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रामायण सत कोटि अपारा |
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प्रो योगेस जन्द्र शर्मा |
विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्व में राम के समान अन्य
कोई पात्र कभी नहीं रहा। वे मर्यादा
पुरुषोत्तम,
आदर्श राजा,
आज्ञाकारी फत्र और आदर्श पति
होने के साथ ही प्रबल योद्धा
और परम शूरवीर भी हैं। अत्याचारी रावण और उसके
समर्थकों का विनाश करके उन्होंने आर्य-संस्कृति की
विजय पताका दूर-दूर तक फहरा दी। राम को भारत का
आदिनिर्माता भी कहा जा सकता है। धीरे-धीरे राम की
कीर्ति गाथा का प्रचार-प्रसार भारत में ही नहीं
विश्व के अन्य देशों में भी हुआ। उनकी जीवनगाथा पर
अनेक ग्रन्थ लिखे गए जिनमें क्षेत्र,
परंपरा,
रुचि तथा लेखकीय भावनाओं के
अनुरूप कुछ अन्तर और विरोधाभास भी आये। यह स्वाभाविक
ही था। एक मान्यता यह भी है कि प्रत्येक कल्प में
राम-अवतार हुए हैं, जिनकी
जीवनगाथा में भिन्नता रही है। यही भिन्नता इन कथाओं
में प्रकट हुई है। राम का उल्लेख विश्व के आदिग्रन्थ
ऋग्वेद
में भी हुआ है। चूंकि वेदों में प्रयुक्त शब्दों की
अनेक प्रकार से व्याख्या की जाती है,
इसलिए इस संबंध में निश्चित कुछ
कहना कठिन है। एक व्याख्या के अनुसार निम्नांकित
ऋचा
में सम्पूर्ण रामकथा संक्षेप में समाहित कर दी गयी
है-
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भद्रो भद्रया सचमान: आगात स्वसारं जारो अभ्येति
पश्चात्।
सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितिष्ठन
रूशद्र्भिर्वर्णेरभि
राममस्थात्॥
(ऋग्वेद
10-3-3)
अर्थ-
(भद्र:)
भजनीय रामभद्र
(भद्रया:)
भजनीय सीता द्वारा
(सचमान)
सेवित होते हुए
(आगात)
वन में आये।
(स्वसारम्)
सीता को चुराने के लिए
(जार)
रावण
(पश्चात्)
राम और लक्ष्मण के परोक्ष में
(अभ्येति)
आया। रावण के मारे जाने पर (अग्नि:)
अग्नि देवता
(सुप्रकेतै:द्युभि)
राम की पत्नी सीता के साथ
(रामम्
अभि)
राम के सामने
(रूशद्भिर्वर्णे:)
उद्दीप्त तेज के साथ (अस्थात्)
उपस्थित हुए
(और असली सीता को उन्हें सौंप
दिया)।
रामकथा के अनेक पात्रों का वर्णन वैदिक साहित्य में
भी देखने को मिलता है। उदाहरणार्थ इक्ष्वाकु
(अर्थर्ववेद 19-39-9),
दशरथ
(ऋग्वेद
1-126-4), कैकेय
(शतपथ
ब्राह्मण
10-6-1-2) तथा जनक
(शतपथ
ब्राह्मण)
आदि। सम्भव है कि तत्कालीन भारत में इस नाम के अन्य
पात्र भी रहे हों। उनके साथ जुड़े गुण उन्हें रामकथा
से संबंधित करते अवश्य प्रतीत होते हैं,
परन्तु यह उल्लेखनीय है कि
राम-जन्म की घटना, वैदिक
साहित्य के बहुत बाद की है। यह भी सम्भव है कि
कालान्तर में इन नामों से संबधित
अंश वैदिक साहित्य में जोड़ दिये गए हों।
