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रिक्शे से उतरकर मैंने फाटक के अंदर एक सतर्क दृष्टि
डाली। हाथ के फाइल केस को मजबूती से पकड़ा और कंपाउंड
के अंदर दाखिल हुई। एक ओर लंबा-सा बरामदा,
दूसरी ओर दीवार पर मार्निंग ग्लोरी की बेल बेतहाशा
फैली हुई थी। मैंने इधर-उधर देखा कि एक मुंशी जैसे
दिखने वाले सज्जन लपककर आए-
''इंटरव्यू?''
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इंटरव्यू
खत्म हो गया। धूप की किरणें तिरछी होकर एक ओर हो
गई थीं,
पर सहन में वैसी ही उमस और
गर्मी थी। दोनों ओर की बेंचों पर बैठी महिलाओं
में बातचीत इस वक्त बंद थी। गर्मी के मारे बुरा
हाल था। मैंने एम.ए के सर्टिफिकेट से पंखे का
काम लेते हुए देखा-धुली साफ साड़ियों के पल्लुओं
में शिकनें पड़ गई थीं। चेहरों का रूज पाउडर बह
चला था। पसीने और गर्द से भरे उन सारे चेहरों के
पीछे अब सिर्फ एक चेहरा झांक रहा था,
बेकारी का। |
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''जी!''
''बैठिए।''
उन्होंने कहा और बरामदे में पड़ी बेंच पर इशारा कर
तत्परता से एक ओर चले गए।
घड़ी देखी। साढ़े पांच। छह से इंटरव्यू था। इतना पहले
आना तो बुद्धिमानी
है;
पर और कोई नहीं दिखता। तो फिर
क्या मैं अकेले ही...
खुशी और अचरज से मिली-जुली एक लहर पूरे शरीर में दौड़
गई। डिग्री कालेज में पढ़ाने का सुख... रौब... भावी
जीवन की संभावनाएं सब एक साथ आंखों में घूमे,
पर तुरंत ही कई पदचापों ने
स्वप्न को भंग कर दिया। चौंककर देखा-दो महिलाएं थीं।
स्पष्ट ही उम्मीदवार होंगी। सामने वाली बेंच पर वे
बैठ गईं। एक उड़ती-सी दृष्टि उन पर डाल अब मैंने
बरामदे का निरीक्षण किया। धूप बाहर काफी तेज थी। हवा
बिलकुल बंद। ईंटों का बना हुआ बरामदा एकदम तप रहा
था। सामने आफिस था, जिसके
द्वार पर मोटी-मोटी चिकें पड़ी थीं। कहीं कोई खास चीज
नजर नहीं आई तो मैंने फाइल केस खोला।
के
से लेकर एम.ए. तक के पूरे सर्टिफिकेट थे। टीचिंग
एक्सपीरियंस का लेखा-जोखा,
निबंधां की कटिंग वगैरह सभी
कायदे से लगा था। उसे भी बंद कर मैंने सामने की
महिलाओं में
ध्यान
लगाया। दोनों में बातचीत चल रही थी,
किसी मैरिज पार्टी को लेकर।
''पार्टी
की तारीफ तो बड़ी रही।''
''अरे,
कहीं सर्व करने वाले तक तो थे नहीं। एक तरफ के लोग
खा चुके और दूसरी तरफ पानी भी नहीं पहुंचा।''
मैंने बातचीत से उनके स्तर का अनुमान करते हुए
निश्चितता के साथ आंखें मूंदीं,
पर भाग्य में सुख तो न था।
सेंट की तेज खुशबू उड़ाती एक श्रीमती जी ने मेरे बगल
में एक बंडल रखा और जम गईं। मैंने सतर्क होकर आंखें
खोलीं। फिर तो बड़ी-बड़ी हस्तियां आईं और देखते-देखते
बरामदे की तीनों बेंचें भर गईं। खूबसूरत पर्स,
कढ़े बेलबूटे वाले सपेफद रंगीन
पल्लू, चमकीले संवारे हुए
प्यारे चेहरे। जरा देर पहले जो बरामदा तप रहा था,
इत्र और पाउडर की खुशबू से महमहा
उठा। मुझे लगा, उस ओर की
मार्निंग ग्लोरी यहां भी आकर
फैल
गई है। एक-दो छोड़कर प्राय: सब परिचित लग रही थीं,
क्योंकि बातें बड़े उत्साह से
छिड़ी थीं। मैंने भी उसमें हिस्सा लेने के विचार से
ध्यान
लगाया।
''तुम
कैसे?''
