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दर्द
दिल्ली के किसानों का |
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गुंजन
कुमार |
मुंशी प्रेमचन्द
की रचना गोदान को आए लगभग अस्सी वर्ष हो गये हैं।
लेकिन,
गोदान
के
पात्र होरी-धानिया आज भी देश में अपनी उपस्थिति दर्ज
करा रहे हैं। प्रेमचन्द
के
पात्रों की जो छटपटाहट उस वक्त थी वह आज भी बनी हुई
है। देश
के
किसानों की हालत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। देश
के
एक कोने में किसान आत्महत्या को कर्ज से मुक्ति पाने
का रास्ता मानते हैं,
तो दूसरे कोने में अस्तित्व
बचाने
के
लिये वे सरकारी गोली अपने सीने में खा रहे हैं। इन
दोनों ही स्थितियों
के
लिए सरकार को जिम्मेदार माना जा सकता है। किसी
जमाने में दिल्ली में भी किसान हआ करते थे। इनकी
समस्या का एक अलग ही प्रकार है। दिल्ली को न्यूयार्क,
सिंगापुर
बनाने की सरकारी तमन्ना पूरी करने
के
लिये उन
के
अस्तित्व को दफना दिया गया है। यहां
के
किसानों की जमीन से
'दिल्ली विकास प्राधिकरण'
(डीडीए)
अरबों रुपए कमा रहा है। जबकि जमीन
के
असली मालिक रिक्शा,
रेहड़ी चलाकर या बस कन्डक्टरी कर
अपना परिवार पालने
के
लिये मजबूर हैं।
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विडम्बना यह है कि
20 साल पहले सुरेश की जिस
जमीन का अधिग्रहण किया गया था,
वह आज भी यूं ही खाली पड़ी
है। वह जमीन अब जंगल में परिवर्तित हो गयी है।
इससे डीडीए को बैठे-बिठाए लाभ हो रहा है।
क्योंकि, समय
के
साथ-साथ उस जमीन की कीमत बढ़ती जा रही है। यदि यह
जमीन आज सुरेश
के
पास रहती तो उसको अपने रोजगार की चिंता नहीं
करनी पड़ती। |
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बढ़ते हुए दिल्ली शहर को बसाने
के
लिये राजधानी
के
किसानों की जमीन पर कब्जा किया गया। किसी की जमीन
60
के
दशक में तो किसी की
80
के
दशक में डीडीए ने अधिग्रहित
की। इसके बदले इन किसानों को नाममात्र का पैसा दिया
गया। कइयों को तो अभी तक मुआवजा नसीब नहीं हुआ है।
जिस मिट्टी की प्यास किसान अपने पसीने से बुझाया
करते थे और अपना जीवन निर्वाह करते थे आज वहां
बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं। गाड़ियां भागदौड़ करती दिखती
हैं। डीडीए ने दिल्ली में सर्वप्रथम
13 नवम्बर 1959
में किसानों की जमीन अधिग्रहित
की थी। मुनिरका गांव की उस जमीन पर आज रामकृष्ण
पुरम
(आर
के
फरम)
जेएनयू आदि बसे हैं। तब से लेकर आज तक डीडीए ने लगभग
सवा लाख एकड़ जमीन अधिग्रहित
कर अपने कब्जे में कर ली है। अभी तक लगभग
165 गांवों का शहरीकरण हो चुका
है। 228 गांव दिल्ली में
अभी भी हैं जहां लगभग 50
हजार एकड़ जमीन बची है। इसे भी अधिग्रहित
कर यहां
के
गांवों और किसानों का अस्तित्व खत्म करने की योजना
है।
80
के दशक में अधिग्रहित एक एकड़ जमीन के बदले प्राधिकरण
किसानों को
55
हजार रुपये दिया करता था। आज उसी जमीन को अरबों में
बेच रहा है। बहुत से किसान ऐसे हैं,
जिन्हें मुआवजे के रूप में एक रुपया भी नहीं मिला
है। ये किसान कोर्ट के माध्यम से अपनी जमीन वापस
चाहते हैं या बाजार भाव से जमीन की कीमत मांग रहे
हैं।
यहां
के
किसानों का संघर्ष सड़कों पर लहू
के
रूप में या आत्महत्या
के
रूप में भले ही नहीं दिखे,
लेकिन कई माध्यमों
से इनकी लड़ाई जारी है। दिल्ली ग्राम विकास पंचायत
के
कार्यकारी अध्यक्ष
चौधारी सुखबीर सिंह सोलंकी कहते हैं,
''देश की राजधानी
होने
के
नाते इसे सुनियोजित ढंग से बसाने और सुंदर बनाने का
हम विरोधा नहीं कर रहे हैं। हमारा विरोधा कृषि योग्य
भूमि छीने जाने को लेकर है। होना यह चाहिए कि वे
बंजर भूमि पर कालोनी बनाते और बसाते।''
1959 में मुनिरका में अधिग्रहण
की गयी जमीन की कीमत किसानों को
5 रुपये गज
के
हिसाब से दी गयी थी। अब उसे अरबों में बेचा जा रहा
है। जिस तरह किसानों की जमीन पर कब्जा कर डीडीए और