वैदिक साहित्य के बाद जो राम कथाएं लिखी गयीं,
उनमें वाल्मीकि रामायण सर्वोपरि
है। यह इसी कल्प की कथा है। चूंकि वाल्मीकि ने
सम्पूर्ण घटनाचक्र को स्वयं देखा या व्यक्तिश: सुना
था, इसलिए उसे सत्य माना
जा सकता है। मूल रामकथा के रूप में वाल्मीकि रामायण
के अतिरिक्त जो अन्य रामायण लोकप्रिय हैं,
उनमें अध्यात्म
रामायण,
आनन्द रामायण,
अद्भुत रामायण,
तथा तुलसीकृत रामचरित मानस आदि
विशेष उल्लेखनीय हैं। रामकथा पर लिखे गये ग्रन्थों
की इस अधिकता
के कारण ही गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था-'रामायण
सत कोटि अपारा'।
वाल्मीकि रामायण के उपरान्त रामकथा में दूसरा
प्राचीन ग्रन्थ है
'अध्यात्म
रामायण'।
वाल्मीकि में जहां हमें इतिहास का अधिक
प्रभाव परिलक्षित होता है,
वहीं 'अध्यात्म
रामायण में राम का ईश्वरत्व उभरता दृष्टिगत होता है।
इस रामायण को ब्रह्मांड-पुराण
के उत्तर-खंड के रूप में भी स्वीकारा जाता है। इसकी
कथावस्तु लगभग वाल्मीकि रामायण के समान ही है। मगर
इसमें नाम के अनुरूप आध्यात्मिकता
अधिक
हावी है।
'आनन्द
रामायण'
में भक्ति की प्रधानता है। इसमें राम की विभिन्न
लीलाओं तथा उपासना सम्बन्धी अनुष्ठानों की विशेष
चर्चा है। इसकी शैली रोचक और मधुर है। इसके प्रत्येक
सर्ग में इति श्री शतकोटि रामचरितान्तर्गत
श्रीमदानन्द रामायण वाल्मीकिये...। लिखा गया है।
इससे यह विचार बनता है कि यह ग्रन्थ भी शायद महर्षि
वाल्मीकि द्वारा रचित है। मगर कथावस्तु,
तथ्य,
शैली आदि से यह प्रमाणित नहीं होता। ऐसा लगता है कि
इसके रचयिता ने महर्षि वाल्मीकि के प्रति अपनी
श्रद्धाव्यक्त करने के लिए ही ऐसा लिख दिया होगा।
'अद्भुत
रामायण'
अपने नाम के अनुरूप कथा-प्रसंगों और वर्णन शैली में
अद्भुत ही है। इसमें सीता की महत्त विशेष रूप में
प्रस्तुत की गयी है। उन्हें
'आदिशक्ति
और आदिमाया'
बतलाया गया है,
जिसकी स्तुति स्वयं राम भी सहस्रनाम स्तोत्र द्वारा
करते हैं। इसमें
27
सर्ग और लगभग
14
हजार श्लोक हैं। इसमें अनेक अद्भुत अन्तर्कथाओं की
भी चर्चा है। उदाहरण के लिए लक्ष्मी के अंश से
उत्पन्न कन्या के स्वयंवर के समय विष्णु द्वारा
देवर्षि नारद और पर्वत ऋषि दोनों का रूप बन्दर के
समान करके स्वयं उस कन्या से विवाह कर लेना और बाद
में नारद द्वारा विष्णु को पत्नी-वियोग का शाप दिया
जाना आदि।
लोकप्रियता की दृष्टि से तुलसीकृत
'रामचरित मानस'
सबसे आगे है। लोकभाषा में होने
के कारण इसने रामकथा को जनसाधारण
में अत्यधिक
लोकप्रिय बना दिया। इसमें भक्ति-भाव की प्रधानता
है तथा राम का ईश्वरत्व पूरी तरह उभर आया है।
रामलीलाओं का मंचन भी
'रामचरित मानस'
के बाद ही प्रारम्भ हुआ।
रामलीलाओं के मंचन की दृष्टि से राधोश्याम कृत
रामायण का विशेष स्थान है। बरेली
(उ.प्र.)