''यों
ही तफरीह के लिए। सोचा,
अपना कालेज ही देख लिया जाए।''
''कितनी
चांसेज है भाई?''
''मेरा
ख्याल है,
मिसेज गुप्ता को लेंगी। छब्बीस साल का एक्सपीरियंस
है,
फिर इसी कालेज की...?''
''लेकिन
उनका फर्स्ट क्लास तो था नहीं।''
''अरे,
फर्स्ट क्लास वगैरह सब एक तरफ,
असल में जिसका सोर्स पहुंचा हो...।''
यह मौका मैंने उपयुक्त समझा और चट से टिप्पणी दी-
''नहीं,
ऐसी बात तो नहीं है। मिसेज सिन्हा तो बड़ी
कायदे-कानून की पाबंद हैं। इनजस्टिस तो नहीं करेंगी
किसी के साथ?''
उत्तर
कुछ तीव्रता में मिला-
''अजी,
देखती रहिए। हाथी के दांत खाने
के और, दिखाने के और। अभी
रिजल्ट का पता चल जाएगा।''
''क्यों
जी,
कितने लोग हैं?''
''तीन
पी-एच.डी.,
दस फर्स्ट क्लास और तेईस सेकंड क्लास।''
''ओह
बाबा! तब तो बेकार ही आना हुआ।''
''अजी,
बेकार तो एक को छोड़कर सभी का आना है।''
इस पर एक सम्मिलित कहकहा लगा और बातें तेजी से शुरू
हो गईं।
मेरा दिल उम्मीदवारों का विवरण जानकर डूबने लगा।
निराशा के साथ धीरे से सिर हिलाकर मैं चुप हो गई।
इतने में मुंशी जैसे दिखने वाले वे सज्जन फिर आए और
सबका नाम-धाम पूछकर लिस्ट-सी बनाने लगे।
महिलाओं में बातें वैसी ही छिड़ी थीं,
पर मेरा सारा उत्साह खत्म हो
चुका था। निरुद्देश्य दृष्टि से मैंने बारी-बारी से
सबकी ओर देखा। एक कश्मीरी महिला थी। कोनों में
उन्होंने एक अजब तरह की चीज पहन रखी थी। जो झुमके के
रूप में उनके गले तक लटक रही थी। वे बड़े हाव-भाव से
बातें कर रही थीं और बीच-बीच में अपने शीशे-जड़े
सर्टिफिकेट के प्रेफमों पर हाथ पेफर लेती थीं। उनके
पास एक बड़ी सौम्य आकृति की खद्दरधारिणी युवती बैठी
थी। उसके हाथ में
पुस्तकाकार
कोई चीज थी,
जिसे वह अपनी गोद में रखे थी।
मैंने सोचा, यदि मैं इस
कालेज की प्रिंसीपल होती और सिर्फ
आकृति पर लेक्चरर का चुनाव करना होता तो मैं निश्चय
ही इस युवती को चुनती। पर वही मिसाल कि आप मियां
मांगते और खड़े दरबार।
'डिग्री
कालेज की प्रिंसीपल'
इस आशा ने मेरी उदासी को फिर ताजा कर दिया। एक
टेंपरेरी पोस्ट मिलने में तो इतनी अड़चनें हैं। मैंने
अपनी निगाह सब ओर से हटा ली और एकदम से बहुत अधिक
दुख का अनुभव किया। वे मुंशीनुमा सज्जन नाम पूछते
हुए जब मेरे पास आए तो मैंने कुछ इस बेचारगी से
उत्तर दिया कि वे चौंककर मेरी ओर देखने लगे। मुझे
एकाएक बड़ी शर्म लगी। आखिर मैं कोई छायावादी कवि तो
हूं नहीं जो बेमतलब ही निराशा के समुद्र में गोते
लगाया करूं। इतने लोग हैं यहां,
सबके चेहरे ताजे,
खुश और चमकदार दिखते हैं। फिर मैंने ही क्यों मुंह
लटका लिया है?