सरकार अरबों कमा रही है,
उससे लगता है कि उनकी राजधानी
को सुन्दर बनाने में कम,
बिल्डर के रूप में पैसा कमाने
में ज्यादा रुचि है।
जिन किसानों की जमीन भी गई और मुआवजा भी नहीं मिला,
उनकी स्थिति आज बड़ी दयनीय है। अकेले
लाडोसराय गांव में
8 से 10
परिवार ऐसे हैं जिनसे सैकड़ों
बीघा जमीन लिये जाने
के
बाद उन्हें मुआवजे
के
रूप में एक भी पैसा नहीं मिला है। आज वे मजदूरी करने
के
लिये मजबूर हैं। ऐसा ही एक किसान है सुरेश सिंह।
सुरेश की
20 बीघा जमीन प्राधिकरण
ने
1985-86 में अधिग्रहित
की थी। प्राधिकरण
से एक भी पैसा अभी तक इन्हें नहीं मिला है। सुरेश आज
रेहड़ी लगाकर अपने परिवार को पाल रहा है। वहीं दूसरा
भाई प्रताप सिंह काल सेंटर की गाड़ी चलाता है। सुरेश
अपनी रेहड़ी से किसी दिन
100 रुपया कमा लेता है तो किसी
दिन एक पैसे की भी कमाई नहीं होती। पचास वर्षीय
सुरेश अपना दर्द बयान करते हुए कहता है, ''आज
हमारे पास घर
के
अलावा
कुछ
नहीं है। यदि
पुश्तैनी
घर नहीं होता तो शायद दिल्ली जैसे शहर में परिवार
पालने के भी लाले पड़ जाते। जब हमारे पास खेत थे तो
उससे हमारी ही नहीं बल्कि दो-तीन मजदूरों की भी
आजीविका चलती थी।''
विडम्बना यह है कि
20 साल पहले सुरेश की जिस जमीन
का अधिग्रहण किया गया था,
वह आज भी यूं ही खाली पड़ी है। वह जमीन अब जंगल में
परिवर्तित हो गयी है। इससे डीडीए को बैठे-बिठाए लाभ
हो रहा है। क्योंकि, समय
के
साथ-साथ उस जमीन की कीमत बढ़ती जा रही है। यदि यह
जमीन आज सुरेश
के
पास रहती तो उसको अपने रोजगार की चिंता नहीं करनी
पड़ती।
सुरेश
के
गांव
के
ही जयपाल सिंह हं। इनकी
53 बीघा जमीन 1980-81
में अधिग्रहित
की गयी थी। इनके
घर में तीन भाईयों समेत
कुल
40 लोग हैं। जयपाल सिंह परिवार
चलाने
के
लिये बस में कंडेक्टरी करता है। इनकी जमीन बदरपुर-महरौली
रोड पर एक बड़े पार्क
में तब्दील हो चुकी है। सुबह-शाम इस पार्क
के
सामने बड़ी-बड़ी गाड़ियां लगी रहती हैं। खेतों को तो
चकाचौंध वाले शहर में तब्दील कर दिया गया जबकि गांव
बद से बदतर होत गए। लाडो सराय गांव में
3 फीट चौड़ी गलियां है जो अभी भी
कच्ची हैं। यहां सबसे चौड़ी गली 10
फीट की है। इसी से अंदाजा लगाया
जा सकता है कि सरकार ने जमीन लेने
के
बाद इनकी सुविधाओं
का कितना ख्याल रखा है। अन्य प्रदेश
के
किसानों को रियायती दर पर बिजली मिलती है। लेकिन,
इन्हें बिजली चोरी
के
जुर्म में जेल जाना पड़ता है।
किसानों को मिलने वाली सुविधाओं
और मुआवजे पर डीडीए
के
उपाध्यक्ष
दिनेश राय का कहना है,
''प्राधिकरण
ने शुरू से अभी तक अधिग्रहित
की गयी जमीन का मुआवजा दे दिया है। यह मुआवजा राशि अधिग्रहित
किये गये वर्षों में सरकारी दर
के
अनुसार दी गयी है। जो लोग मुआवजा नहीं मिलने की बात
कर रहे हैं उनकी जमीन पर मालिकाना हक को लेकर विवाद
चल रहा है। उनका
केस
कोर्ट में चल रहा है।
फैसला
आने
के
बाद ही उसपर निर्णय लिया जायेगा।''
यह बात सच है कि सरकार ने जिन किसानों की जमीन ली,
उनमें से अधिकतर को मुआवजा मिला।
लेकिन इस मुआवजे से हुआ क्या। अचानक एक साथ पैसा
मिलने से कई नई समस्याओं ने इन किसानों को घेर लिया।
कोई व्यापार चलाने का अनुभव इन किसानों को था नहीं,
सो उन्होंने अपना सारा पैसा कोठी,
कार और अमीरों के अन्य दूसरे
शौकों पर खर्च कर दी। कुछ ने तो अपना सारा पैसा शराब
पीने और अन्य व्यसनों में फूंक दिया। जब सारा पैसा
खत्म हो गया तो वे सड़क पर आ गए। जमीन न होने के कारण
वे किसान तो रहे नहीं,
शहरी भी न बन सके। उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लग
रहा है।
जो लोग यह दावा करते हैं कि सही मुआवजा देने के बाद
किसानों की जमीन लेने में कोई बुराई नहीं है,
उन्हें दिल्ली के किसानों से
मिलना चाहिए। उन्हें समझ में आ जाएगा कि मुआवजा देने
भर से विस्थापन की समस्या का समाधान नहीं होता।
ईमेल:
smartgunjan@gmail.com |