निवासी प. राधोश्याम कथावाचक ने अपनी यह रामायण
हिन्दी क्षेत्रों की अपेक्षाकृत कम पढ़ी-लिखी जनता के
लिए लिखी और तद्नुसार इसे पर्याप्त लोकप्रियता भी
प्राप्त हुई। रामकथा के विभिन्न संस्कृत ग्रन्थों पर
आधारित
होकर विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में भी रामायण लिखी
गयीं।
नौवीं शताब्दी में तमिल कवि कम्बन ने तमिल भाषा में
रामकथा पर अपना ग्रन्थ तैयार किया,
जो 'कम्ब
रामायण' के नाम से
विख्यात है। इसी प्रकार तेलुगु भाषा में तीन
रामायणों की रचना की गयी,
जो आन्ध्रप्रदेश में विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
इनमें सर्वप्रथम स्थान 'रंगनाथ
रामायण' का है,
जिसकी रचना 13वीं
शताब्दी में तेलुगु कवि श्री गोनबुद्ध
रेड्डी ने की। तेलुगु क्षेत्रों में यह रामायण उसी
प्रकार लोकप्रिय है,
जिस प्रकार हिन्दी क्षेत्रों में
रामचरितमानस है। दूसरी 'मोल्डा
रामायण' है जिसे कवयित्री
मोल्डा ने 16वीं शताब्दी
में लिखा। इसमें भक्ति भाव के साथ ही साहित्यिक
प्रतिभा के भी स्पष्ट दर्शन होते हैं। अन्य
प्रादेशिक भाषाओं के समान उड़िया भाषा में भी रामकथा
पर काफी बड़ा साहित्य देखने को मिलता है। वहां अब तक
रामकथा पर सैकड़ों
पुस्तकें
लिखी जा चुकी हैं,
जिनमें कुछ मौलिक हैं तथा कुछ
अनुदित। इनमें सर्वाधिक
प्राचीन ग्रन्थ
'रूइपादकातेणापदी रामायण'
है,
जो नौवीं शताब्दी में लिखी गयी। 16वीं
शताब्दी में श्री बलराम दास ने 'जगमोहन
रामायण' की रचना की। श्री
पीताम्बर की 'दांडी
रामायण' तथा श्री अर्जुन
दास की 'रामविभा रामायण'
आदि बहुचर्चित और लोकप्रिय है।
इसी प्रकार गुजरात में श्री गिरधारी
की
'गिरधार रामायण'
मराठी में श्री एकनाथ की
'भावार्थ रामायण,
कन्नड़ में कवि नागचन्द्र की
'रामचंद्र चरित
पुराण'
तथा कुमुदेन्दु की 'कुमुदेन्दु
रामायण' आदि बहुचर्चित और
लोकप्रिय ग्रन्थ हैं। कश्मीरी भाषा में दिवाकर
प्रकाश भट्ट ने भी 18वीं
शताब्दी के अन्त में रामायण लिखी थी। फादर डाक्टर
कामिल बुल्के ने नयी दृष्टि से रामायण की रचना की और
रामकथा पर अपने विचार प्रस्तुत किये।
निश्चित ही विश्व में रामकथा पर जितने ग्रन्थों की
रचना हुई,
उतने ग्रन्थ किसी भी भाषा में एक
कथा पर नहीं लिखे गये। विश्व की विभिन्न भाषाओं में
लगभग पांच सौ अलग-अलग प्रकार की रामायण प्रकाशित की
जा चुकी है, जिनमें कुछ
बहुत अधिक
प्रसिद्ध
हैं। बड़ी संख्या में रामायण के अन्य भाषाओं में
अनुवाद भी प्रकाशित होते रहे हैं। मुगल काल में
रामायण का फारसी अनुवाद
(मसीही
रामायण)
भी प्रकाशित हुआ था जो रामकथा की लोकप्रियता का एक
प्रमाण है। 1623 ईस्वी
में फारसी के प्रसिद्ध
कवि शेख साद मसीहा ने भी
'दास्ताने राम व सीता'
शीर्षक से रामकथा लिखी थी। उर्दू