कोई जानता है कि इतने लोगों में किसका भाग्योदय होने
वाला है?
मैंने होठों पर एक मुस्कान
फैलाई
और अपने बगल में बैठी महिला से बात चलाई-
''आप कहां से आई हैं।?''
''कानपुर
से।''
''ओह!
ओह!''
कहकर मैं चुप हो रही। सांवले रंग की इन श्रीमती जी
ने अपने होठों पर बड़ी गहरी लिपस्टिक लगा रखी थी।
मेरा मन हुआ,
दूसरा प्रश्न यह पूछं कि क्या इंटरव्यू के लिए होठों
पर यों गहरी लिपस्टिक लगाना कोई जरूरी बात है?
पर मैं दरअसल कुछ उदास थी।
विमला अग्रवाल!
हम चौंके! इंटरव्यू प्रारंभ हो गया था। सबने अपने
अस्त्र-शस्त्र संभाले। चेहरों पर सतर्कता का भाव आ
गया। और अब बातों का रुख कालेज,
प्रिंसीपल तथा मैनेजिंग कमेटी के
इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगा। कुछ एक ने अपनी फाइलें
खोलीं।
एक छोटे कद वाली दुबली-पतली लड़की ने उन कश्मीरी
महिला से पूछा-
''आप तो ओरिजिनल कापी लाई हैं?''
''हां...
ओरिजिनल कापी ही तो मंगाई थी। अजी लाना-वाना क्या,
सब यों ही है। पोस्ट तो जिसे मिलनी है,
उसे ही मिलेगी।''
वे हंसीं।
इसका अर्थ मैंने यह लगाया,
बहुत कुछ संभावना मेरे लिए भी
है। देखती नहीं हो, ये
शीशे में जड़े सर्टिफिकेट...
मेरा नंबर सातवां या आठवां था। फाइल संभालकर सशंकित
हृदय से मैंने आफिस में प्रवेश किया। पूरा कमरा भरा
था।
''बैठिए।''
''एम.ए.
किस डिवीजन में पास किया?''
''फर्स्ट।''
''इसके
पहले कहां पढ़ाती थीं?''
''राष्ट्रभाषा
विद्यालय,
वर्धा''
''लिखती
भी हैं?''
''जी
हां।''
मैं फाइल खोलने को उद्यत हुई कि प्रश्नकर्ताओं ने
संतोषजनक मुद्राओं में सिर हिलाए अर्थात् अब आप जा
सकती हैं।
मैंने सोचा,
कहूं- ''जी
ये सर्टिफिकेट और टेस्टीमोनियल्स...''
पर सभ्यता के दबाव में मन मसोसकर
उठ जाना पड़ा।
छह बजकर तीस मिनट।
इंटरव्यू खत्म हो गया। धूप की किरणें तिरछी होकर एक
ओर हो गई थीं,
पर सहन में वैसी ही उमस और गर्मी
थी। दोनों ओर की बेंचों पर बैठी महिलाओं में बातचीत
इस वक्त बंद थी। गर्मी के मारे बुरा हाल था। मैंने
एम.ए के सर्टिफिकेट से पंखे का काम लेते हुए
देखा-धुली साफ साड़ियों के पल्लुओं में शिकनें पड़ गई
थीं। चेहरों का रूज पाउडर बह चला था। पसीने और गर्द
से भरे उन सारे चेहरों के पीछे अब सिर्फ एक चेहरा
झांक रहा था, बेकारी का।
शीशे में जड़ाए सर्टिफिकेट्स,
थीसिस का ग्रंथ,
मेहनत से इकट्ठा की गई
लेखों-निबंधों
की कटिंग्स सब बेकार हो चुकी थीं।
मैनेजिंग कमेटी के एक सदस्य की बहन चुन ली गई थी।
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