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अक्टूबर, 2007

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तार-तार हो गई मर्यादा

भा.प.ब्यूरो

अपने देश में आम आदमी सरकारवाद और बाजारवाद से त्रस्त है। सरकार अपनी जिम्मेदारियों को सही ढंग से निभाए, इसके लिए वह मीडिया को बड़ी आशा से देखता है। यही कारण है कि मीडिया की आजादी पर जब कोई आंच आती है तो इस देश के बुद्धिजीवी ही नहीं आम आदमी भी मीडिया के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। हालांकि यह बात और है कि मीडिया का एक तबका इस आजादी को आम आदमी के हक में लड़ने के लिए नहीं बल्कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ही तार-तार करने में इस्तेमाल कर रहा है।

लाइव इंडिया नाम के एक सी ग्रेड चैनल ने कुछ दिन पहले एक स्टिंग दिखाया, जिसमें बताया गया कि एक सरकारी स्कूल की अध्यापिका उमा खुराना अपनी छात्राओं की अश्लील तस्वीरों के बूते उन्हें वेश्यावृत्ति के लिए बाध्य करती है। स्टिंग की असलियत अब सबके सामने आ चुकी है। मगर जिस सुबह इसका प्रसारण शुरू किया गया उस समय बात ही कुछ और थी। काफी देर तक जब कहीं से कोई प्रतिक्रिया आती नहीं दिखी तो चैनल ने अपनी एक टीम तुर्कमान गेट स्थित उस स्कूल की ओर रवाना कर दी जहां उमा खुराना पढ़ाती थी। इलाके के लोग बताते हैं कि चैनल की इस टीम ने आसपास के कुछ लोगों को इकट्ठा किया। फिर उसने इन लोगों के साथ स्कूल में घुसने की कोशिश की ताकि वहां की प्रिंसिपल और उमा खुराना से बात की जा सके। उसने लोगों से अपने स्टिंग पर राय लेनी भी शुरू कर दी। चैनल लगातार यह सब लाइव दिखा रहा था कि देखिए, उसके भंडाफोड़ पर लोग क्या कहते हैं। बात तेजी से फैली। घरों से निकल कर लोग वहां जुटने लगे। वे बहुत उत्तोजित थे। भीड़ बढ़ी तो पुलिसवालों की गिनती भी बढ़ने लगी। लेकिन जब भीड़ उमा खुराना पर टूटी तो ये तमाम पुलिसवाले कम पड़ गए। फिर भी हमें पुलिसवालों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने उमा को भीड़ के कोप से बचा लिया। पुलिस की भूमिका इस सारे मामले में उसकी छवि के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छी साबित हुई है। दिल्ली हाईकोर्ट के दखल के बाद जमानत मिलने पर उमा और उसके परिवार ने मीडिया का आभार माना। मगर सच्चाई यह है कि इस स्टिग घोटाले को सामने लाने में मीडिया ने कुछ नहीं किया। जो कुछ किया वह पुलिस ने किया। अखबारों ने केवल पुलिस की दी सूचनाएं छापने का काम किया। कई दिन बाद टीवी चैनलों ने भी मन मार कर स्टिंग घोटाले की खबर देनी शुरू की थी।

मीडिया तो असल में उन हालात को पैदा करने का जिम्मेदार है, जिनमें यह वारदात हुई। टीआरपी हथियाने के रास्ते में अभी ऐसे अनेक विद्रूप कारनामें सामने आ सकते हैं। मान लीजिए, भीड़ उमा खुराना की जान ले लेती और बाद में पता चलता कि स्टिंग तो प्रफाड था, तब क्या होता? चलिए ऐसा नहीं हुआ और उनकी जान बच गई। लेकिन लाइव इंडिया चैनल ने इस महिला की गरिमा को जो ठेस पहुंचाई है, उसकी भरपाई कैसे होगी? हालात सांप्रदायिक दंगे की शक्ल भी ले सकते थे और यह सब एक बकवास चैनल की महज टीआरपी की ललक के चलते हुआ था। केवल यह एक प्रकरण इतना बताने के लिए काफी है कि मीडिया को मिली निर्बाध आजादी आम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कैसे खरोंच मार सकती है।

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