में भी राम कथा पर एक ग्रन्थ रघुवंशी उर्दू रामायण
वर्ष 1996 में प्रकाशित
हुआ, जिसके लेखक श्री
बाबू सिंह बाल्यान हैं। यह एक प्रकार का शोधाग्रन्थ
है, जिसमें सभी प्रकार की
उपलब्धा रामकथाओं तथा उनके लेखकों का विवरण दिया गया
है। इस ग्रन्थ में राम के विश्व रूप को अभिव्यक्त
करते हुए कहा गया है कि राम ने ईसामसीह,
पैगम्बर मोहम्मद,
गुरु नानक तथा गौतम बुद्ध
के समान किसी प्रकार का कोई नया मत,
सम्प्रदाय या
धर्म
नहीं चलाया। इसलिए वे विश्वव्यापी और महान् हैं। वे
सभी धार्मों के अपने हैं।
प्राचीन भारत और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में आर्य
संस्कृति तथा उसके साथ रामकथा का जो प्रचार-प्रसार
हुआ,
वह आज भी यथावत कायम है। युग,
परिस्थिति और
धर्म
परिवर्तन के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में रामकथा
के प्रभाव में कोई कमी नहीं आयी है। इसके विपरीत
उसमें वृद्धि
ही हुई है। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में तो रामायण
को राष्ट्रीय पवित्र
पुस्तक
का गौरव प्राप्त है। वहां अदालतों में प्राय: रामायण
पर ही हाथ रखकर शपथ ली जाती है। वहां इस ग्रन्थ का
नाम है
'काकाविन रामायण'
इसमें 26
सर्ग तथा 2778
पद हैं। इंडोनेशिया में राम की
अनेक प्रस्तर प्रतिमाएं भी हैं। मलयेशिया में रामकथा
के ग्रन्थ का नाम है 'हिकायत
सिरी राम'। वहां अनेक
मुसलमानों के साथ लक्ष्मण या सीता आदि के नाम जुड़े
रहते हैं। वहां राम कथा का अक्सर मंचन होता है,
जिसमें मुसलमान भी बड़ी संख्या
में कलाकार, दर्शक और
आयोजक के रूप में भाग लेते हैं।
थाईलैंड में रामकथा को
'रामकियेन'
या 'रामकीर्ति'
कहा जाता है। यह ग्रन्थ
1807 ईस्वी में लिखा गया था। इस
पर वाल्मीकि रामायण का विशेष प्रभाव है। यहां पर
हमें अजुधिया,
लवपुर
तथा जनकपुर
जैसे नाम वाले क्षेत्र मिलते हैं। यहां के अधिकांश
निवासी बौद्ध
धर्म
के उपासक हैं। फिर भी यहां राम को बड़ी
श्रद्धा
के साथ देखा जाता है और उनमें से अनेक अपने नाम के
साथ राम भी लगाते रहे हैं। उदाहरणार्थ
13वीं शताब्दी के नरेश
खुन-राम-खम्हेड़े, राम के
नाम से ही प्रतिष्ठित थे। राजा भूमिबल-अतुलंतेज भी
अपने नाम के साथ 'राम'
लगाते थे। थाइलैंड के लोगों का
यह विश्वास है कि रामायण की सम्पूर्ण घटना उन्हीं के
यहां घटित हुई थी। वहां के अनेक मन्दिरों में राम की
मूर्तियां आज भी स्थापित हैं।
थाइलैंड के निकटवर्ती देश कम्बोडिया पर हिन्दू धर्म
का विशेष प्रभाव है और इसलिए वहां रामकथा का भी काफी
अधिक
प्रचार-प्रसार हैं। वहां रामकथा के ग्रन्थ का नाम है
'रामकोर'।
वहां रामायण और महाभारत के पाठ भी होते रहते हैं।
वहां के मन्दिरों की दीवारों पर रामायण की कथा से
सम्बन्धित अनेक प्रसंगों को उत्कीर्ण किया गया है।
