल की जाती है। कई स्थानों पर तो किसानों को वाजिब मूल्य नहीं मिल पाने से गुड़ बनाने वाले अन्य व्यापारियों को गन्ना बेचना पड़ता है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसे में इस तरह के कोआपरेटिव संस्थानों की क्या  प्रासंगिकता रह जाती है जो अपने सदस्यों के कल्याण के लिए कार्य नहीं कर रहे हों? एक अधिकारिक सूत्र के मुताबिक महाराष्ट्र में कोई भी ऐसा कोआपरेटिव नहीं है, जिस पर राजनीति एवं राजनीतिज्ञों का नियंत्रण न हो। वे बताते हैं कि महाराष्ट्र की 5 प्रतिशत चीनी मिलों पर भारतीय जनता पार्टी और 95 प्रतिशत पर कांग्रेस का कब्जा है। जिसमें से 60 प्रतिशत अब सिर्फ राष्ट्रवादी कांग्रेस के हिस्से में आती हैं।

हालांकि महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आज भी बहुधा ऐसे लोग मिल जाते हैं जो सहकारिता के गुणगान की डींगे हांकते नहीं थकते। लेकिन हकीकत तो ये है कि इसके लिए राज्य के खजाने को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। शुगर कोआपरेटिव सोसायटियों की संरचना कुछ इस तरह से है कि लाभ तो सदस्यों में बांट दिया जाता है, लेकिन हानि का बोझ सरकार पर डाल दिया जाता है। जिसका फायदा मिल मालिक बखूबी उठाते हैं और संस्थान को घाटे में दिखाकर जहां एक ओर सदस्यों को उन्हें मिलने वाले प्रतिफल से वंचित कर दिया जाता है, वहीं सरकार से हानि की भरपाई करने के लिए अनुदान भी मिल जाता है। इसी तरह कोआपरेटिव संस्थानों की स्थापना के लिए प्रमोटर्स को सिर्फ 10 प्रतिशत लागत ही जुटानी होती है। शेष राशि सरकार से लोन के तौर पर मिल जाती है। जबकि इन सहकारी संस्थानों द्वारा लोन न चुकाए जाने के मामले समय समय पर सुनने को मिलते रहे हैं। ऐसी स्थिति में लोन का भुगतान राज्य सरकार को करना पड़ता है। 2004 तक की बात यदि करें तो इस तरह के बकाया लोन की गारंटी राशि 665 करोड़ रुपये बताई जाती है।

भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले और अर्थशास्त्री डा. प्रदीप आपटे जैसे लोग इस तरह की गारंटी दिए जाने के सख्त विरोधी हैं। वे कहते हैं कि आखिर सरकार को इस तरह की गारंटी देने की क्या जरूरत है? माधव गोडबोले कहते हैं कि ''जो राजनीतिक के लिए सुलभ है वही आज सहकार बन गया है। सत्ता प्राप्ति का साधन और कुप्रबंधन के शिकार इन सहकारी संस्थानों पर लगाम कसी जा सके, इतनी ताकत हमारे लचर कानूनों में नहीं है।'' वे कहते हैं कि सरकार का नियंत्रण इस तरह की संस्थाओं पर नहीं रह गया है। गोडबोले सहकारी संस्थानों की दशा में सुधार हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि इन संस्थानों को अधिकतम लाभ हेतु सुदृढ़ करने की जरूरत है। डा. प्रदीप आपटे कहते हैं कि लोग सहकारी संस्थाओं के सदस्य तो हैं, लेकिन सिवाय वोटिंग के उनके पास कोई और अधिकार नहीं है और व्यावसायिक तथ्यों की यहां हमेशा अवहेलना हुई है। यहां व्यावसायिक बोध और व्यावहारिकता की बात करने वाले को विकास विरोधी करार दे दिया जाता है। दूसरी ओर राजनीतिकरण को जनस्वीकृति भी मिल चुकी है। इसी तरह बैकुण्ठ मेहता नेशनल कोआपरेटिव इंस्टीटयूट, पुणे से सम्बद्ध एस.पी. भोंसले कहते हैं कि सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनाव कामकाज में बाधा पहुंचाते हैं और उन पर जमकर पार्टी पोलीटिक्स हावी रहती है। वे कहते हैं कि महाराष्ट्र असेंबली में 80 प्रतिशत लोग ऐसे मंत्री हैं, जो किसी न किसी रूप में कोआपरेटिव सोसायटियों से जुड़े हुए हैं। जबकि गोआ विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डा. पद्माकर दुभाशी कहते हैं कि- ''सहकारी संस्थाओं में लोकशाही की बजाय घरानाशाही का दौर चल पड़ा है। आम लोगों के बीच एक धारणा बन चुकी है कि फलां सहकारी कारखाना अथवा संस्थान लोगों का नहीं बल्कि, अमुक व्यक्ति का है।'' ऐसे में सहकारिता में राजनीतिज्ञों एवं प्रभावशाली लोगों की घुसपैठ का अंदाजा स्वत: लगाया जा सकता है। ईमेल: umashankar19mishra@gmail.com

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