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अजूबों का मुल्क है हिन्दुस्तान |
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अक्षय जैन |
यूरोप और अमेरिका वाले कमाल के लोग हैं। ये लोग
चुप नहीं बैठ सकते। कुछ-न-कुछ नया करते रहते
हैं। वियाग्रा हो,
हैरी पाटर हो या इराक पर बमबारी हो- दुनिया के
लोग इनके कारनामों को देखकर चकित रह जाते हैं।
इनकी मामुली-से-मामुली पहल दुनिया में तहलका मचा
देती है। हमारे डेढ़ लाख से ज्यादा किसानों ने
आत्महत्या की,
कहीं कोई सनसनी नहीं फैली। इन्होंने लिस्बन,
पुर्तगाल में एक छोटा-सा जलसा किया,
दुनिया के सात अजूबों का ऐलान किया और यू.पी.,
बिहार के साथ पूरी दुनिया को लूट लिया।
लूटने की गुंजाइश हो तो अमेरिका और यूरोप वाले
कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते हैं। हिन्दुस्तान के
तमाम अखबारों और टेलीविजन चैनलों को काम पर लगा
दिया। तकरीबन दस करोड़ हिन्दुस्तानियों ने
एस.एम.एस किया। ऐसा जन-जागरण न तो
1857 में देखने को मिला और न
ही 1947 में।
एस.एम.एस से अमेरिकन कंपनियों को ढेर सारा पैसा
मिला। हमें क्या मिला?
हम हिन्दुस्तानियों को सड़कों
पर नाचने का मौका मिला। जिन गजल-गायकों का कोई
नामलेवा नहीं था,
उन्होंने अपनी बेमिसाल गायकी का जलवा पेश किया।
गजल गायकों के साथ किसी भी तरह की बदसलूकी की
खबर, देश के किसी
कोने से नहीं आई। खुशी के इस राष्ट्रीय पर्व पर
नक्सलवादियों ने भी अनुशासन बनाये रखा।
खुदा-न-खास्ता,
अगर ताजमहल को दुनिया के सात
अजूबों में जगह नहीं मिलती,
तो क्या होता?
कुछ भी हो सकता था। जलगांव
से जहानाबाद और कैथल से कोयम्बतूर तक लोग अपने
घरों से बाहर ही नहीं निकलते। इतनी शर्म तो हम
लोगों में अभी भी बची है। वर्ल्ड कप में भारतीय
क्रिकेट टीम की पराजय के बाद इतना बड़ा सदमा
झेलना हमारे लिए आसान नहीं होता। 1962
में चीन ने युद्ध
में हमें बुरी तरह हरा दिया। हम भूल गए। हम इसे
भी भूल जाते।
ताजमहल को सात अजूबों में जगह नहीं मिलती तो किन
कारणों पर चर्चा होती?
मीडिया पूछता,
उसके पहले ही वृंदा कारत
बयान जारी कर देतीं कि यह सांप्रदायिक ताकतों की
साजिश है। मेरी राय में शाहजहां हिन्दुस्तान के
सफेद संगमरमर की जगह इटालियन मार्बल इस्तेमाल
करता तो हमें दस करोड़ एस.एम.एस भेजने की जरूरत
ही नहीं पड़ती।
बहरहाल यूरोप की जिस प्राइवेट कंपनी ने यह तमाशा
आयोजित किया था,
उसने हमारी लाज रख ली।
ताजमहल को दुनिया के सात अजूबों में जगह दे दी।
हमारा महान अतीत एक बार फिर जीत गया। दुनिया की
सबसे बड़ी मंडी के रूप में भारत का स्थान
अक्षुण्ण है। यूरोप और अमेरिका वाले ऐसे मुल्क
की अनदेखी भला वैफसे कर सकते थे?
उनके पास देने के लिए
जायकेदार लालीपाप ढेर सारे हैं। इसके पहले
उन्होंने हमें कई सारी विश्व सुंदरियां दी हैं।
तोपें, लड़ाकू विमान
और वित्तमंत्री दिए हैं।
जिन दस करोड़ हिन्दुस्तानियों ने एस.एम.एस भेजे
हैं,
उनकी कड़ी मेहनत इतिहास में
दर्ज होनी चाहिए। पूरी दुनिया को पता चल गया कि
हिन्दुस्तान के दस करोड़ लोग एक मुद्दे पर एकजुट
हो सकते हैं। नंदीग्राम में निर्दोष किसान
पुलिस
की गोलियों से मारे गए,
कितने एस.एम.एस प्रधानमंत्री
के पास गए? गुड़गांव
में मजदूरों पर लाठियां बरसाई गईं;
टीवी वालों ने नहीं कहा कि
गृहमंत्री को एस.एम.एस भेजो। ऐसी बहस से कुछ भी
हासिल नहीं होगा बाजार में हर मुद्दे की औकात
होती है।
दुनिया में मोहब्बत तो सभी करते हैं लेकिन इकरार
करना बड़ी बात है। अब हमारे प्रधानमंत्री ऐसा कोई
काम शायद ही करें कि दुनिया उन्हें शाहजहां की
तरह याद रखे। हिन्दुस्तान में अभी भी करोड़ों
लोगों ने ताजमहल का दीदार नहीं किया है। मेरी
छोटी-सी इल्तिजा है कि प्रधानमंत्री आत्महत्या
करने से पहले विदर्भ के किसानों को ताजमहल के
दर्शन करवा दें। अमरता के आसान नुस्खों पर
प्रधानमंत्री का हक पहला बनता है। लेकिन,
अगर सोनिया गांधी चाहें तो
क्रम बदला भी जा सकता है।
सौंदर्य प्रतियोगिता की तरह हर साल सात अजूबों
का ऐलान होना चाहिए। हिन्दुस्तान में अजूबों की
कमी नहीं है। एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी के
रूप में मुंबई की धारावी का स्थान है। यूरोप और
अमेरिका वाले धारावी की गलियों से गुजर जाएं तो
ऐसा अजूबा उन्हें दुनिया में और कहीं देखने को
नहीं मिलेगा। वे चाहें तो कालाहांडी का चुनाव भी
कर सकते हैं,
जहां लोग पेड़ों की छालें और
मरे हुए जानवरों का मांस खाकर जिन्दा हैं। लिस्ट
इतनी लम्बी है कि आप पढ़ते-पढ़ते थक जाएं। जब भी
अजूबों की स्पर्धा होगी,
जगह पाने के लिए हिन्दुस्तान
को एस.एम.एस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सम्पर्क:
ए/64,
हिम्मत अपार्टमेंट,
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