एक प्राचीन अभिलेख में 'रामायण'
के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का भी
उल्लेख आता है।
जावा में राम को
पुरुषोत्तम
के रूप में सम्मानित किया जाता है। वहां अनेक
मन्दिरों में वाल्मीकि-रामायण के श्लोक उद्धत
हैं। रामकथा के प्रसंगों के आधार पर वहां
कठपुतलियों
के नाम होते हैं। वहां
'सरयू'
नाम से एक नदी भी है।
लाओस में रामकथा पर दो ग्रन्थ उपलब्ध हैं। प्रथम
'फालाक फालाम'
तथा दूसरा
'फोमचक्र'।
वियतनाम
(प्राचीन
नाम चम्पा)
में प्राचीन काल में हिन्दू राज्य स्थापित था। उस
समय वहां रामकथा का बहुत अधिक
प्रभाव था,
जिसके प्रमाण हमें आज भी
यत्र-तत्र देखने को मिलते हैं। बर्मा में
1800 ई. के लगभग 'रामायागन'
के नाम से रामकथा लिखी गयी। इस
ग्रन्थ ने वहां पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की है।
बर्मा में अनेक नाम राम पर आधारित
हैं। वहां एक गांव का नाम रामवती है। वहां अमरपुर
के एक बिहार में राम,
लक्ष्मण,
सीता और हनुमान के चित्र भी
अंकित हैं।
राम कथा का प्रचार-प्रसार चीन और जापान में भी विपुल
मात्रा में हुआ। मैक्सिको और मध्य
अमरीका में भी रामकथा की चर्चा होती है। पेरू में तो
राजा अपने को सूर्यवंशीय राम के वंशज ही मानते थे।
अंग्रेजी भाषा में वाल्मीकि रामायण का प्रथम अनुवाद
फ्रेडरिक
सालमन ने
1883 में किया। 'रामचरित
मानस' का अंग्रेजी अनुवाद
सर्वप्रथम एफ.एस.ग्राउज
ने सन्
1871 में किया।
फ्रेंच
भाषा के विद्वान
'गार्सा द तासी'
ने सुन्दर कांड का अनुवाद किया
और डेनीविलि ने
फ्रेंच
भाषा में स्वतंत्र रूप से रामकथा लिखी। इटली के
विद्वान डाँ. लुहजीपियो टे सीटेरी,
रामकथा पर शोधा करके फ्लोरेंस
विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि
प्राप्त कर चुके हैं। हालैंड,
जर्मनी और
पुर्तगाल
में भी रामकथा के अनुवाद हुए हैं तथा मौलिक रचनाएं
भी छपी हैं। रूस के प्रसिद्व हिन्दी समर्थक अलैक्सेई
बारान्निकोव ने रामचरित मानस का रूसी भाषा में
अनुवाद किया और सम्पूर्ण रूस तथा निकटवर्ती अन्य
देशों में रामकथा का प्रचार किया। सोवियत लेखिका
श्रीमती नतलिया गुलेवा ने रामकथा पर बच्चों के लिए
रंगमंचीय नाटक तैयार किये हैं। रूस में तीसरी से
नौंवी शताब्दी के बीच तिब्बती ओर खेतानी भाषा में
लिखी संक्षिप्त रामकथाएं प्राप्त होती हैं,
जो उन दिनो
काफी लोकप्रिय थीं। अमरीकी विद्वान मीलो क्लेवलैंड
ने बाल साहित्य के रूप में रामकथा को
'एडवेंचर आफ राम'
शीर्षक से लिखकर प्रकाशित
करवाया। इस प्रकार यह सूची काफी लम्बी हो सकती है,
जो तुलसीदास के इन्हीं शब्दों को
प्रमाणित करती है कि 'रामायण
सतकोटि अपारा'।
संपर्क:
10/611,
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