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अक्टूबर, 2007

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आबरण कथा

क्रिकेट किसके लिए है?

विजय सिंह बनकर

दुनिया में क्रिकेट का बोलबाला उन्हीं देशों में है जहां अंग्रेजों का शासन था। अन्य देश इससे दूर रहना ही पसंद करते हैं। यही कारण है कि विश्व के लोकप्रिय खेलों में क्रिकेट को नहीं गिना जाता। दस-बारह देश ही विश्व में क्रिकेट खेलते है, जबकि फुटबाल को दुनिया के 150 से ज्यादा देश खेलते हैं। फुटबाल खेलने की श्रेष्ठता की दृष्टि से इन देशों में भारत का नंबर 135वां है। हाल ही में फिजी जैसे छोटे से देश को भी भारत हरा नहीं सका। ऊरूग्वे जैसे छोटे देश के सामने भारतीय फुटबाल टीम खड़ी भी नहीं रह सकी। भारत में तो बस क्रिकेट की माला जपी जा रही है। क्रिकेटर भगवान हो चले हैं। और ये भगवान देश या समाज से ज्यादा अपना और अपनी कंपनी का फायदा देखते हैं। हमारे क्रिकेटरों का सारा ध्यान कोकाकोला, पेप्सी, विल्स आदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विज्ञापन करके पैसा बनाना ही मुख्य मकसद हो जाता है। देश का युवा बरबाद हो जाये, व्यसनी बन जाये, इन सब बातों से हमारे खिलाड़ियों को कुछ लेना-देना नहीं।

 

सब मिलाकर गणित यह होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कूड़ा-कचरा भारतीयों को बेचने वाले क्रिकेट खिलाड़ी मीडिया में किसी भी तरह छाये रहें।

बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के सिगरेट का विज्ञापन करने से इनकार कर दिया था। विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर आए कंपनी के अधिकारियों से गोपीचंद ने कहा था कि ''मुझे पैसा मिलेगा लेकिन मुझे चाहने वाले युवा और बच्चे आपके सिगरेट के आदी हो जायेगें, ये मैं कतई नहीं चाहूंगा।'' राजीव दीक्षित और उनके मित्रों ने आजादी बचाओ आंदोलन की ओर से उनका सम्मान किया। गोपीचंद ने खिलाड़ियों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। अन्य खिलाड़ियों को इससे सीख लेनी चाहिए।

मिडीया में जिस प्रकार क्रिकेट ही छाया रहता है, इसके पीछे भी बड़ी-बड़ी कंपनियों का ही हाथ होता है। उनकी कोशिश होती है कि जिन खिलाड़ियों को उन्होंने अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया है, उनकी लोकप्रियता किसी भी प्रकार से कम न होने पाए। सचिन तेंदुलकर का मास्टर ब्लास्टर, राहुल द्रविड का मिस्टर भरोसेमंद, सौरव गांगुली को टायगर आफ बंगाल, सहवाग का नजफगढ़ का नवाब आदि नाम देना स्वाभाविक नहीं बल्कि इसके पीछे विज्ञापन एजेंसियों की सोची समझी रणनीति होती है। वास्तविकता से इसका ज्यादा लेना-देना नहीं होता। जरा सोचिए सौरव गांगुली टायगर आफ बंगाल क्यों हैं। सुभाषचंद्र बोस बंगाली थे, रासबिहारी बोस बंगाल से थे, जतिंद्रनाथ बंगाली थे। उन्होंने अट्ठरह साल की उम्र में अंग्रेजी सरकार से लोहा लिया। अपनी जान की परवाह न करने वाले अनेक विप्लवी युवा बंगाली भाषी थे। वास्तव में 'टायगर आफ बंगाल' की पदवी के ये हकदार हैं। ये हैं बंगाल के सच्चे शेर जो देश, समाज और संस्कृति की रक्षा के पुरोधा थे। कोकाकोला और पेप्सी का विज्ञापन करने वाले सौरव गांगुली 'टायगर आफ बंगाल' कैसे हो सकते हैं?

जरा सोचिए कि राहुल द्रविड शून्य पर आउट होने पर भी मिस्टर भरोसेमंद रहते हैं, मास्टर ब्लास्टर के बल्ले से रन न निकले तब भी वे ब्लास्टर ही रहते हैं। सब मिलाकर गणित यह होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कूड़ा-कचरा भारतीयों को बेचने वाले क्रिकेट खिलाड़ी मीडिया में किसी भी तरह छाये रहें।

सम्पर्क: साईबाबा नगर, बल्लारपुर मंदिर के पास, चंद्रपु, महाराष्ट्र-442701

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